शनिवार, 9 नवंबर 2019
राम की अयोध्या
रविवार, 27 अक्टूबर 2019
आये हैं राम हमारे, आज मेरे द्वारे
शनिवार, 26 अक्टूबर 2019
जड़ों से जुड़ा अस्तित्व
मुझे याद है कि बचपन में हम लोगों के पास बहुत समय रहा करता था। इतवार को या फिर त्यौहारों और गर्मी की छुट्टियों में जब समय ही समय रहता था, सुबह उठकर बासी रोटी-तरकारी, रोटी-दही या फिर जो भी उपलब्ध हो, खा-पीकर यार-दोस्तों को आवाज़ देते निकल लेते थे बागीचे की ओर मौसमी खेल खेलने। कभी हमें देर हो जाती तो दोस्त लोग बुला लेते। लेकिन यदि किसी दिन छोड़कर निकल जाते तो दुःख का पारावार न रहता। लगता जैसे हमसे बड़ा गरीब इस दुनिया में तो कोई है ही नहीं। और यदि कोई ख़ास मित्र मामा-बुआ के घर चला जाता तो पूछिए ही मत! लगता था कि उस साल की गर्मी की छुट्टी बर्बाद हो गयी है। एक राज की बात और जो सबको नहीं बता सकते - आजकल इन ख़ास दोस्तों को याद करने के लिए समय ही कहाँ मिलता है? हम तो फेसबुक-व्हाट्सऐप के मित्रों के लिए ही बमुश्किल थोड़ा-बहुत समय निकाल पाते हैं!
मौसमी फलों की तरह वे मौसमी खेल भी बड़े पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक होते थे। आज हम एक पर एक फ्री का ऑफर देखकर टूट पड़ते हैं लेकिन वे तो पूरे के पूरे फ्री ही होते थे। फिर भी पता नहीं क्यों लोगों के जीवन से विलुप्त होते गए।
मैं भी कहाँ इन फालतू के पचड़ों में पड़ गया। समय मूल्यवान है, अतः मुद्दे की बात करके आगे बढ़ता हूँ। पहले लोगों के पास फालतू समय था इसलिए एकांतवास का भी मौका मिल जाता था और चिंतन-मनन भी कर लेते थे। टीवी-मोबाइल तो छोड़िये, उन्हें तो समाचार-पत्र भी नसीब नहीं था। तो सोचते भी क्या थे? चिंतन-मनन का विषय भी क्या था? वही ले-देकर परिवार-गाँव के बारे में सोचते थे, सगे-सम्बन्धियों के बारे में सोचते थे, मित्रों के बारे में सोचते थे, या फिर कुछ सामाजिक-धार्मिक विषयों पर चिंतन-मनन कर लेते थे। देश-दुनिया का न उन्हें पता था, न उसके बारे में सोच सकते थे। और आज? इस इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी के युग में ज्ञान-गंगा की ऐसी बाढ़ है कि लोगों को मिल रही सूचनाओं पर प्रतिक्रिया देने का भी समय नहीं है, चिंतन-मनन का फालतू समय कहाँ से मिलेगा? शहरों में लोग मुर्गी के दड़बे जैसे एक-दो कमरे के घर में रहते हैं अतः उनको एकांतवास और चिंतन-मनन का समय मिलना तो बहुत पहले बंद हो गया था, टीवी-मोबाइल के आने के बाद तो गाँव के लोगों के लिए भी यह दुर्लभ हो गया।
लेकिन कल रात को जब मैं आकर चुपचाप खिड़की पर खड़े होकर निर्विकार भाव से गमले में लगे पौधों को घूर रहा था तो लगभग दस-पंद्रह मिनट के बाद मेरे मस्तिष्क के चिंतन-मनन वाले भाग को लगा कि वर्षों बाद उसके अच्छे दिन आने वाले हैं और मुझे उसकी आवश्यकता पड़ने वाली है। सीजन की जुताई-बुवाई के बाद लम्बे समय से घर के किसी कोने में उपेक्षित पड़ी भोथरी, मुर्चाई हुई चकरकी -पतरकी कुदाल जैसे अगले सीजन के पहले लोहार की धधकती भट्ठी में तपकर और धार पाकर चमक उठती है, वैसे ही पूरे जोश के साथ कर्मपथ पर अग्रसर होने के लिए तैयार हो गया वह। बाघ, गौरैया, मोर, लोमड़ी, सियार आदि अनेक विलुप्तप्राय प्राणियों को सरकार या फिर पशु-प्रेमियों की सक्रियता के कारण जैसे अपने अस्तित्व पर आये खतरे से लड़ने का मौका मिला, उसे लगा कि मैंने उसे भी उसका अस्तित्व बचाने का एक अवसर दे दिया। फिर गमलों के पौधों को घूरते हुए जो विचार मन में आया अब उसकी बात कर लेते हैं।
मेरी खिड़की के गमले में श्रीमती जी की कृपा से कई परिचित-अपरिचित पौधों का पेट पल रहा है। इनमें नीम और पारिजात जैसे कुछ पौधे भी हैं जिनको मैंने बचपन से धरती की गोद में पलते-बढ़ते और फूलते-फलते देखा है। अब जब चिंतन-मनन शुरू हो गया तो कई तरह के विचार मन-मस्तिष्क में कौंधने लगे। अचानक सोचने लगा कि ये पौधे तो कई साल से इन गमलों में लगे हैं, लेकिन लम्बाई-चौड़ाई-मोटाई में कोई बहुत ज्यादा परिवर्तन नहीं दिखाई देता है। एक समय के बाद ठहर से गए हों जैसे! यदि ये बाहर सीधे धरती की गोद में पल रहे होते तो... ? अपरिमित विकास हुआ होता इनका, कितने बड़े पेड़ बन चुके होते। कितने पक्षियों का बसेरा होते। कितने आते-जाते पथिकों को छाया देते। कितने भ्रमरों-मधुमक्खियों को अपने मधुरस से तृप्त करते। कितने सजातीय पौधों को जन्म दे चुके होते। इनकी अपनी शान होती, अपना अस्तित्व होता। क्या वही शान, वही अस्तित्व मेरी खिड़की के गमलों में आकर इनको मिला है? यदि हम लोग दस-पंद्रह दिनों के लिए बाहर चले जाएँ और इन्हें पानी न मिले तो... ? जब तक ये धरती की गोद में रहते हैं, किसी को इनकी देख-रेख करने की जरूरत नहीं पड़ती। ये आत्मनिर्भर होते हैं प्रकृति से अपनी सारी आवश्यकताओं को स्वयं ही पूरा करने में पूर्णतया सक्षम होते हैं। किन्तु जब गमलों की सुंदरता के प्रति आकृष्ट होकर दूसरों के कृपापात्र बन जाते हैं तो जब तक सामने वाला मिटटी-खाद-पानी देता रहेगा तब तक जीवित रहेंगे, लेकिन जिस दिन बंद कर दिया, अस्तित्व का संकट आ जायेगा। और जीवित रहकर भी इनका क्या वैसा विकास हो पाता है जैसा धरती की गोद में होता है? क्या वह मान-सम्मान और यश मिलता है? कदापि नहीं, क्योंकि अपनी जमीन छोड़कर ये गमलों में आ बैठे हैं। अपनी जड़ों से उखड़ चुके हैं।
पौधे तो फिर भी पौधे हैं, वे स्वयं चलकर गमलों में नहीं आते। कौन जाने उनको गमलों में आकर कैद हो जाना और दूसरों की कृपा पर पलना पसंद भी है या नहीं? लेकिन हम तो मनुष्य हैं। इस पृथ्वी पर सबसे अधिक विकसित जीव, और उस पर भी विश्व की सर्वाधिक सम्मानित प्राचीनतम सभ्यता-संस्कृति की उपज जिसके आदि के बारे में कोई नहीं जानता। सब केवल कुछ खुदाई से मिली गिनी-चुनी वस्तुओं और स्वयंभू इतिहासकारों के स्वयंसिद्ध विश्लेषण के आधार पर अनुमान लगाने और इसका प्रादुर्भाव की खोज का दम्भ भरते हैं। फिर भी हम क्या कर रहे हैं? क्या हम स्वेच्छा से जाकर दूसरों के गमलों में अपने को कैद नहीं कर दे रहे हैं? क्या हम दूसरों की कृपा पर निर्भर नहीं होते जा रहे हैं? क्या हम अपने धर्म-समाज-संस्कृति-परंपरा रूपी जमीन को छोड़कर दूर नहीं जा रहे हैं? क्या हम अपनी जड़ों से कटते नहीं जा रहे हैं? कल्पना कीजिये कि पृथ्वी के सारे नीम के पौधों को यदि गमले में लगाकर कुछ दिनों के लिए छोड़ दिया जाय और उनको खाद-पानी न दिया जाय तो क्या उनका अस्तित्व रह जाएगा? नहीं न? ऐसे ही यदि हम अपने धर्म-समाज-संस्कृति-परंपरा को छोड़ दें और उनसे दूर हो जायँ तो क्या हमारे अस्तित्व पर संकट नहीं आ जाएगा? हम अगली पीढ़ी को दोष देते हैं किन्तु यह कभी नहीं देखते कि हमने स्वयं इनका कितना निर्वहन किया? क्या हमने अपने पूर्वजों की सीख को अपने जीवन में कोई स्थान दिया? क्या हमने अगली पीढ़ी के लिए एक सही उदाहरण प्रस्तुत किया? क्या हमने उनका सही मार्गदर्शन किया? हमें सोचने की आवश्यकता है।
कल मेरे मस्तिष्क का चिंतन-मनन वाला भाग मौका पाकर ऐक्टिव हो गया था तो मैंने इतना लेक्चर दे दिया। हो सकता है कि कल फिर मैं बाकी चीजों में इतना व्यस्त हो जाऊँ कि चिंतन-मनन तो दूर यह भी भूल जाऊँ कि इस मुद्दे पर मैंने ऐसा कुछ लिखा भी था। लेकिन यदि मेरे आज के इस क्षणिक आवेग वाले लेख से किसी का मन-मस्तिष्क पल भर के लिए चिंतन-मनन की ओर चला जाय तो वही मेरे इस अनप्रोडक्टिव समय का प्रोडक्ट होगा।
गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019
प्रभु की अनुकम्पा
हर दुख सहकर घबराकर भी
छल-छद्म नहीं मैं सीख सका
प्रभु की अनुकम्पा पाकर ही
इस कल्मष से मैं वीत सका
मुझको तुझ पर विश्वास सदा
तू पग-पग मुझे सँभालेगा
हो भँवर भयंकर कितनी भी
तू हरदम मुझे निकालेगा
तेरे सम्बल के कारण ही
यह पाप न मुझको खींच सका
प्रभु की अनुकम्पा पाकर ही
इस कल्मष से मैं वीत सका
मैं कदम-कदम ठोकर खाया
अरु दर-दर पर अपमान सहा
ध्रुव अटल भरोसा तेरा था
जीवन-पथ पर बढ़ता ही रहा
तेरी अनुभूति रही ऐसी
यह अधम मुझे नहिं रीझ सका
प्रभु की अनुकम्पा पाकर ही
इस कल्मष से मैं वीत सका
रविवार, 8 सितंबर 2019
कलि के दोहे
करते कलयुग में सदा, वंचक ही हैं राज ।
वचन-कर्म में भेद अरु, नहिं प्रपंच से लाज ।।
मैं हूं, मैं बस मैं यही, है कलयुग का नेम ।
करुणा मरती जा रही, सूख रहा है प्रेम ।।
वंचक का कलिकाल में, करते हैं सब मान ।
सच्चरित्र का हो भले, मन में बहु सम्मान ।।
नंगा जो जितना बड़ा, उतना पूजा जाय ।
कलि में अपमानित रहे, जिसका सरल सुभाय ।।
मंगलवार, 27 अगस्त 2019
कायर
बैठी थी वह
दो मिनट का अवकाश लेकर
अपने दुधमुँहे बच्चे के साथ
ममता से सराबोर
समेटे हुए आँचल में उस नवजात को
स्तनपान कराती, दुलराती !
मगन था वह भी
माँ के आँचल तले
अमृत-रस-पान करता हुआ
परमसुख, परमानंद की अनुभूति के साथ !
तभी अचानक !
एक झटका लगा
जोर का, बहुत जोर का
लगा जैसे आ गया हो
कोई प्रलयंकारी भूकम्प
काँप उठी हो धरती
चिग्घाड़ उठा हो आसमान
और वह नवजात
जा गिरा दूर अपनी माँ की गोद से
कंकड़ीली, ऊबड़-खाबड़
तप्त भूमि पर.
गिरी पड़ी थी उसकी माँ भी
तड़पती, कराहती असीम वेदना से
पकड़े हुए अपनी पीठ को
एक हाथ से,
और फैलाये हुए दूसरा हाथ
अपने अबोध शिशु की ओर
चीखती, चिग्घाड़ती, बिलबिलाती, गिड़गिड़ाती
देखती हुई कातर आँखों से
कभी अपने निरपराध निरीह पुत्र को
तो कभी उस
दैत्याकार, बर्बर, क्रूर
ठेकेदार को,
जिसकी लात के आघात से
धरती पर पड़ी कराह रही थी वह
और उसका बच्चा भी.
रो रहे थे माँ बेटे
तड़प रहे थे, चिग्घाड़ रहे थे
और..
इस अपार वेदना और करुण क्रन्दन के बीच
सोच रहा था वह नन्हा मासूम
प्रयास कर रहा था समझने का
इस पूरे घटनाक्रम को,
और कोशिश कर रहा था जानने की -
"क्यों मारा उसने मेरी माँ को?
क्या अपराध था उसका?
क्या सुबह से शाम तक
दुर्दिन और दुर्भाग्य के
पाटों के बीच पिसना, फिर भी
अपनी अस्मत की रक्षा हेतु संघर्षरत रहना
यही अपराध था उसका?
या फिर,
पति के आकस्मिक निधन के पश्चात् भी
समाज से लड़ते हुए
स्वाभिमान से जीने का प्रयत्न ?
क्या अपने भूख से तड़पते
बिलखते बच्चे के लिए
दो मिनट का अवकाश लेना उसका अपराध था?
या फिर,
भूखे भेड़ियों के समक्ष
आत्मसमर्पण न करना?
और यह कायर तमाशबीन भीड़ !
मौन है जो हस्तिनापुर के सभासदों की भाँति,
जैसे वे मौन थे
द्रौपदी के चीरहरण के समय
आमंत्रण देते भयंकर विनाश को.
दबा रखा है इन्होंने
प्रतिरोध के स्वर को
प्रतीक्षा में
अपनी-अपनी बारी की.
अरे कायरों !
मिटोगे तुम भी एक दिन
एक-एक कर, असहाय
एकदूसरे का मुँह ताकते
किन्तु, हाथ छुड़ाते हुए
मिटोगे तुम भी,
यदि अभी भी नहीं जागे
मिटोगे तुम भी एक दिन !
मंगलवार, 20 अगस्त 2019
सपने बड़े हो गये हैं !
अहा ! वह बचपन।
प्रतिदिन प्रात:
उषा जब द्वार के पट खोलती थी
नवोदित अरुण की चंचल रश्मियाँ
घुस आती थीं मेरे कमरे में
एक छोटे से झरोखे से
भागती हुई, प्रकाश भरने
नवचेतना, नयी स्फूर्ति देने
मेरी रात के अँधेरे से लड़कर
थककर सोयी हुई
नींद से बोझिल आँखों को.
तभी अम्मा
प्यार से सिर सहलाते, दुलारते
मीठे मधुर शब्दों में कहतीं-
"उठ जा बेटा !
सुबह हो गयी है
देखो, सूरज भी निकल आया है
और मैं
कुनमुनाते हुए
करवट बदल लेता था
और सोने के लिए,
अचानक टूट जाने वाले
आधे-अधूरे सपनों को
पूरा करने के लिए,
क्योंकि सुना था
कि सुबह के सपने
अक्सर सच हो जाते हैं।
उम्र के साथ
अब सपने भी बड़े हो चले हैं।
नहीं समाते हैं अब
बंद आँखों में,
दे जाते हैं दर्द
चुरा लेते हैं नींद
और उन्हें देखने के लिए
अब आँखें बंद नहीं करनी पड़तीं
खुली रखनी पड़ती हैं,
और उन्हें पूरा करने के लिए
अब सोना नहीं
जागना पड़ता है !
- राजेश मिश्र
रविवार, 18 अगस्त 2019
श्रीराम
भक्त-परिपालक, मृदुल-चित प्रभु सकल गुण-ग्राम हैं।
मातु-पितु-गुरु-बन्धु हित रत प्रिय प्रजा परित्राण हैं।
कौशलेय नमस्य निशिदिन कैकयी के प्राण हैं।।
गाधिसुत के संग निकले माँ अहिल्या तरण को।
खण्ड हर-कोदण्ड करि प्रभु जनक की पीड़ा हरी।
भृगुतनय के संग मिलि पुनि थी तनिक क्रीड़ा करी।।
हर्ष से उल्लसित जन-मन स्वर्ग-निधि ज्यों पा गये।
प्रिय प्रजा की घोर इच्छा राम ही युवराज हों।
चक्रवर्ती भूप दशरश क्यों न प्रमुदित आज हों।।
मति फिरी कैकयसुता की भूप से हठ वर लिया।
वेष धर यति का चले वन राम-लक्ष्मण-जानकी।
मातु-इच्छा अरु पिता के लाज रखने आन की।।
जगत-तारणहार को ले नाव में निज प्यार से।
हर्ष से स्वागत किये मुनि-वृंद प्रभु श्रीराम का।
जानकी के कंत का प्रभु परम करुणाधाम का।।
नाश के आतंक का अरु क्षेम के सब सन्त का।
राम ने माया रची मिलि प्राणप्यारी जानकी।
हीन दशकन्धर भगिनि भइ नासिका अरु कान की।।
हैं सृजक चल-अचल के प्रभु सोचता उसने छला।
गीध ने आहुति चढ़ा दी प्राण की प्रभु-काज में।
पद मिला प्रभु-धाम में वह हुआ पूज्य समाज में।।
बालि वध सुग्रीव को नित अभय का वरदान दे।
संग वानर-भालु को ले बाँध सागर को दिया।
हत दशानन कुल सहित सुर-मुनि-मनुज निर्भय किया।।
अति मनोहर क्षेमकारी सर्वदा सुखदायिनी।
दीनबन्धु कृपालु करुणा-पुंज सबका हित करें।
हों सहज भवपार जो प्रभु नाम सुमिरन नित करें।।
भाव से या अनमने ही नाम तो इक बार ले।
दुखहरण मंगलकरण प्रभु सर्वदा तत्पर रहें।
भक्त-वत्सल भाव-भूखे दौड़कर बाहें गहें।।
छाँव में जिसकी पले हम छाँव क्या उसको दिया?
जो अयोध्या-धाम प्रभु का पुण्य जन्मस्थान है।
परम पावन भूमि है वह हम सभी का मान है।।
समय से यदि मिल न पाये न्याय क्या वह न्याय है?
हो यही अंतिम लड़ाई आज यह संकल्प लें।
देर अब होने न पाये कार्य प्रभु का कर चलें।।
शनिवार, 17 अगस्त 2019
माँ भारती
जीवन चौथेपन में दुष्कर
जीवन चौथेपन में दुष्कर, धीरज धरना पड़ता है। मरने से पहले वर्षों तक घुट-घुट मरना पड़ता है।। दुखित व्यक्ति का साथ जगत् में किसको ईप्सित होता ह...
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लन्दन के हीथ्रो एअरपोर्ट से जैसे ही विमान ने उड़ान भरी, श्याम का दिल बल्लियों उछलने लगा. बचपन की स्मृतियाँ एक-एक कर मानस पटल पर उभरने लगीं और...
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बीते पलों के अफ़साने लिख रहा हूँ। जिंदगी मैं तेरे तराने लिख रहा हूँ॥ हालत कुछ यूँ कि वक्त काटे नहीं कटता, वक्त काटने के बहाने लिख रहा हूँ॥...
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मनुज स्वभाव, नहीं अचरज है। मानव हैं हम, द्वेष सहज है।। निर्बल को जब सबल सताए, वह प्रतिकार नहीं कर पाए, मन पीड़ा से भर जाता है, द्वेष हृदय घ...