मंगलवार, 29 सितंबर 2026

ज्योतिपुञ्ज उतरी…

ज्योतिपुञ्ज उतरी…
गगन से ज्योतिपुञ्ज उतरी।।

ललित लालिमा लसत कमल-पद 
मर्दित कर निशि-अन्धकार-मद
अप्रतिम अचला अङ्ग-अङ्ग शुभ 
स्वर्ण-प्रभा बिखरी…

धरा पर स्वर्ण-प्रभा बिखरी।
गगन से ज्योतिपुञ्ज उतरी।।१।।

खग-कुल कलरव जन-मन मोहत
हिमगिरि-तन पीताम्बर सोहत 
पग-पग छम-छम मृदु मादक ध्वनि 
कर्ण-गुहा पसरी…

मदिर ध्वनि कर्ण-गुहा पसरी।
गगन से ज्योतिपुञ्ज उतरी।।२।।

जन-जीवन पालक परिपोषक
मन-तोषक, सब दुख-अवशोषक 
कुम्हलाई कलिकायें प्रस्फुट
अधर-अधर निखरीं…

प्रस्फुटित अधर-अधर निखरीं।
गगन से ज्योतिपुञ्ज उतरी।।३।।

- राजेश मिश्र

सुनो सुते!

सुनो सुते! जब जीवन-पथ पर तुम आगे जाओगी।
प्रतिदिन नये-नये लोगों से पग-पग टकराओगी।।
सीढ़ी-सीढ़ी सँभल-सँभलकर सावधान हो चढ़ना।
निर्भय होकर निज चयनित पथ पर तुम आगे बढ़ना।।

कङ्कड़-पत्थर हर रस्ते पर अनायास मिलते हैं। 
कभी-कभी ठोकर खाकर हम मुँह के बल गिरते हैं।।
जब भी गिरना, दूने बल से पुनः खड़ी हो जाना।
घाव लगे रो लेना, लेकिन फिर से तुम मुस्काना।।

रस्ते-रस्ते व्याध मिलेंगे छुपकर घात लगाये।
तरह-तरह की लालच लेकर इन्द्रजाल फैलाये।
चकाचौंध से कहीं लुभाते, कहीं साधु बन जाते।
नये-नये नित रूप बदलते, नव-नव स्वाँग रचाते।

तुम्हें पता है क्या करना है, कैसे तुम्हें निपटना।
कब तनकर सम्मुख होना है, कब है पीछे हटना।।
उस पल जो भी निर्णय लोगी, साथ हमें पाओगी। 
वही सही पथ होगा निश्चित, जिस पथ तुम जाओगी।।

- राजेश मिश्र

रविवार, 27 सितंबर 2026

भरोसा तोड़ने वाली दुसह ये वेदनायें हैं

चलो, माना तुम्हारी दूरदर्शी योजनायें हैं।
मगर सामान्य जन की और ही कुछ धारणायें हैं।।

महामानव! भले तुम कामनाओं से परे होगे,
हजारों ही अधूरी पर हमारी कामनायें हैं। 

दिखाते सर्वदा सपने सलोने सुख भरे हमको,
मगर क्योंकर लगे ऐसे कि भ्रामक घोषणायें हैं।

हटाये मार्ग से कण्टक किसी के, पुष्प बिखराये,
वही काँटे हमारी राह में नव-यन्त्रणायें हैं।

उजाले की प्रतीक्षा में अँधेरे से लड़ें कब तक?
भरोसा तोड़ने वाली दुसह ये वेदनायें हैं।

तुम्हारा मौन चुभता है, कभी कुछ तो दिलासा दो, 
दिनोंदिन चूर होती जा रहीं मृदु भावनायें हैं।

- राजेश मिश्र

शनिवार, 26 सितंबर 2026

हम तुम्हरी कठपुतली कान्हा!

हम तुम्हरी कठपुतली कान्हा! 
जैसे चाहो नाचेंगे।
जब तक वाणी में बल होगा, 
तुम्हरी महिमा बाँचेंगे।।

बँधेंगे कैसे कर्मबन्ध से,
काम तुम्हारा करते हैं।
परिचारक तुम ही बतलाओ, 
निज मन की कब करते हैं?

कर देंगे जो कुछ कह दोगे,
पुण्य-पाप क्यों जाँचेंगे?
जब तक वाणी में बल होगा, 
तुम्हरी महिमा बाँचेंगे।।१।।

सुख-दुख की किसको चिन्ता है, 
जैसे रख लो, रह लेंगे।
धूप-छाँव जो भी आएगी, 
हँस-हँसकर सब सह लेंगे।

जो भी धुन मुरली छेड़ेगी, 
मत्त उसी पर नाचेंगे। 
जब तक वाणी में बल होगा, 
तुम्हरी महिमा बाँचेंगे।।२।।

किङ्कर को क्यों कर चिन्ता हो, 
कल की, आज और कल की। 
ऊपर से स्वामी तुम जैसा, 
सुधि लेता जो पल-पल की।

हम जैसों की किसे पड़ी है, 
तुमको ही सब जाँचेंगे।
जब तक वाणी में बल होगा, 
तुम्हरी महिमा बाँचेंगे।।३।।

- राजेश मिश्र

बुधवार, 23 सितंबर 2026

चुप न रहो, कुछ बोलो राम

गाँठें मन की खोलो राम।
चुप न रहो, कुछ बोलो राम।।

सारे जग की सुनते निशिदिन,
मन ही मन सब गुनते निशिदिन।
भला-बुरा वे जो कुछ कहते,
हँसते-हँसते तुम सब सहते।

होंठ कभी तो खोलो राम।
चुप न रहो, कुछ बोलो राम॥१॥

तुमने भी तो बहुत सहा है,
किन्तु कभी कुछ भी न कहा है।
मन ही मन घुटते रहते हो,
कभी न निज पीड़ा कहते हो।

घाव हृदय के धो लो राम।
चुप न रहो, कुछ बोलो राम॥२॥

यदि संकोच किसे बतलायें?
जो सुनकर मन में रख पाये।
शपथ तुम्हारी चुप सुन लूँगा,
कभी किसी से कुछ न कहूँगा।

कहकर मुझसे रो लो राम।
चुप न रहो, कुछ बोलो राम॥३॥

— राजेश मिश्र

मंगलवार, 22 सितंबर 2026

कठपुतली

जीवन के इस रङ्गमञ्च पर सबको अभिनय करते देखा। 
जीवन धारण करते देखा, जीते देखा, मरते देखा।।

जाति, वर्ण या धर्म कोई भी,
सब कठपुतली और किसी की।
जड़-चेतन हों, मनुज-मवेशी,
कहीं और है डोर सभी की। 

डोरी के हर एक ताल पर सबको सदा थिरकते देखा।
जीवन धारण करते देखा, जीते देखा, मरते देखा।।१।।

कठपुतली गढ़ने से पहले 
रचनाकार मनन करता है।
क्या भूमिका निभानी उसको 
तद् अनुसार गढ़न करता है।

जब-जब वह कठपुतली देखी, वही भूमिका करते देखा।
जीवन धारण करते देखा, जीते देखा, मरते देखा।।२।।

कठपुतली का जीवन तब तक,
जब तक डोर अक्षत रहती है।
अरु कठपुतली सञ्चालक की 
अङ्गुलियों से युत रहती है।

डोर टूटते, डोर छूटते, तन-धन-मान बिखरते देखा।
जीवन धारण करते देखा, जीते देखा, मरते देखा।।३।।

- राजेश मिश्र

सोमवार, 21 सितंबर 2026

माँ का क्यों अपमान करे?

अरे मवाली, माँ को गाली! माँ का क्यों अपमान करे?
हर जीवन जग में लाने को, माँ ही कोख प्रदान करे।।

भटक रहा था फल लेकर जब अपने कुत्सित कर्मों का,
मिले आसरा, भोग सके फल, पहले के अपकर्मों का।
आगत पीड़ा से परिचित थी, फिर भी कुक्षि प्रदान किया,
मृत्यु-तुल्य दारुण-दुख सहकर तुझको जीवन दान दिया।

उस माता की योनि पावनी पापी! तू बदनाम करे।
हर जीवन जग में लाने को, माँ ही कोख प्रदान करे।।१।।

माँ तेरी हो, माँ मेरी हो, माँ इसकी या उसकी हो। 
माँ तो माँ है, वही रहेगी, फिर चाहे माँ जिसकी हो।
माँ को गाली, भले और की, गाली सारी माँओं को,
तेरी माँ भी तड़पी होगी पा तुझसे इन घावों को।

प्रसव-वेदना से भी बढ़कर माँ को कष्ट प्रदान करे। 
हर जीवन जग में लाने को, माँ ही कोख प्रदान करे।।२।।

यह जीवन तो व्यर्थ हो गया, आगे और गँवायेगा।
कुत्ते, कीट-पतंगों से भी अधम योनि में जायेगा।
जनम-जनम तक भटकेगा तू कीड़ा बनकर नाली में।
भोगेगा तू नरक अनगिनत माँ को दी एक गाली से।

ऐसी कोई शक्ति न जग में जो तेरा कल्याण करे।
हर जीवन जग में लाने को, माँ ही कोख प्रदान करे।।३।।

- राजेश मिश्र

चिन्तन

(१)
मन एक अत्यन्त चञ्चल जीव की तरह है, जिसका स्वभाव वन-वन भटकना है। अतः इसे सुख-दुःख के कँटीले जंगलों की जगह आनन्द के सदाबहार वन में छोड़ दो।

रविवार, 20 सितंबर 2026

कृष्ण-सुदामा मिलन

सुनत सुदामा नाम हहाकर दौड़े कृष्ण कन्हाई यों।
जनम-जनम के बाद अचानक खोई निधि हो पाई ज्यों।

अनियन्त्रित तन, विह्वल है मन, नयनों से जलधार बहे।
पग-पग आगे बढ़ते जैसे लोक-लोक हों लाँघ रहे।
भाव-भँवर में डूबे ऐसे नाप रहे गहराई ज्यों।
जनम-जनम के बाद अचानक खोई निधि हो पाई ज्यों।।१।।

ठोकर खाते और सँभलते जब चौखट पर पहुँचे हैं।
मिली दृष्टि दोनों की जिस क्षण जड़वत् जहँ तहँ ठिठके हैं।
मुँह से बोल न फूट रहे हैं, खाँड मूक ने खाई ज्यों।
जनम-जनम के बाद अचानक खोई निधि हो पाई ज्यों।।२।।

जड़ता टूटी, जगी चेतना, प्रेम-प्रपात अधीर हुए। 
गङ्गा-यमुना ऐसे उमगीं, इक दोनों के तीर हुए।
दृश्य देख जलनिधि चुप ऐसे उसने मुँह की खाई ज्यों। 
जनम-जनम के बाद अचानक खोई निधि हो पाई ज्यों।।३।।

धीरे-धीरे पग दोनों के इक-दूजे की ओर बढ़े।
मुरलीधर कुछ नीचे आए, तनिक सुदामा ऊर्ध्व चढ़े।
लिपटे अङ्क कूदते दोनों, छाई हो लरिकाई ज्यों।
जनम-जनम के बाद अचानक खोई निधि हो पाई ज्यों।।४।।

महामिलन जिसने भी देखा, सब आनन्दविभोर रहे।
सुर-नर-मुनि-गन्धर्व सभी के दृग से अविरल नीर बहे।
अहोभाग्य यह देख द्वारका अपने पर इतराई यों।
जनम-जनम के बाद अचानक खोई निधि हो पाई ज्यों।।५।।

- राजेश मिश्र

अब भी क्यों तुमसे ही आशा?

कुछ बातों पर अति आनन्दित,
कुछ बातों से घोर निराशा।
अब भी क्यों तुमसे ही आशा?

बाकी सब तो तिलचट्टे हैं
थैली के चट्टे-बट्टे हैं
मौका मिलते ही टूटेंगे 
एक-एक पाई लूटेंगे 

पल भर में निगलेगी सब कुछ,
बरसों से बढ़ रही पिपासा।
अब भी क्यों तुमसे ही आशा?।१।।

दशकों का इतिहास देख लो 
दूर देख लो, पास देख लो 
राष्ट्र-धर्म से द्विष्ट सदा हैं 
आर्यजनों से सहज खफा हैं 

कई पीढियों की कुण्ठा है,
जनम-जनम की भरी हताशा।
अब भी क्यों तुमसे ही आशा?।२।।

किन्तु धीरता टूट रही है 
आगे कोई छूट नहीं है 
अनुचित कर्म नहीं छोड़ेंगे 
सारे अपने मुँह मोड़ेंगे

तन-मन-धन से साथ रहे जो,
उनका बस बन रहा तमाशा।
अब भी क्यों तुमसे ही आशा?।३।।

- राजेश मिश्र

गुरुवार, 17 सितंबर 2026

मुझको हृदय लगाओ राम

अब तो दरश दिखाओ राम,
मुझको हृदय लगाओ राम।
राम राम जय राजा राम,
राम राम जय सीताराम॥

जन्मों के कर्मों का बंधन
जकड़ा हूँ हे रघुकुलनंदन

इससे मुक्ति दिलाओ राम,
मुझको हृदय लगाओ राम।
राम राम जय राजा राम,
राम राम जय सीताराम॥१।।

क्रोध, लोभ, मद, मोह, पञ्चशर
व्यथित करे कलिकाल भयंकर

इनको दूर भगाओ राम,
मुझको हृदय लगाओ राम।
राम राम जय राजा राम,
राम राम जय सीताराम॥२।।

पाप-ताप तपता मन निशिदिन
कौन कष्ट हर पाये तुम बिन

दारुण दुःख मिटाओ राम,
मुझको हृदय लगाओ राम।
राम राम जय राजा राम,
राम राम जय सीताराम॥३।।

- राजेश मिश्र

धुन्ध छाई हर तरफ है

धुन्ध छाई हर तरफ है।
और खाई हर तरफ है।।

सत्यनिष्ठा पुस्तकों में,
बेवफाई हर तरफ है।

प्रेम मानो मर गया है, 
बस लड़ाई हर तरफ है।

कुटिल कपटी कुत्सितों की,
वाहवाही हर तरफ है।

जातिगत विद्वेष चहुँदिशि,
जगहँसाई हर ततफ है।

बाँस बरगद कब बना है?
मति नसाई हर तरफ है।

आज पैसा ही सभी कुछ 
मान भाई हर तरफ है।

- राजेश मिश्र

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

बाकी सब कुछ ठीक-ठाक है

भैया! हाल-चाल कैसा है? 
बाबू! सब कुछ ठीक-ठाक है।।

आय अठन्नी, खर्च रुपइया 
बरसों पहले ब्याई गइया
दूध उठौना ही आता है 
काम चाय का चल जाता है 

मुश्किल मिलना दही-छाछ है।
बाकी सब कुछ ठीक-ठाक है।।१।।

अब जाड़ा ज्यादा लगता है 
गर्मी में लिंटर तपता है 
बारिश जब होने लगती है 
छत थोड़ी चूने लगती है 

आठ लोग बस तीन खाट हैं।
बाकी सब कुछ ठीक-ठाक है।।२।।

बीपी, शूगर, हृदय-रोग है
हाँ, अटैक का प्रबल योग है 
आँखों की रोशनी घटी है 
किडनी केवल एक बची है

खाने में कुछ कम मिठास है।
बाकी सब कुछ ठीक-ठाक है।।३।।

पत्नी ने कब के मुँह फेरे
बात-बात पर आँख तरेरे
बेटी-बेटे सुनते कम हैं
सब कहते कुढ़ते हरदम हैं 

नहीं कहीं कुछ बची आस है।
बाकी सब कुछ ठीक-ठाक है।।४।।

जैसे-जैसे उमर चढ़ रही 
मोह, लोभ, लालसा बढ़ रही 
सुमिरन में मन तनिक न लागे
पल नहिं ठहरे, तुरतहिं भागे

निज कर्मों से ही निराश है।
बाकी सब कुछ ठीक-ठाक है।।५।।

- राजेश मिश्र 

बुधवार, 5 अगस्त 2026

हे लखन! उठो प्रिय भ्रात

हे लखन! उठो प्रिय भ्रात
प्रात अब होने वाली है।।

शयित उषा-दृग खुलने वाले लाली छाती होगी।
पुरखों का आशीष समेटे किरणें आती होंगी।

बीती घन काली रात 
प्रात अब होने वाली है।
हे लखन! उठो प्रिय भ्रात
प्रात अब होने वाली है।।१।।

 विहग-वृन्द उद्यत उड़ने को निज-निज पङ्ख पसारे।
उठो वत्स! अब निद्रा त्यागो मेरे प्राण-अधारे।

टाली कब मेरी बात 
प्रात अब होने वाली है।
हे लखन! उठो प्रिय भ्रात
प्रात अब होने वाली है।।२।।

शत्रु सैन्य आती ही होगी अब झटपट उठ जाओ। 
वानर-भालु हतोत्साहित हैं उठ उत्साह बढ़ाओ

मेटो सबका सन्ताप 
प्रात अब होने वाली है।
हे लखन! उठो प्रिय भ्रात
प्रात अब होने वाली है।।१।।

- राजेश मिश्र

सोमवार, 3 अगस्त 2026

बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ

मन में भाव उतर आते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।
विगत निमिष जब तड़पाते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।।

उमड़-घुमड़ घनघोर घटाएँ छा जाएँ जब हृदयांबर में,
नयन-जलद जल बरसाते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।

जब पीड़ित मन मौन साधकर एकाकी घुटने लगता है,
शब्द घुटन से घबराते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।

करक रही कुछ कड़वी बातें जिनको सहना सरल नहीं है,
केवल कागज सह पाते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।

मधुर पलों की मीठी यादें आकर मन में मुसकाती हैं,
तन-मन दोनों खिल जाते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।

जब-जब तुम सपनों में आती, इन आँखों में बस जाती हो,
लोचन पुट न उठा पाते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।

निमिष = पल 
करकना = चुभना
पुट = पलक

- राजेश मिश्र

शनिवार, 1 अगस्त 2026

जय बोलो श्रीराम की

गूँज रही है बाह्याभ्यंतर
ध्वनि बस एकइ नाम की… 
जय बोलो श्रीराम की।
जय बोलो श्रीराम की।।

कौशल्यानंदन, कैकेई के आँखों के तारे 
भरत-लखन-रिपुसूदन-अग्रज दशरथ प्राण-अधारे

हनुमत-हृदय जानकीवल्लभ
रघुकुल ललित ललाम की…
जय बोलो श्रीराम की।
जय बोलो श्रीराम की।।१।।

तिलक ललाट मौलि मस्तक पर कानन कुंडल सोहे
सिंह-स्कंध विशाल वक्ष दृढ़ कर धनु-शर मन मोहे

रूप अनूप हरे छवि क्षण में
कोटि-कोटि शत काम की…
जय बोलो श्रीराम की।
जय बोलो श्रीराम की।।२।।

कोमलचित कृपालु रघुराई भक्तों के रखवाले 
शरणागत पर सद्य द्रवित हों झटपट अंक लगा लें

पाप-ताप-हर, संतत सूखकर,
परम पुरुष पर-धाम की…
जय बोलो श्रीराम की।
जय बोलो श्रीराम की।।३।।

- राजेश मिश्र

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

कितना मुश्किल होता है

इक छोटा परिवार चलाना कितना मुश्किल होता है।
आशाएँ पूरी कर पाना कितना मुश्किल होता है‌।।

संभव नहीं सभी की उम्मीदों पर खरा उतर पाना, 
किंतु उन्हें यह समझा पाना कितना मुश्किल होता है‌।

बहुत सरल है प्रश्न उठाना और किसी की क्षमता पर,
किंतु वही खुद कर दिखलाना कितना मुश्किल होता है।

दुनिया की हर एक चुनौती हँसकर है स्वीकार हमें,
लेकिन अपनों से लड़ पाना कितना मुश्किल होता है।

सबकी गलती पर उठ जाती है उंगली आसानी से, 
निज गलती का ढोल बजाना कितना मुश्किल होता है।

जहर तुम्हारे हिस्से का भी पी लेंगे हम, हमें पता है
रोक गले में इसको पाना कितना मुश्किल होता है। 

- राजेश मिश्र

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

राम का नाम लेकर जिएँ उम्र भर

राम का नाम लेकर जिएँ उम्र भर,
मौत पर राम का नाम मुख में रहे।
भाव ऐसा भरो राम! मन में मेरे,
प्रश्न कुछ भी रहे राम ही हम कहें।।

राम का नाम लेकर उठें प्रात में,
राम का नाम लेकर शयन हम करें।
राम से काम का हर शुभारंभ हो, 
राम का नाम लेकर अशन हम करें। 

राम का नाम ले घर से निकलें सदा, 
हर कदम राम का नाम संग-संग रहे।
भाव ऐसा भरो राम! मन में मेरे,
प्रश्न कुछ भी रहे राम ही हम कहें।।१।।

राम हों वाक् में, कर्म में राम हों,
राम हों चक्षु में, कर्ण में राम हों।
श्वास में अनवरत राम का नाम हो,
राम मन में रमें, भाव में राम हों। 

राम में प्रेम बढ़ता रहे रात-दिन 
राम हित हम सभी दुःख सुख से सहें।
भाव ऐसा भरो राम! मन में मेरे,
प्रश्न कुछ भी रहे राम ही हम कहें।।२।।

राम जंगम बसें, राम जड़ में बसें,
राम चेतन बसें, हर अचेतन बसें।
हैं उपादान प्रभु राम ही सृष्टि के,
दृष्टि निर्दोष यदि, राम कण-कण बसें। 

राम के नाम का घोष है हर तरफ, 
हर हृदय की धड़क राम ही बस कहे ।
भाव ऐसा भरो राम! मन में मेरे,
प्रश्न कुछ भी रहे राम ही हम कहें।।३।।

अशन = भोजन

- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

जहाँ जायें तुम्हें ढूँढें

भले हो भीड़ लाखों की जहाँ जायें तुम्हें ढूँढें।
अजब आदत इन आँखों की जहाँ जायें तुम्हें ढूँढें।।

कभी जब मन तड़पता है किसी के साथ की खातिर,
न देखें और की जानिब ये अकुलाएँ तुम्हें ढूँढें।

छलकता जाम महफिल में, सभी गाफिल हैं पी-पीकर,
पर इनको कुछ नहीं भाए, जिधर देखें, तुम्हें ढूँढें।

बरसती धार अमृत की मुसलसल चाँद से छनकर,
मगर प्यासी ये रह जाएँ, न पी पाएँ, तुम्हें ढूँढें।

तुम्हारे हुस्न की मारी बहुत कुछ सुन चुकीं फिर भी,
अभी भी बाज कब आएँ, तुम्हें चाहें तुम्हें ढूँढें।

- राजेश मिश्र 

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

मैं सभी कुछ लुटाकर लुटेरा बना

हर अँधेरी निशा का सवेरा बना।
मैं सभी कुछ लुटाकर लुटेरा बना।।

दैव ने उस दुखद मोड़ पर ला दिया, 
तू न मेरी बनी, मैं न तेरा बना।।

दोष उनको निराश्रित किया लग रहा
जिन खगों का हमेशा बसेरा बना।

मार्ग पर दूसरों को उजाला दिया,
पर स्वयं उम्र भर इक अँधेरा बना।।

बस न पाया किसी के हृदय में कभी,
सर्वदा दुःख का घन घनेरा बना।।

घाव इतने मिले जिंदगी में मुझे,
दर्द ही जिंदगी का चितेरा बना।।

- राजेश मिश्र

ज्योतिपुञ्ज उतरी…

ज्योतिपुञ्ज उतरी… गगन से ज्योतिपुञ्ज उतरी।। ललित लालिमा लसत कमल-पद  मर्दित कर निशि-अन्धकार-मद अप्रतिम अचला अङ्ग-अङ्ग शुभ  स्वर्ण-प्रभा बिखरी...