शुक्रवार, 5 जून 2026

बिजली रानी! क्या मनमानी?

बिजली रानी! क्या मनमानी? कितना हमें सताती हो!
रहना मुश्किल बिना तुम्हारे, छोड़ हमें क्यों जाती हो?

बिल तो हम पूरा देते हैं, टाइम पर भर आते हैं,
फिर भी क्यों तुम गाल फुलाकर धड़कन सदा बढ़ाती हो?

तुम बिन वाई-फाई, पंखे, एसी सब मर जाते हैं,
यम के जैसा प्राण सभी का निर्दय बन हर जाती हो।

कष्ट कोई तो बतला दो तुम, कही किसी ने बात कोई?
उससे हम लड़ लेंगे, यदि तुम सब कुछ हमें बताती हो!

लेकिन बार-बार हमको यूँ, फिर से छोड़ न जाना तुम,
तुम जाती, खुशियाँ ले जाती, मृत जैसा कर जाती हो।

- राजेश मिश्र

आज फिर कुछ मन व्यथित है

आज फिर कुछ मन व्यथित है! 

छोड़कर पीछे झमेला
पा रहा निज को अकेला 
तृषित मन नित तड़पता है 
नेह-जल हित तरसता है 

खेद से रग-रग ग्रसित है!।१।।

छोड़ जब घर-बार निकला
जीतने संसार निकला 
स्वप्न आँखों में बड़े थे 
शक्ति से युग-भुज भरे थे 

कब पता था दिग्भ्रमित है!।२।।

माँ-पिता का प्यार खोया
प्रेम का संसार खोया
खो गए संबंध सारे 
खो गए सारे सहारे 

बोझ दुख का ले थकित है!।३।।

- राजेश मिश्र 

और जाना है मुझे

रोकते हैं दृग-युगल पग, और जाना है मुझे।
चल न पाया एक भी डग, और जाना है मुझे।।

था बिताना पल खुशी के कुछ तुम्हारे साथ में,
तुम अभी आए यहाँ पर, और जाना है मुझे।

बात कहनी थी तुम्हें जो, अनकरी ही रह गई,
पास तुम आए झिझकते, और जाना है मुझे।

लड़ रहे थे हर लड़ाई तुम अकेले उम्र भर,
आज अब माँगा सहारा, और जाना है मुझे।

बचपने ने बस चखा है रस पिता के प्यार का,
भूख मिटने भी न पाई, और जाना है मुझे।

देखते माँ-बाप बूढ़े अश्रु भरकर आँख में,
आसरा अब बस तुम्हारा, और जाना है मुझे।

- राजेश मिश्र

दोराहे पर अटका हूँ मैं

दोराहे पर अटका हूँ मैं, जीवन के दो पन बीते।
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।

गाँठें बरसों की खुलना भी
है इतना आसान नहीं।
बिना सहारे खोल सके अब 
अंगुलियों में जान नहीं।

गुरु-विहीन का कौन सहारा, हाथ पकड़ ऊपर खींचे।
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।१।।

जिस पथ पर चलता आया हूँ
उसका अनुभव कुछ तो है।
क्या-क्या हो सकता है आगे,
यह प्रतीति मन कुछ तो है।

नव-पथ पर चल पाऊँगा भी, लौट न आऊँगा पीछे?
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।२।।

मन दुविधा में फँसा हुआ है 
समझ न आए किधर चलूँ।
जग ही सब कुछ? या सब मिथ्या?
कैसे यह निश्चय कर लूँ।

अतिशय कठिन डोर उलझन की, उसी राह पुनि पुनि खींचे। 
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।३।।

- राजेश मिश्र 

रविवार, 10 मई 2026

माँ! धरा का धीर है तू

दुःख-आतप तप्त जग में छाँव घन, मृदु नीर है तू।
माँ! धरा का धीर है तू।।

वेद-विद् कहते सदा से
जीव ईश्वर अंश है यह
ईश्वरी! तुझसे सृजित ही
जगत का हर वंश है यह

जड़ जगत में ब्रह्म की प्रतिमूर्ति है, तस्वीर है तू!
माँ! धरा का धीर है तू।।१।।

पावनी निज कोख धरकर
रक्त से सींचे-सँवारे
प्रसव की दारुण व्यथा सह 
नर्क से तू ही उबारे

दुःख के भवसिन्धु में माँ! हारिणी हर पीर है तू।
माँ! धरा का धीर है तू।।२।।

सुखमयी माँ! वृष्टि है तू
आद्य शाश्वत सृष्टि है तू
स्वार्थरत संसार में माँ!
शुभकरी, शुभ-दृष्टि है तू

सोख ले संताप-सागर, भूसुता-पति तीर है तू।
माँ! धरा का धीर है तू।।३।।

- राजेश मिश्र 

शनिवार, 9 मई 2026

आज उपवन फिर खिला है

 ने करवट लिया है, प्राक केसरिया हुआ है,
आज उपवन फिर खिला है।।

रात्रि में अब दम नहीं है 
सिसकियाँ भी थम रही हैं
शुष्क आँखें नम हुई हैं
अब व्यथा कुछ कम हुई है 

उर उजाला भर रहा है, भाव-बिह्वल कर रहा है,
तमस का टूटा किला है।।१।।

लालिमा बढ़ने लगी है
रश्मि गिरि चढ़ने लगी है 
विहग कलरव कर रहे हैं 
मृग कुलाँचे भर रहे हैं 

घोर अँधियारा मिटा है, शुभकरी सुखकर छटा है,
प्रिय उषा का आ मिला है।।२।।

पृथुक पूषण ताप पाकर 
भोर का मृदु थाप पाकर
विहँसती कोमल कली है
वायु सुरभित बह चली है

कमल-दल-पट खुल रहे हैं, मुक्त मधुकर उड़ रहे हैं,
 धैर्य का प्रतिफल मिला है।।३।।

प्राक = पूर्व दिशा
तमस = अंधकार
रश्मि = किरण
पृथुक = बालक
पूषण = सूर्य 

- राजेश मिश्र

रविवार, 12 अप्रैल 2026

राम

इन्द्रियों की पहुँच से परे राम हैं,
किंतु कण-कण जगत के भरे राम हैं।
पातकी घोरतम नाम ही ले तरें,
कर-कमल नित्य शर-धनु धरे राम हैं।।

रविवार, 5 अप्रैल 2026

कौन अपना है जगत में?

कौन अपना है जगत में, जब जगत अपना नहीं?
स्वप्न को सच मानने से, सत्य हो सपना नहीं।।

जगत में आना अकेला
जगत से जाना अकेला 
जन्म से ले मृत्यु तक की
अवधि केवल एक मेला

दृष्टिभ्रम झूठा झमेला, मान सच फँसना नहीं।
स्वप्न को सच मानने से, सत्य हो सपना नहीं।।१।।

स्वार्थ के संबंध सारे 
स्वार्थ पर यह जग टिका
अधिक या कम मोल, लेकिन 
है यहाँ सब कुछ बिका

सज गया बाजार में जो, वह कभी अपना नहीं।
स्वप्न को सच मानने से, सत्य हो सपना नहीं।।२।।

कर्मफल पूँजी-प्रतिष्ठित
यह जगत व्यापार है
सकल सुख-दुख का यहाँ पर
कर्म ही आधार है 

जो मिला सब कुछ तुम्हारा, और पर मढ़ना नहीं।
स्वप्न को सच मानने से, सत्य हो सपना नहीं।।३।।

- राजेश मिश्र

मंगलवार, 17 मार्च 2026

मैं वह नदिया

मैं वह नदिया प्यासी है जो, प्यास बुझाकर सबकी।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। 

चाहे जितना भी थकती हूँ,
पर अविरल बहती रहती हूँ।
पग-पग पर कंकड़-पत्थर की
चोटें चुप सहती रहती हूँ।

वर्षा-आतप-हिम सह स्वागत करती हँस-हँस सबकी।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। १।।

जिनके हित निशि-दिन दौड़ूँ मैं
अपनी बाँहो को फैलाए।
निज हित हित वे लादें मुझ पर
नित नव बाँधों की बाधाएँ।

मर्यादाएँ जब-जब टूटीं, काल बनीं अग-जग की।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। २।।

व्यथा हृदय की सीमा लाँघे,
चिर-निद्रा को मैं ललचाऊँ।
द्रोणपुत्र-सी शापित लेकिन 
मृत्यु भला मैं कैसे पाऊँ?

बिना प्रलय के मुक्ति मुझे कब? राह निहारूँ कबकी।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। ३।।

- राजेश मिश्र

बुधवार, 21 जनवरी 2026

जीवन चौथेपन में दुष्कर

जीवन चौथेपन में दुष्कर,
धीरज धरना पड़ता है।
मरने से पहले वर्षों तक
घुट-घुट मरना पड़ता है।।

दुखित व्यक्ति का साथ जगत् में
किसको ईप्सित होता है,
घोंट गला दुख का, हँसने का
अभिनव करना पड़ता है‌।।

वाणी के तीखे तीरों से
हत हृत् क्रंदन करता है,
नीलकंठ-सा गरल कंठ में
धारण करना पड़ता है।।

पुण्य-अपुण्य कर्म-वृक्षों पर
सुख-दुख के फल लगते हैं,
गठरी ले जाते जो जग से,
आकर भरना पड़ता है।।

कर्मबंध के कारण जग में
आवागमन सतत चलता,
मुक्ति हेतु नित मन-इंद्रिय पर 
संयम करना पड़ता है।।

- राजेश मिश्र 

सोमवार, 12 जनवरी 2026

मधुप मन नाच उठता है

महकती मुस्कुराहट पर मधुप मन नाच उठता है। 
तुम्हारी एक आहट पर मधुप मन नाच उठता है।।

नासिकाभरण-द्युतिमंडल,
दमकते कान के कुण्डल।
मचलते किंकिणी कंगन,
चहकती चूड़ियाँ पायल।

तनिक-सी खनखनाहट पर मधुप मन नाच उठता है।
तुम्हारी एक आहट पर मधुप मन नाच उठता है।।१।।

थिरकते अंग इतराते,
नयन मदनीय मदमाते।
त्वचा मृदु रंग सिंदूरी
केश कटि-कूल बल खाते,

दशन-दल झिलमिलाहट पर मधुप मन नाच उठता है।
तुम्हारी एक आहट पर मधुप मन नाच उठता है।।२।।

व्यथित हृत् हर्ष भर जाएँ
चित्रिणी चपल चेष्टाएँ।
गमकती गंध कस्तूरी 
रसीले बोल बिखराएँ।

खनकती खिलखिलाहट पर मधुप मन नाच उठता है।
तुम्हारी एक आहट पर मधुप मन नाच उठता है।।३।।

- राजेश मिश्र

सोमवार, 5 जनवरी 2026

कुंडलियाँ

(१)

कोई भी सरकार हो, आरक्षण बढ़ जाय।
अरु शासन की दक्षता, दिन-दिन घटती जाय।।
दिन-दिन घटती जाय दक्षता मरती जाये।
अक्षम परजीवी की संख्या बढ़ती जाये।।
कह राजेश कि देश-धर्म को कौन बचाये। 
कोई भी सरकार समाज बाँटती जाए।।

(२)

संविधान की आत्मा, कैसे रहे अपेल।
दशकों से जब चल रहा, आरक्षण का खेल।।
आरक्षण का खेल देश दीमक सा चाटे।
सदियों से संपृक्त समाज शत्रु बन बाँटे।।
कह राजेश दरार दिनोंदिन बढ़ती जाए।
राजनीति अति क्रूर नए नित जाल बिछाए।।

(३)

बंगलादेश में हो रहा, बर्बर अत्याचार।
निर्बल नम्र निरीह हर, हिन्दू है लाचार।।
हिन्दू है लाचार जलाई जायँ बस्तियाँ।
जलकर मरते लोग लुट रहीं बहन-बेटियाँ।।
यहाँ सो रहे कोटि-कोटि चुप चद्दर ताने।
लीलेगी यह आग, आज मानें मत मानें।।


गुरुवार, 1 जनवरी 2026

देख लेना आस-पास

जब तुम्हारा मन दुखित हो, देख लेना आस-पास।
जब अभावों से ग्रसित हो, देख लेना आस-पास।।

वेदनाएँ देख सबकी निज व्यथा अति लघु लगेगी,
हिय तुम्हारा जब व्यथित हो, देख लेना आस-पास।

एक ही सच लोग जितने बात उतने ही तरह की,
बुद्धि जब सुनकर भ्रमित हो, देख लेना आस-पास।

इस जगत में कुछ नहीं है जो सदा सुखकर लगे,
कष्ट सीमा से अधिक हो, देख लेना आसपास।

हर समस्या हल करे कोई कभी संभव नहीं,
विपद कोई उपस्थित हो, देख लेना आस-पास। 

जन्म का गन्तव्य जग में मृत्यु ही तो है सदा,
जब अघट कोई घटित हो, देख लेना आस-पास।

- राजेश मिश्र 

नव वर्ष

बीते संवत की स्मृतियाँ ले नए वर्ष के संग चलें।
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।

जीवन-पथ पर आगे बढ़ते
एक और सन छूट गया है।
नवल वर्ष नव मीत बना है,
गत से नाता टूट गया है।

क्या सचमुच संबंध पूरते तज यदि कोई संग चले?
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।१।।

विगत वर्ष या विगत व्यक्ति को
क्या हम कभी भूल पाते हैं?
जीवन जब तक है तब तक वे 
यादों में आते जाते हैं।

मन में उनकी मृदु यादों की लेकर सदा तरंग चलें।
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।२।।

आगत के स्वागत में लेकिन
विघ्न विगत मत बनने पाए।
एक द्रवित छूकर कर जाए,
दूजा छूकर मन हरषाए। 

सामंजस्य रहे दोनों में हम कुछ ऐसे ढंग चलें। 
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।३।।

कज = दोष, छल

- राजेश मिश्र

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

संघर्ष हमारा जारी है

पुरखों के त्याग परिश्रम से उत्कर्ष हमारा जारी है। 
बाह्याभ्यंतर रिपुओं से नित संघर्ष हमारा जारी है।।

सदियों से सतत चला आया 
संघर्ष सदा संस्कृतियों का,
कुछ का अस्तित्व अभी बाकी, 
कुछ पुंज शेष स्मृतियों का।
हाँ, शेष वही बस बच पायीं
जिनको निज पर विश्वास रहा,
दुनिया में वही फलीं-फूलीं
जिनको सत्ता का साथ रहा।

हम श्रेष्ठ रहे, हम श्रेष्ठ रहें, अनुतर्ष हमारा जारी है। 
बाह्याभ्यंतर रिपुओं से नित संघर्ष हमारा जारी है।।१।।

चाहे जिस कारण से जग में
जब-जब सत्ता संघर्ष हुआ, 
इक संस्कृति नवजीवन पायी,
इक संस्कृति का अपकर्ष हुआ।
युग-युग से यह चलता आया,
युग-युग तक चलता जाएगा,
जो सतत सतर्क सबल होगा,
केवल वह ही बच पायेगा।

हमने हर युग बलिदान दिया, उत्सर्ग हमारा जारी है।
बाह्याभ्यंतर रिपुओं से नित संघर्ष हमारा जारी है।।२।।

कुछ संस्कृतियाँ अनुदार अधम
असहिष्णु और अति हिंस्र रहीं,
कुछ अति उदार अरु अति सहिष्णु,
कुछ संस्कृतियाँ सम्मिश्र रहीं।
जो अति उदार अरु अति सहिष्णु 
वे आगे चल इतिहास बनीं,
अनुदार हिंस्र संस्कृतियों का 
अति सरल सहज सब ग्रास बनीं।

हम सह-अस्तित्व समर्थक नित दृढ़ मर्ष हमारा जारी है।
बाह्याभ्यंतर रिपुओं से नित संघर्ष हमारा जारी है।।३।।

हम रहे उदार सहिष्णु सदा,
हम सबको लेकर साथ चले।
इस सदय सनातन संस्कृति की 
छाया में कितने पौध पले।
हमने निज शोणित से सींचा
शरणागत सब संस्कृतियों को 
नित पाला-पोसा, प्रेम दिया,
बिसरा उनकी अपकृतियों को।

उन्मुख उस पथ पर हैं अब भी, आदर्श हमारा जारी है। 
बाह्याभ्यंतर रिपुओं से नित संघर्ष हमारा जारी है।।४।।

भारत जब तक परतंत्र रहा
हम क्षरणोन्मुख निरुपाय रहे,
नित प्रति जूझे अस्तित्व हेतु
दिन-दिन अनगिन अन्याय सहे।
पुनि संरक्षक सत्ता पाकर
कुछ वर्षों से फल-फूल रहे,
हो अब प्रयास पर्यंत-प्रलय
सत्ता अपने अनुकूल रहे।

संकल्प सभी का हो सबसे अवमर्श हमारा जारी है।
बाह्याभ्यंतर रिपुओं से नित संघर्ष हमारा जारी है।।५।।

अनुतर्ष  = कामना, इच्छा 
मर्ष = सहनशीलता, धैर्य 
अपकृति = आघात, दूसरा, उत्पीड़न, कुकर्म 
क्षरणोन्मुख = क्षरण + उन्मुख
अवमर्श = सम्पर्क 

- राजेश मिश्र

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

किसी को शायरी मुश्किल, कहीं श्रोता नहीं मिलता

किसी को शायरी मुश्किल, कहीं श्रोता नहीं मिलता।
चतुर्दिक प्रेम का सूखा कहीं सोता नहीं मिलता। 
जहाँ जाते जगत में तुम हँसी बस ढूँढते रहते,
इसी कारण कभी कोई कहीं रोता नहीं मिलता।।

धधकती भू, तड़पते जन, सिसकते फेफड़े निशिदिन,
हवा का शुद्ध शहरों में, कहीं झोंका नहीं मिलता।

जहाँ लहलह लहरती थी फसल मौसम कोई भी हो,
पड़े परती उन्हें कोई कहीं बोता नहीं मिलता।

सुनी थी श्रवण की गाथा सदा हमने लड़कपन में, 
दुखद अब वृद्ध कोई भी कहीं ढोता नहीं मिलता।

लुटेरे-चोर-हत्यारे सदा थे किंतु अब कोई 
लहू के दाग छुप-छुपकर कहीं धोता नहीं मिलता।

प्रिये! जब तुम मिला करती मगन मन नाच उठता था,
वही मन किंतु अब विह्वल कहीं होता नहीं मिलता।

- राजेश मिश्र 

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

वीर बाल दिवस

भारत सतत समृद्ध समर्पित राष्ट्रभक्त दीवानों से।
सत्य सनातन सदा सुरक्षित वीरों के बलिदानों से।।
इस्लामी आँधी के आगे झुके नहीं वे तने रहे।
नमन है गुरु, गुरु-पुत्रों को जो धर्म-धुरंधर बने रहे।

मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

कौन पाया पार तेरा

शून्य-सा विस्तृत सरस संसार तेरा।
इस जगत में कौन पाया पार तेरा?।

कर्म तू करता नहीं, सब बोलते हैं, 
किंतु क्षण-क्षण चल रहा व्यापार तेरा।।

है नहीं आकार कोई, कौन कहता,
रूप कण-कण में सदा साकार तेरा।।

सत्त्व-रज-तम से परे नहिं राग तुझमें,
पर बरसता है सभी पर प्यार तेरा।।

तू अक्रिय है, मान लेते हैं कि सच है 
क्या घटित, जिस पर नहीं अधिकार तेरा?।

है अजन्मा, जन्म तुझसे ही सभी का,
जीव-जड़ से प्रेम ही सत्कार तेरा।।

अहम् मेरा जब कभी चोटिल हुआ,
स्नेह जैसे बढ़़ गया हर बार तेरा।।

चित्त व्याकुल, करूँ साक्षात्कार कैसे?
स्मरण हो हिय में सतत दातार तेरा।।

लोग विह्वल, शुभ चतुर्दिक हो रहा है,
अवध में जबसे सजा दरबार तेरा।।

- राजेश मिश्र 

सनातन

ऋषियों-मुनियों-कवियों ने नित सदियों से गाथा गाई है।
शिव सत्य सनातन की महिमा, पूरी किसने कह पाई है?। 

ईश्वर-श्रीमुख-निस्सृत निर्मल
यह प्राणि-धर्म अति पावन है।
जड़-चेतन मंगलकारक है,
सुखकर, सब दुःख नसावन है।
श्रुति-पथ समदर्शी समग्राही,
शाश्वत संसृति सरसावन है।
सद्धर्म अनादि आदि अद्भुत
अति मनमोहक मनभावन है।

जो भी इसके शरणागत है, उसने जीवन-निधि पाई है।
शिव सत्य सनातन की महिमा पूरी किसने कह पाई है?।१।।

इसमें जड़ता का नाम नहीं,
यह चेतन है, नित नूतन है। 
दृढ़ आत्मनियंत्रण, आत्मशुद्धि,
इसमें निज का प्रतिचिंतन है।
सब धर्मों-पंथों का जन्मद,
यह कालातीत चिरंतन है।
इसकी सब शाखायें-टहनी,
यह परम पुनीत पुरातन है।

हिमगिरि अभेद्य, यह अमित सिंधु, इसमें अथाह गहराई है।
शिव सत्य सनातन की महिमा पूरी किसने कह पाई है?।२।।

ईश्वर प्रदत्त उपहार अतुल,
यह प्राणिमात्र परिपोषक है।
पुरुषार्थ-चतुष्टय पथदर्शक,
जग सकल काम परितोषक है।
निज जन-जीवन नित हितकारक,
भव दारुण दुख अवशोषक है।
इस वैभवशाली संस्कृति का
परिचायक है, उद्घोषक है। 

ईश्वर दुर्लभ प्रत्यक्ष भले, यह ईश्वर की परछाईं है।
शिव सत्य सनातन की महिमा, पूरी किसने कह पाई है?।३।।

श्रुति रुचिर ऋचाओं का गायन
देवों को मोहित करता है।
दैवी अनुकंपा से सिंचित
जग-जीवन सदा सँवरता है।
यह ज्ञान, कर्म अरु भक्ति सरस
जस विविध मार्ग बतलाता है।
ये दीर्घ-सूक्ष्म, मृदु-कठिन-सरल,
जन निज-निज रुचि अपनाता है।

दर्शन पुराण स्मृति गीता ने, पग-पग पर राह दिखाई है।
शिव सत्य सनातन की महिमा, पूरी किसने कह पाई है?।४।।

इस सुंदर सघन गहन वन को
दुष्टों ने नित रौंदा-काटा।
कुछ आए, लूटे, चले गए,
कुछ ने शरणागत हो छाँटा।
सामर्थ्य कहाँ किसमें इतनी 
इसका अस्तित्व मिटा पाए?
जिसका कोई प्रारंभ नहीं,
फिर अंत भला कैसे आए?

अपनों ने औरों से बढ़कर, आभ्यंतर क्षति पहुँचाई है।
शिव सत्य सनातन की महिमा पूरी किसने कह पाई है?।५।।

- राजेश मिश्र

शनिवार, 20 दिसंबर 2025

कुंडी फिर भी खटकाऊँगा

तुम चाहे मुझको दुत्कारो, मैं द्वार तुम्हारे आऊँगा।
दरवाजा मुँह पर बंद करो, कुंडी फिर भी खटकाऊँगा।

यह स्वाभिमान की बात नहीं, 
अस्तित्व हमारा संकट में।
सारी दुनिया से शेष हुए,
सिमटे हैं केवल भारत में।
कुछ स्वार्थ-पूर्ति में लिप्त रहे
निज नेताओं ने पाप किया।
यह देश बँटा पर म्लेच्छों सँग
रहने का चिर अभिशाप दिया।

तुम जितना इसे नकारोगे, मैं बार-बार दोहराऊंगा।
दरवाजा मुँह पर बंद करो, कुंडी फिर भी खटकाऊँगा।।१।।

हम सदियों तक परतंत्र रहे,
अति अत्याचार हुए हम पर।
शासक अब्राहम के वंशज,
लूटे काटे हमको जमकर। 
इक छोड़ गया, पर तोड़ गया,
इक हिस्सा ले भी जमा रहा।
जो आस्तीन में पल-पल कर
नित दंत विषैले धँसा रहा।

तुम स्वीकारो मत स्वीकारो, मैं अरि को अरि बतलाऊँगा। 
दरवाजा मुँह पर बंद करो, कुंडी फिर भी खटकाऊँगा।।२।।

सन सैंतालिस पश्चात पाक
में कितने हिंदू शेष अभी?
शलवार पहन ली, जीवित हैं,
जो लड़े, रहे वे खेत सभी।
इकहत्तर में जिनकी खातिर
यह बांग्लादेश बनाया था। 
उन सबने कब, किस मौके पर
भारत का साथ निभाया था?

तुम झूठे सपने देखोगे, मैं विकट सत्य दिखलाऊँगा।
दरवाजा मुँह पर बंद करो, कुंडी फिर भी खटकाऊँगा।।३।।

भारत में जो भी रहे शेष
वे चिंगारी से आग बने।
इन अठहत्तर वर्षों में भी 
अपने कितने घर-बार जले?
जैसे बांग्लादेशी हिंदू
जल रहा आजकल सड़कों पर। 
चेतो, वरना दिन दूर नहीं
तुम भी तड़पोगे जल-जलकर।

तुम जब तक नहीं समझ जाओ, मैं लगातार समझाऊँगा।
दरवाजा मुँह पर बंद करो, कुंडी फिर भी खटकाऊँगा।।४।।

पुरखों ने निज बलिदान दिया
हमको यह हिंदुस्थान दिया।
उनके कारण हम शेष अभी
क्या तुमने यह संज्ञान लिया?
यदि यह टुकड़ा भी गँवा दोगे,
अपनी संतति को क्या दोगे?
बच्चे किस कोने जाएंगे?
वंशज समाप्त हो जाएंगे।

तुम गीत पुराने भूलोगे, मैं नया गीत रच लाऊँगा।
दरवाजा मुँह पर बंद करो, कुंडी फिर भी खटकाऊँगा।।५।।

- राजेश मिश्र

बिजली रानी! क्या मनमानी?

बिजली रानी! क्या मनमानी? कितना हमें सताती हो! रहना मुश्किल बिना तुम्हारे, छोड़ हमें क्यों जाती हो? बिल तो हम पूरा देते हैं, टाइम पर भर आते ह...