बुधवार, 5 अगस्त 2026

हे लखन! उठो प्रिय भ्रात

हे लखन! उठो प्रिय भ्रात
प्रात अब होने वाली है।।

शयित उषा-दृग खुलने वाले लाली छाती होगी।
पुरखों का आशीष समेटे किरणें आती होंगी।

बीती घन काली रात 
प्रात अब होने वाली है।
हे लखन! उठो प्रिय भ्रात
प्रात अब होने वाली है।।१।।

 विहग-वृन्द उद्यत उड़ने को निज-निज पङ्ख पसारे।
उठो वत्स! अब निद्रा त्यागो मेरे प्राण-अधारे।

टाली कब मेरी बात 
प्रात अब होने वाली है।
हे लखन! उठो प्रिय भ्रात
प्रात अब होने वाली है।।२।।

शत्रु सैन्य आती ही होगी अब झटपट उठ जाओ। 
वानर-भालु हतोत्साहित हैं उठ उत्साह बढ़ाओ

मेटो सबका सन्ताप 
प्रात अब होने वाली है।
हे लखन! उठो प्रिय भ्रात
प्रात अब होने वाली है।।१।।

- राजेश मिश्र

सोमवार, 3 अगस्त 2026

बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ

मन में भाव उतर आते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।
विगत निमिष जब तड़पाते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।।

उमड़-घुमड़ घनघोर घटाएँ छा जाएँ जब हृदयांबर में,
नयन-जलद जल बरसाते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।

जब पीड़ित मन मौन साधकर एकाकी घुटने लगता है,
शब्द घुटन से घबराते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।

करक रही कुछ कड़वी बातें जिनको सहना सरल नहीं है,
केवल कागज सह पाते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।

मधुर पलों की मीठी यादें आकर मन में मुसकाती हैं,
तन-मन दोनों खिल जाते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।

जब-जब तुम सपनों में आती, इन आँखों में बस जाती हो,
लोचन पुट न उठा पाते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।

निमिष = पल 
करकना = चुभना
पुट = पलक

- राजेश मिश्र

शनिवार, 1 अगस्त 2026

जय बोलो श्रीराम की

गूँज रही है बाह्याभ्यंतर
ध्वनि बस एकइ नाम की… 
जय बोलो श्रीराम की।
जय बोलो श्रीराम की।।

कौशल्यानंदन, कैकेई के आँखों के तारे 
भरत-लखन-रिपुसूदन-अग्रज दशरथ प्राण-अधारे

हनुमत-हृदय जानकीवल्लभ
रघुकुल ललित ललाम की…
जय बोलो श्रीराम की।
जय बोलो श्रीराम की।।१।।

तिलक ललाट मौलि मस्तक पर कानन कुंडल सोहे
सिंह-स्कंध विशाल वक्ष दृढ़ कर धनु-शर मन मोहे

रूप अनूप हरे छवि क्षण में
कोटि-कोटि शत काम की…
जय बोलो श्रीराम की।
जय बोलो श्रीराम की।।२।।

कोमलचित कृपालु रघुराई भक्तों के रखवाले 
शरणागत पर सद्य द्रवित हों झटपट अंक लगा लें

पाप-ताप-हर, संतत सूखकर,
परम पुरुष पर-धाम की…
जय बोलो श्रीराम की।
जय बोलो श्रीराम की।।३।।

- राजेश मिश्र

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

कितना मुश्किल होता है

इक छोटा परिवार चलाना कितना मुश्किल होता है।
आशाएँ पूरी कर पाना कितना मुश्किल होता है‌।।

संभव नहीं सभी की उम्मीदों पर खरा उतर पाना, 
किंतु उन्हें यह समझा पाना कितना मुश्किल होता है‌।

बहुत सरल है प्रश्न उठाना और किसी की क्षमता पर,
किंतु वही खुद कर दिखलाना कितना मुश्किल होता है।

दुनिया की हर एक चुनौती हँसकर है स्वीकार हमें,
लेकिन अपनों से लड़ पाना कितना मुश्किल होता है।

सबकी गलती पर उठ जाती है उंगली आसानी से, 
निज गलती का ढोल बजाना कितना मुश्किल होता है।

जहर तुम्हारे हिस्से का भी पी लेंगे हम, हमें पता है
रोक गले में इसको पाना कितना मुश्किल होता है। 

- राजेश मिश्र

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

राम का नाम लेकर जिएँ उम्र भर

राम का नाम लेकर जिएँ उम्र भर,
मौत पर राम का नाम मुख में रहे।
भाव ऐसा भरो राम! मन में मेरे,
प्रश्न कुछ भी रहे राम ही हम कहें।।

राम का नाम लेकर उठें प्रात में,
राम का नाम लेकर शयन हम करें।
राम से काम का हर शुभारंभ हो, 
राम का नाम लेकर अशन हम करें। 

राम का नाम ले घर से निकलें सदा, 
हर कदम राम का नाम संग-संग रहे।
भाव ऐसा भरो राम! मन में मेरे,
प्रश्न कुछ भी रहे राम ही हम कहें।।१।।

राम हों वाक् में, कर्म में राम हों,
राम हों चक्षु में, कर्ण में राम हों।
श्वास में अनवरत राम का नाम हो,
राम मन में रमें, भाव में राम हों। 

राम में प्रेम बढ़ता रहे रात-दिन 
राम हित हम सभी दुःख सुख से सहें।
भाव ऐसा भरो राम! मन में मेरे,
प्रश्न कुछ भी रहे राम ही हम कहें।।२।।

राम जंगम बसें, राम जड़ में बसें,
राम चेतन बसें, हर अचेतन बसें।
हैं उपादान प्रभु राम ही सृष्टि के,
दृष्टि निर्दोष यदि, राम कण-कण बसें। 

राम के नाम का घोष है हर तरफ, 
हर हृदय की धड़क राम ही बस कहे ।
भाव ऐसा भरो राम! मन में मेरे,
प्रश्न कुछ भी रहे राम ही हम कहें।।३।।

अशन = भोजन

- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

जहाँ जायें तुम्हें ढूँढें

भले हो भीड़ लाखों की जहाँ जायें तुम्हें ढूँढें।
अजब आदत इन आँखों की जहाँ जायें तुम्हें ढूँढें।।

कभी जब मन तड़पता है किसी के साथ की खातिर,
न देखें और की जानिब ये अकुलाएँ तुम्हें ढूँढें।

छलकता जाम महफिल में, सभी गाफिल हैं पी-पीकर,
पर इनको कुछ नहीं भाए, जिधर देखें, तुम्हें ढूँढें।

बरसती धार अमृत की मुसलसल चाँद से छनकर,
मगर प्यासी ये रह जाएँ, न पी पाएँ, तुम्हें ढूँढें।

तुम्हारे हुस्न की मारी बहुत कुछ सुन चुकीं फिर भी,
अभी भी बाज कब आएँ, तुम्हें चाहें तुम्हें ढूँढें।

- राजेश मिश्र 

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

मैं सभी कुछ लुटाकर लुटेरा बना

हर अँधेरी निशा का सवेरा बना।
मैं सभी कुछ लुटाकर लुटेरा बना।।

दैव ने उस दुखद मोड़ पर ला दिया, 
तू न मेरी बनी, मैं न तेरा बना।।

दोष उनको निराश्रित किया लग रहा
जिन खगों का हमेशा बसेरा बना।

मार्ग पर दूसरों को उजाला दिया,
पर स्वयं उम्र भर इक अँधेरा बना।।

बस न पाया किसी के हृदय में कभी,
सर्वदा दुःख का घन घनेरा बना।।

घाव इतने मिले जिंदगी में मुझे,
दर्द ही जिंदगी का चितेरा बना।।

- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 26 जून 2026

"सौमित्र की सिंहगर्जना

धधक रही है ज्वाला उर में
फटने को तैयार शिरायें।
आँखों से चिनगारी फूटे,
फड़क रही हैं व्यग्र भुजायें।।

क्रोध भयंकर कालिय-विष सा
पल में सब कुछ खाक करे जो।
भावों की लपटें लालायित
जो भी सम्मुख राख करें वो।।

कदम ठिठकते नहीं तनिक भी
व्याकुल इत-उत टहल रहे हैं।
कंपित गात अवश सा है कुछ 
धनु-शर कर में मचल रहे हैं।।

सभा सन्न सौमित्र-क्रोध से
इक-दूजे को निरख रहे हैं। 
राम मौन बैठे सिंहासन 
मेघनादजित तड़क रहे हैं।।

भैया! माना कलयुग है पर 
कोई इतना गिर सकता है?
अब सेवक सोने-चाँदी पर 
क्या सचमुच ही बिक सकता है?

सदियों तक संघर्ष चला जो
खोई ख्याति पुनः पाने का।
वीरों ने हँस चुना मार्ग नित
राम-काज हित मिट जाने का।।

बूढ़े बच्चे युवा सभी ने
हँस-हँसकर बलिदान दिया जो।
माताओं-बहनों ने बढ़कर 
निज गहनों का दान दिया जो।।

जग के सभी सनातनधर्मी 
कितनी पीड़ा भुगत रहे हैं। 
दहन पपियों का करने को 
अंतस् में सब सुलग रहे हैं।।

यह विश्वासघात अति दारुण
हृदय हमारा चीर रहा है।
अपनों के कुत्सित कर्मों से
कोटि दूगों से नीर बहा है।।

आप अभी आदेश दीजिए 
क्षत-विक्षत कर डालूँ इनको।
भस्मीभूत करूँ उनको भी
प्यारे ये लगते हैं जिनको।।

रामराज्य में दुस्साहस यह
हमें तनिक स्वीकार नहीं है।
म्लेच्छों का मन बढ़ जाता है 
होता जब प्रतिकार नहीं है।।

दुष्ट जनों के अन्यायों पर 
सज्जन जब चुप रह जाते हैं। 
राम-भरोसे के अटूट बल
चुप रहकर सब सह जाते हैं।।

अन्यायी-मन सुरसा-मुख सा
तब निशिदिन बढ़ता जाता है। 
अत्याचारी का आतप नित
सूरज सा चढ़ता जाता है।।

उचित यही बढ़ने से पहले 
इन्हें समूल विनष्ट करूँ मैं। 
सतत बिलखते व्यथित जनों का 
सद्य समूचा कष्ट हरूँ मैं।।

रामानुज का रौद्र-रूप पुनि
दिखलाऊँ दुनिया को जाकर।
इन चरणों में करूँ समर्पित 
आततायियों का सिर लाकर।।

प्रभु के भक्तों का सब दुख मैं
हर लूँ निज तीखे बाणों से।
धर्म-ध्वजा को करूँ अटल मैं
विहँस रहे अरि के प्राणों से।।

इस घनघोर दनुज-वन हित मैं
भीषण दावानल बन जाऊँ।
एक-एक का जीवन हर लूँ
अग-जग जहाँ-जहाँ मैं पाऊँ।।

अब भी क्यों विलंब अनुमति में
इतना क्या प्रभु सोच रहे हैं?
टप-टप करते नयन-नीर को 
क्यों चुपके से पोंछ रहे हैं?।

अश्रुबिंदु बस नीर नहीं हैं,
प्रतिफल निज जन दुष्कर्मों का।
हर युग अपनों से ही हारा, 
फल हभोगा उनके कर्मों का।।

किंतु अनुज! मत उद्वेलित हो,
वीर धरा पर अभी खड़े हैं। 
उनके आँसू पर मत जाओ 
अंगारों से भरे पड़े हैं।।

दंड मिलेगा उनको जिनने
यह जघन्य अपराध किया है।
कोटि-कोटि निर्दोष दृगों को 
आँसू का अभिशाप दिया है।।

मत अधीर हो वे पापी अब 
बचकर कहीं नहीं जायेंगे।
जैसा कर्म किया है निश्चित 
वैसा प्रतिफल भी पायेंगे।।

इनको मुक्ति न मिलने वाली 
युग-युग तक जग में भटकेंगे।
प्रलय काल में भी त्रिशंकु सा
मध्य मार्ग में ही लटकेंगे।।

- राजेश मिश्र 

शुक्रवार, 5 जून 2026

बिजली रानी! क्या मनमानी?

बिजली रानी! क्या मनमानी? कितना हमें सताती हो!
रहना मुश्किल बिना तुम्हारे, छोड़ हमें क्यों जाती हो?

बिल तो हम पूरा देते हैं, टाइम पर भर आते हैं,
फिर भी क्यों तुम गाल फुलाकर धड़कन सदा बढ़ाती हो?

तुम बिन वाई-फाई, पंखे, एसी सब मर जाते हैं,
यम के जैसा प्राण सभी का निर्दय बन हर जाती हो।

कष्ट कोई तो बतला दो तुम, कही किसी ने बात कोई?
उससे हम लड़ लेंगे, यदि तुम सब कुछ हमें बताती हो!

लेकिन बार-बार हमको यूँ, फिर से छोड़ न जाना तुम,
तुम जाती, खुशियाँ ले जाती, मृत जैसा कर जाती हो।

- राजेश मिश्र

आज फिर कुछ मन व्यथित है

आज फिर कुछ मन व्यथित है! 

छोड़कर पीछे झमेला
पा रहा निज को अकेला 
तृषित मन नित तड़पता है 
नेह-जल हित तरसता है 

खेद से रग-रग ग्रसित है!।१।।

छोड़ जब घर-बार निकला
जीतने संसार निकला 
स्वप्न आँखों में बड़े थे 
शक्ति से युग-भुज भरे थे 

कब पता था दिग्भ्रमित है!।२।।

माँ-पिता का प्यार खोया
प्रेम का संसार खोया
खो गए संबंध सारे 
खो गए सारे सहारे 

बोझ दुख का ले थकित है!।३।।

- राजेश मिश्र 

और जाना है मुझे

रोकते हैं दृग-युगल पग, और जाना है मुझे।
चल न पाया एक भी डग, और जाना है मुझे।।

था बिताना पल खुशी के कुछ तुम्हारे साथ में,
तुम अभी आए यहाँ पर, और जाना है मुझे।

बात कहनी थी तुम्हें जो, अनकरी ही रह गई,
पास तुम आए झिझकते, और जाना है मुझे।

लड़ रहे थे हर लड़ाई तुम अकेले उम्र भर,
आज अब माँगा सहारा, और जाना है मुझे।

बचपने ने बस चखा है रस पिता के प्यार का,
भूख मिटने भी न पाई, और जाना है मुझे।

देखते माँ-बाप बूढ़े अश्रु भरकर आँख में,
आसरा अब बस तुम्हारा, और जाना है मुझे।

- राजेश मिश्र

दोराहे पर अटका हूँ मैं

दोराहे पर अटका हूँ मैं, जीवन के दो पन बीते।
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।

गाँठें बरसों की खुलना भी
है इतना आसान नहीं।
बिना सहारे खोल सके अब 
अंगुलियों में जान नहीं।

गुरु-विहीन का कौन सहारा, हाथ पकड़ ऊपर खींचे।
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।१।।

जिस पथ पर चलता आया हूँ
उसका अनुभव कुछ तो है।
क्या-क्या हो सकता है आगे,
यह प्रतीति मन कुछ तो है।

नव-पथ पर चल पाऊँगा भी, लौट न आऊँगा पीछे?
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।२।।

मन दुविधा में फँसा हुआ है 
समझ न आए किधर चलूँ।
जग ही सब कुछ? या सब मिथ्या?
कैसे यह निश्चय कर लूँ।

अतिशय कठिन डोर उलझन की, उसी राह पुनि पुनि खींचे। 
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।३।।

- राजेश मिश्र 

रविवार, 10 मई 2026

माँ! धरा का धीर है तू

दुःख-आतप तप्त जग में छाँव घन, मृदु नीर है तू।
माँ! धरा का धीर है तू।।

वेद-विद् कहते सदा से
जीव ईश्वर अंश है यह
ईश्वरी! तुझसे सृजित ही
जगत का हर वंश है यह

जड़ जगत में ब्रह्म की प्रतिमूर्ति है, तस्वीर है तू!
माँ! धरा का धीर है तू।।१।।

पावनी निज कोख धरकर
रक्त से सींचे-सँवारे
प्रसव की दारुण व्यथा सह 
नर्क से तू ही उबारे

दुःख के भवसिन्धु में माँ! हारिणी हर पीर है तू।
माँ! धरा का धीर है तू।।२।।

सुखमयी माँ! वृष्टि है तू
आद्य शाश्वत सृष्टि है तू
स्वार्थरत संसार में माँ!
शुभकरी, शुभ-दृष्टि है तू

सोख ले संताप-सागर, भूसुता-पति तीर है तू।
माँ! धरा का धीर है तू।।३।।

- राजेश मिश्र 

शनिवार, 9 मई 2026

आज उपवन फिर खिला है

 ने करवट लिया है, प्राक केसरिया हुआ है,
आज उपवन फिर खिला है।।

रात्रि में अब दम नहीं है 
सिसकियाँ भी थम रही हैं
शुष्क आँखें नम हुई हैं
अब व्यथा कुछ कम हुई है 

उर उजाला भर रहा है, भाव-बिह्वल कर रहा है,
तमस का टूटा किला है।।१।।

लालिमा बढ़ने लगी है
रश्मि गिरि चढ़ने लगी है 
विहग कलरव कर रहे हैं 
मृग कुलाँचे भर रहे हैं 

घोर अँधियारा मिटा है, शुभकरी सुखकर छटा है,
प्रिय उषा का आ मिला है।।२।।

पृथुक पूषण ताप पाकर 
भोर का मृदु थाप पाकर
विहँसती कोमल कली है
वायु सुरभित बह चली है

कमल-दल-पट खुल रहे हैं, मुक्त मधुकर उड़ रहे हैं,
 धैर्य का प्रतिफल मिला है।।३।।

प्राक = पूर्व दिशा
तमस = अंधकार
रश्मि = किरण
पृथुक = बालक
पूषण = सूर्य 

- राजेश मिश्र

रविवार, 12 अप्रैल 2026

राम

इन्द्रियों की पहुँच से परे राम हैं,
किंतु कण-कण जगत के भरे राम हैं।
पातकी घोरतम नाम ही ले तरें,
कर-कमल नित्य शर-धनु धरे राम हैं।।

रविवार, 5 अप्रैल 2026

कौन अपना है जगत में?

कौन अपना है जगत में, जब जगत अपना नहीं?
स्वप्न को सच मानने से, सत्य हो सपना नहीं।।

जगत में आना अकेला
जगत से जाना अकेला 
जन्म से ले मृत्यु तक की
अवधि केवल एक मेला

दृष्टिभ्रम झूठा झमेला, मान सच फँसना नहीं।
स्वप्न को सच मानने से, सत्य हो सपना नहीं।।१।।

स्वार्थ के संबंध सारे 
स्वार्थ पर यह जग टिका
अधिक या कम मोल, लेकिन 
है यहाँ सब कुछ बिका

सज गया बाजार में जो, वह कभी अपना नहीं।
स्वप्न को सच मानने से, सत्य हो सपना नहीं।।२।।

कर्मफल पूँजी-प्रतिष्ठित
यह जगत व्यापार है
सकल सुख-दुख का यहाँ पर
कर्म ही आधार है 

जो मिला सब कुछ तुम्हारा, और पर मढ़ना नहीं।
स्वप्न को सच मानने से, सत्य हो सपना नहीं।।३।।

- राजेश मिश्र

मंगलवार, 17 मार्च 2026

मैं वह नदिया

मैं वह नदिया प्यासी है जो, प्यास बुझाकर सबकी।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। 

चाहे जितना भी थकती हूँ,
पर अविरल बहती रहती हूँ।
पग-पग पर कंकड़-पत्थर की
चोटें चुप सहती रहती हूँ।

वर्षा-आतप-हिम सह स्वागत करती हँस-हँस सबकी।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। १।।

जिनके हित निशि-दिन दौड़ूँ मैं
अपनी बाँहो को फैलाए।
निज हित हित वे लादें मुझ पर
नित नव बाँधों की बाधाएँ।

मर्यादाएँ जब-जब टूटीं, काल बनीं अग-जग की।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। २।।

व्यथा हृदय की सीमा लाँघे,
चिर-निद्रा को मैं ललचाऊँ।
द्रोणपुत्र-सी शापित लेकिन 
मृत्यु भला मैं कैसे पाऊँ?

बिना प्रलय के मुक्ति मुझे कब? राह निहारूँ कबकी।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। ३।।

- राजेश मिश्र

बुधवार, 21 जनवरी 2026

जीवन चौथेपन में दुष्कर

जीवन चौथेपन में दुष्कर,
धीरज धरना पड़ता है।
मरने से पहले वर्षों तक
घुट-घुट मरना पड़ता है।।

दुखित व्यक्ति का साथ जगत् में
किसको ईप्सित होता है,
घोंट गला दुख का, हँसने का
अभिनव करना पड़ता है‌।।

वाणी के तीखे तीरों से
हत हृत् क्रंदन करता है,
नीलकंठ-सा गरल कंठ में
धारण करना पड़ता है।।

पुण्य-अपुण्य कर्म-वृक्षों पर
सुख-दुख के फल लगते हैं,
गठरी ले जाते जो जग से,
आकर भरना पड़ता है।।

कर्मबंध के कारण जग में
आवागमन सतत चलता,
मुक्ति हेतु नित मन-इंद्रिय पर 
संयम करना पड़ता है।।

- राजेश मिश्र 

सोमवार, 12 जनवरी 2026

मधुप मन नाच उठता है

महकती मुस्कुराहट पर मधुप मन नाच उठता है। 
तुम्हारी एक आहट पर मधुप मन नाच उठता है।।

नासिकाभरण-द्युतिमंडल,
दमकते कान के कुण्डल।
मचलते किंकिणी कंगन,
चहकती चूड़ियाँ पायल।

तनिक-सी खनखनाहट पर मधुप मन नाच उठता है।
तुम्हारी एक आहट पर मधुप मन नाच उठता है।।१।।

थिरकते अंग इतराते,
नयन मदनीय मदमाते।
त्वचा मृदु रंग सिंदूरी
केश कटि-कूल बल खाते,

दशन-दल झिलमिलाहट पर मधुप मन नाच उठता है।
तुम्हारी एक आहट पर मधुप मन नाच उठता है।।२।।

व्यथित हृत् हर्ष भर जाएँ
चित्रिणी चपल चेष्टाएँ।
गमकती गंध कस्तूरी 
रसीले बोल बिखराएँ।

खनकती खिलखिलाहट पर मधुप मन नाच उठता है।
तुम्हारी एक आहट पर मधुप मन नाच उठता है।।३।।

- राजेश मिश्र

सोमवार, 5 जनवरी 2026

कुंडलियाँ

(१)

कोई भी सरकार हो, आरक्षण बढ़ जाय।
अरु शासन की दक्षता, दिन-दिन घटती जाय।।
दिन-दिन घटती जाय दक्षता मरती जाये।
अक्षम परजीवी की संख्या बढ़ती जाये।।
कह राजेश कि देश-धर्म को कौन बचाये। 
कोई भी सरकार समाज बाँटती जाए।।

(२)

संविधान की आत्मा, कैसे रहे अपेल।
दशकों से जब चल रहा, आरक्षण का खेल।।
आरक्षण का खेल देश दीमक सा चाटे।
सदियों से संपृक्त समाज शत्रु बन बाँटे।।
कह राजेश दरार दिनोंदिन बढ़ती जाए।
राजनीति अति क्रूर नए नित जाल बिछाए।।

(३)

बंगलादेश में हो रहा, बर्बर अत्याचार।
निर्बल नम्र निरीह हर, हिन्दू है लाचार।।
हिन्दू है लाचार जलाई जायँ बस्तियाँ।
जलकर मरते लोग लुट रहीं बहन-बेटियाँ।।
यहाँ सो रहे कोटि-कोटि चुप चद्दर ताने।
लीलेगी यह आग, आज मानें मत मानें।।


हे लखन! उठो प्रिय भ्रात

हे लखन! उठो प्रिय भ्रात प्रात अब होने वाली है।। शयित उषा-दृग खुलने वाले लाली छाती होगी। पुरखों का आशीष समेटे किरणें आती होंगी। बीती घन काली ...