गगन से ज्योतिपुञ्ज उतरी।।
ललित लालिमा लसत कमल-पद
मर्दित कर निशि-अन्धकार-मद
अप्रतिम अचला अङ्ग-अङ्ग शुभ
स्वर्ण-प्रभा बिखरी…
धरा पर स्वर्ण-प्रभा बिखरी।
गगन से ज्योतिपुञ्ज उतरी।।१।।
खग-कुल कलरव जन-मन मोहत
हिमगिरि-तन पीताम्बर सोहत
पग-पग छम-छम मृदु मादक ध्वनि
कर्ण-गुहा पसरी…
मदिर ध्वनि कर्ण-गुहा पसरी।
गगन से ज्योतिपुञ्ज उतरी।।२।।
जन-जीवन पालक परिपोषक
मन-तोषक, सब दुख-अवशोषक
कुम्हलाई कलिकायें प्रस्फुट
अधर-अधर निखरीं…
प्रस्फुटित अधर-अधर निखरीं।
गगन से ज्योतिपुञ्ज उतरी।।३।।
- राजेश मिश्र