शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

जँ जायें तुम्हेंढूँढें

भले हो भीड़ लाखों की जहाँ जायें तुम्हें ढूँढें।
अजब आदत इन आँखों की जहाँ जायें तुम्हें ढूँढें।।

कभी जब मन तड़पता है किसी के साथ की खातिर,
न देखें और की जानिब ये अकुलाएँ तुम्हें ढूँढें।

छलकता जाम महफिल में, सभी गाफिल हैं पी-पीकर,
पर इनको कुछ नहीं भाए, जिधर देखें, तुम्हें ढूँढें।

बरसती धार अमृत की मुसलसल चाँद से छनकर,
मगर प्यासी ये रह जाएँ, न पी पाएँ, तुम्हें ढूँढें।

तुम्हारे हुस्न की मारी बहुत कुछ सुन चुकीं फिर भी,
अभी भी बाज कब आएँ, तुम्हें चाहें तुम्हें ढूँढें।

- राजेश मिश्र 

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जँ जायें तुम्हेंढूँढें

भले हो भीड़ लाखों की जहाँ जायें तुम्हें ढूँढें। अजब आदत इन आँखों की जहाँ जायें तुम्हें ढूँढें।। कभी जब मन तड़पता है किसी के साथ की खातिर, न ...