अजब आदत इन आँखों की जहाँ जायें तुम्हें ढूँढें।।
कभी जब मन तड़पता है किसी के साथ की खातिर,
न देखें और की जानिब ये अकुलाएँ तुम्हें ढूँढें।
छलकता जाम महफिल में, सभी गाफिल हैं पी-पीकर,
पर इनको कुछ नहीं भाए, जिधर देखें, तुम्हें ढूँढें।
बरसती धार अमृत की मुसलसल चाँद से छनकर,
मगर प्यासी ये रह जाएँ, न पी पाएँ, तुम्हें ढूँढें।
तुम्हारे हुस्न की मारी बहुत कुछ सुन चुकीं फिर भी,
अभी भी बाज कब आएँ, तुम्हें चाहें तुम्हें ढूँढें।
- राजेश मिश्र
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें