मैं सभी कुछ लुटाकर लुटेरा बना।।
दैव ने उस दुखद मोड़ पर ला दिया,
तू न मेरी बनी, मैं न तेरा बना।।
दोष उनको निराश्रित किया लग रहा
जिन खगों का हमेशा बसेरा बना।
मार्ग पर दूसरों को उजाला दिया,
पर स्वयं उम्र भर इक अँधेरा बना।।
बस न पाया किसी के हृदय में कभी,
सर्वदा दुःख का घन घनेरा बना।।
घाव इतने मिले जिंदगी में मुझे,
दर्द ही जिंदगी का चितेरा बना।।
- राजेश मिश्र
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें