फटने को तैयार शिरायें।
आँखों से चिनगारी फूटे,
फड़क रही हैं व्यग्र भुजायें।।
क्रोध भयंकर कालिय-विष सा
पल में सब कुछ खाक करे जो।
भावों की लपटें लालायित
जो भी सम्मुख राख करें वो।।
कदम ठिठकते नहीं तनिक भी
व्याकुल इत-उत टहल रहे हैं।
कंपित गात अवश सा है कुछ
धनु-शर कर में मचल रहे हैं।।
सभा सन्न सौमित्र-क्रोध से
इक-दूजे को निरख रहे हैं।
राम मौन बैठे सिंहासन
मेघनादजित तड़क रहे हैं।।
भैया! माना कलयुग है पर
कोई इतना गिर सकता है?
अब सेवक सोने-चाँदी पर
क्या सचमुच ही बिक सकता है?
सदियों तक संघर्ष चला जो
खोई ख्याति पुनः पाने का।
वीरों ने हँस चुना मार्ग नित
राम-काज हित मिट जाने का।।
बूढ़े बच्चे युवा सभी ने
हँस-हँसकर बलिदान दिया जो।
माताओं-बहनों ने बढ़कर
निज गहनों का दान दिया जो।।
जग के सभी सनातनधर्मी
कितनी पीड़ा भुगत रहे हैं।
दहन पपियों का करने को
अंतस् में सब सुलग रहे हैं।।
यह विश्वासघात अति दारुण
हृदय हमारा चीर रहा है।
अपनों के कुत्सित कर्मों से
कोटि दूगों से नीर बहा है।।
आप अभी आदेश दीजिए
क्षत-विक्षत कर डालूँ इनको।
भस्मीभूत करूँ उनको भी
प्यारे ये लगते हैं जिनको।।
रामराज्य में दुस्साहस यह
हमें तनिक स्वीकार नहीं है।
म्लेच्छों का मन बढ़ जाता है
होता जब प्रतिकार नहीं है।।
दुष्ट जनों के अन्यायों पर
सज्जन जब चुप रह जाते हैं।
राम-भरोसे के अटूट बल
चुप रहकर सब सह जाते हैं।।
अन्यायी-मन सुरसा-मुख सा
तब निशिदिन बढ़ता जाता है।
अत्याचारी का आतप नित
सूरज सा चढ़ता जाता है।।
उचित यही बढ़ने से पहले
इन्हें समूल विनष्ट करूँ मैं।
सतत बिलखते व्यथित जनों का
सद्य समूचा कष्ट हरूँ मैं।।
रामानुज का रौद्र-रूप पुनि
दिखलाऊँ दुनिया को जाकर।
इन चरणों में करूँ समर्पित
आततायियों का सिर लाकर।।
प्रभु के भक्तों का सब दुख मैं
हर लूँ निज तीखे बाणों से।
धर्म-ध्वजा को करूँ अटल मैं
विहँस रहे अरि के प्राणों से।।
इस घनघोर दनुज-वन हित मैं
भीषण दावानल बन जाऊँ।
एक-एक का जीवन हर लूँ
अग-जग जहाँ-जहाँ मैं पाऊँ।।
अब भी क्यों विलंब अनुमति में
इतना क्या प्रभु सोच रहे हैं?
टप-टप करते नयन-नीर को
क्यों चुपके से पोंछ रहे हैं?।
अश्रुबिंदु बस नीर नहीं हैं,
प्रतिफल निज जन दुष्कर्मों का।
हर युग अपनों से ही हारा,
फल हभोगा उनके कर्मों का।।
किंतु अनुज! मत उद्वेलित हो,
वीर धरा पर अभी खड़े हैं।
उनके आँसू पर मत जाओ
अंगारों से भरे पड़े हैं।।
दंड मिलेगा उनको जिनने
यह जघन्य अपराध किया है।
कोटि-कोटि निर्दोष दृगों को
आँसू का अभिशाप दिया है।।
मत अधीर हो वे पापी अब
बचकर कहीं नहीं जायेंगे।
जैसा कर्म किया है निश्चित
वैसा प्रतिफल भी पायेंगे।।
इनको मुक्ति न मिलने वाली
युग-युग तक जग में भटकेंगे।
प्रलय काल में भी त्रिशंकु सा
मध्य मार्ग में ही लटकेंगे।।
- राजेश मिश्र
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