शुक्रवार, 26 जून 2026

"सौमित्र की सिंहगर्जना

धधक रही है ज्वाला उर में
फटने को तैयार शिरायें।
आँखों से चिनगारी फूटे,
फड़क रही हैं व्यग्र भुजायें।।

क्रोध भयंकर कालिय-विष सा
पल में सब कुछ खाक करे जो।
भावों की लपटें लालायित
जो भी सम्मुख राख करें वो।।

कदम ठिठकते नहीं तनिक भी
व्याकुल इत-उत टहल रहे हैं।
कंपित गात अवश सा है कुछ 
धनु-शर कर में मचल रहे हैं।।

सभा सन्न सौमित्र-क्रोध से
इक-दूजे को निरख रहे हैं। 
राम मौन बैठे सिंहासन 
मेघनादजित तड़क रहे हैं।।

भैया! माना कलयुग है पर 
कोई इतना गिर सकता है?
अब सेवक सोने-चाँदी पर 
क्या सचमुच ही बिक सकता है?

सदियों तक संघर्ष चला जो
खोई ख्याति पुनः पाने का।
वीरों ने हँस चुना मार्ग नित
राम-काज हित मिट जाने का।।

बूढ़े बच्चे युवा सभी ने
हँस-हँसकर बलिदान दिया जो।
माताओं-बहनों ने बढ़कर 
निज गहनों का दान दिया जो।।

जग के सभी सनातनधर्मी 
कितनी पीड़ा भुगत रहे हैं। 
दहन पपियों का करने को 
अंतस् में सब सुलग रहे हैं।।

यह विश्वासघात अति दारुण
हृदय हमारा चीर रहा है।
अपनों के कुत्सित कर्मों से
कोटि दूगों से नीर बहा है।।

आप अभी आदेश दीजिए 
क्षत-विक्षत कर डालूँ इनको।
भस्मीभूत करूँ उनको भी
प्यारे ये लगते हैं जिनको।।

रामराज्य में दुस्साहस यह
हमें तनिक स्वीकार नहीं है।
म्लेच्छों का मन बढ़ जाता है 
होता जब प्रतिकार नहीं है।।

दुष्ट जनों के अन्यायों पर 
सज्जन जब चुप रह जाते हैं। 
राम-भरोसे के अटूट बल
चुप रहकर सब सह जाते हैं।।

अन्यायी-मन सुरसा-मुख सा
तब निशिदिन बढ़ता जाता है। 
अत्याचारी का आतप नित
सूरज सा चढ़ता जाता है।।

उचित यही बढ़ने से पहले 
इन्हें समूल विनष्ट करूँ मैं। 
सतत बिलखते व्यथित जनों का 
सद्य समूचा कष्ट हरूँ मैं।।

रामानुज का रौद्र-रूप पुनि
दिखलाऊँ दुनिया को जाकर।
इन चरणों में करूँ समर्पित 
आततायियों का सिर लाकर।।

प्रभु के भक्तों का सब दुख मैं
हर लूँ निज तीखे बाणों से।
धर्म-ध्वजा को करूँ अटल मैं
विहँस रहे अरि के प्राणों से।।

इस घनघोर दनुज-वन हित मैं
भीषण दावानल बन जाऊँ।
एक-एक का जीवन हर लूँ
अग-जग जहाँ-जहाँ मैं पाऊँ।।

अब भी क्यों विलंब अनुमति में
इतना क्या प्रभु सोच रहे हैं?
टप-टप करते नयन-नीर को 
क्यों चुपके से पोंछ रहे हैं?।

अश्रुबिंदु बस नीर नहीं हैं,
प्रतिफल निज जन दुष्कर्मों का।
हर युग अपनों से ही हारा, 
फल हभोगा उनके कर्मों का।।

किंतु अनुज! मत उद्वेलित हो,
वीर धरा पर अभी खड़े हैं। 
उनके आँसू पर मत जाओ 
अंगारों से भरे पड़े हैं।।

दंड मिलेगा उनको जिनने
यह जघन्य अपराध किया है।
कोटि-कोटि निर्दोष दृगों को 
आँसू का अभिशाप दिया है।।

मत अधीर हो वे पापी अब 
बचकर कहीं नहीं जायेंगे।
जैसा कर्म किया है निश्चित 
वैसा प्रतिफल भी पायेंगे।।

इनको मुक्ति न मिलने वाली 
युग-युग तक जग में भटकेंगे।
प्रलय काल में भी त्रिशंकु सा
मध्य मार्ग में ही लटकेंगे।।

- राजेश मिश्र 

शुक्रवार, 5 जून 2026

बिजली रानी! क्या मनमानी?

बिजली रानी! क्या मनमानी? कितना हमें सताती हो!
रहना मुश्किल बिना तुम्हारे, छोड़ हमें क्यों जाती हो?

बिल तो हम पूरा देते हैं, टाइम पर भर आते हैं,
फिर भी क्यों तुम गाल फुलाकर धड़कन सदा बढ़ाती हो?

तुम बिन वाई-फाई, पंखे, एसी सब मर जाते हैं,
यम के जैसा प्राण सभी का निर्दय बन हर जाती हो।

कष्ट कोई तो बतला दो तुम, कही किसी ने बात कोई?
उससे हम लड़ लेंगे, यदि तुम सब कुछ हमें बताती हो!

लेकिन बार-बार हमको यूँ, फिर से छोड़ न जाना तुम,
तुम जाती, खुशियाँ ले जाती, मृत जैसा कर जाती हो।

- राजेश मिश्र

आज फिर कुछ मन व्यथित है

आज फिर कुछ मन व्यथित है! 

छोड़कर पीछे झमेला
पा रहा निज को अकेला 
तृषित मन नित तड़पता है 
नेह-जल हित तरसता है 

खेद से रग-रग ग्रसित है!।१।।

छोड़ जब घर-बार निकला
जीतने संसार निकला 
स्वप्न आँखों में बड़े थे 
शक्ति से युग-भुज भरे थे 

कब पता था दिग्भ्रमित है!।२।।

माँ-पिता का प्यार खोया
प्रेम का संसार खोया
खो गए संबंध सारे 
खो गए सारे सहारे 

बोझ दुख का ले थकित है!।३।।

- राजेश मिश्र 

और जाना है मुझे

रोकते हैं दृग-युगल पग, और जाना है मुझे।
चल न पाया एक भी डग, और जाना है मुझे।।

था बिताना पल खुशी के कुछ तुम्हारे साथ में,
तुम अभी आए यहाँ पर, और जाना है मुझे।

बात कहनी थी तुम्हें जो, अनकरी ही रह गई,
पास तुम आए झिझकते, और जाना है मुझे।

लड़ रहे थे हर लड़ाई तुम अकेले उम्र भर,
आज अब माँगा सहारा, और जाना है मुझे।

बचपने ने बस चखा है रस पिता के प्यार का,
भूख मिटने भी न पाई, और जाना है मुझे।

देखते माँ-बाप बूढ़े अश्रु भरकर आँख में,
आसरा अब बस तुम्हारा, और जाना है मुझे।

- राजेश मिश्र

दोराहे पर अटका हूँ मैं

दोराहे पर अटका हूँ मैं, जीवन के दो पन बीते।
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।

गाँठें बरसों की खुलना भी
है इतना आसान नहीं।
बिना सहारे खोल सके अब 
अंगुलियों में जान नहीं।

गुरु-विहीन का कौन सहारा, हाथ पकड़ ऊपर खींचे।
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।१।।

जिस पथ पर चलता आया हूँ
उसका अनुभव कुछ तो है।
क्या-क्या हो सकता है आगे,
यह प्रतीति मन कुछ तो है।

नव-पथ पर चल पाऊँगा भी, लौट न आऊँगा पीछे?
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।२।।

मन दुविधा में फँसा हुआ है 
समझ न आए किधर चलूँ।
जग ही सब कुछ? या सब मिथ्या?
कैसे यह निश्चय कर लूँ।

अतिशय कठिन डोर उलझन की, उसी राह पुनि पुनि खींचे। 
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।३।।

- राजेश मिश्र 

रविवार, 10 मई 2026

माँ! धरा का धीर है तू

दुःख-आतप तप्त जग में छाँव घन, मृदु नीर है तू।
माँ! धरा का धीर है तू।।

वेद-विद् कहते सदा से
जीव ईश्वर अंश है यह
ईश्वरी! तुझसे सृजित ही
जगत का हर वंश है यह

जड़ जगत में ब्रह्म की प्रतिमूर्ति है, तस्वीर है तू!
माँ! धरा का धीर है तू।।१।।

पावनी निज कोख धरकर
रक्त से सींचे-सँवारे
प्रसव की दारुण व्यथा सह 
नर्क से तू ही उबारे

दुःख के भवसिन्धु में माँ! हारिणी हर पीर है तू।
माँ! धरा का धीर है तू।।२।।

सुखमयी माँ! वृष्टि है तू
आद्य शाश्वत सृष्टि है तू
स्वार्थरत संसार में माँ!
शुभकरी, शुभ-दृष्टि है तू

सोख ले संताप-सागर, भूसुता-पति तीर है तू।
माँ! धरा का धीर है तू।।३।।

- राजेश मिश्र 

शनिवार, 9 मई 2026

आज उपवन फिर खिला है

 ने करवट लिया है, प्राक केसरिया हुआ है,
आज उपवन फिर खिला है।।

रात्रि में अब दम नहीं है 
सिसकियाँ भी थम रही हैं
शुष्क आँखें नम हुई हैं
अब व्यथा कुछ कम हुई है 

उर उजाला भर रहा है, भाव-बिह्वल कर रहा है,
तमस का टूटा किला है।।१।।

लालिमा बढ़ने लगी है
रश्मि गिरि चढ़ने लगी है 
विहग कलरव कर रहे हैं 
मृग कुलाँचे भर रहे हैं 

घोर अँधियारा मिटा है, शुभकरी सुखकर छटा है,
प्रिय उषा का आ मिला है।।२।।

पृथुक पूषण ताप पाकर 
भोर का मृदु थाप पाकर
विहँसती कोमल कली है
वायु सुरभित बह चली है

कमल-दल-पट खुल रहे हैं, मुक्त मधुकर उड़ रहे हैं,
 धैर्य का प्रतिफल मिला है।।३।।

प्राक = पूर्व दिशा
तमस = अंधकार
रश्मि = किरण
पृथुक = बालक
पूषण = सूर्य 

- राजेश मिश्र

रविवार, 12 अप्रैल 2026

राम

इन्द्रियों की पहुँच से परे राम हैं,
किंतु कण-कण जगत के भरे राम हैं।
पातकी घोरतम नाम ही ले तरें,
कर-कमल नित्य शर-धनु धरे राम हैं।।

रविवार, 5 अप्रैल 2026

कौन अपना है जगत में?

कौन अपना है जगत में, जब जगत अपना नहीं?
स्वप्न को सच मानने से, सत्य हो सपना नहीं।।

जगत में आना अकेला
जगत से जाना अकेला 
जन्म से ले मृत्यु तक की
अवधि केवल एक मेला

दृष्टिभ्रम झूठा झमेला, मान सच फँसना नहीं।
स्वप्न को सच मानने से, सत्य हो सपना नहीं।।१।।

स्वार्थ के संबंध सारे 
स्वार्थ पर यह जग टिका
अधिक या कम मोल, लेकिन 
है यहाँ सब कुछ बिका

सज गया बाजार में जो, वह कभी अपना नहीं।
स्वप्न को सच मानने से, सत्य हो सपना नहीं।।२।।

कर्मफल पूँजी-प्रतिष्ठित
यह जगत व्यापार है
सकल सुख-दुख का यहाँ पर
कर्म ही आधार है 

जो मिला सब कुछ तुम्हारा, और पर मढ़ना नहीं।
स्वप्न को सच मानने से, सत्य हो सपना नहीं।।३।।

- राजेश मिश्र

मंगलवार, 17 मार्च 2026

मैं वह नदिया

मैं वह नदिया प्यासी है जो, प्यास बुझाकर सबकी।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। 

चाहे जितना भी थकती हूँ,
पर अविरल बहती रहती हूँ।
पग-पग पर कंकड़-पत्थर की
चोटें चुप सहती रहती हूँ।

वर्षा-आतप-हिम सह स्वागत करती हँस-हँस सबकी।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। १।।

जिनके हित निशि-दिन दौड़ूँ मैं
अपनी बाँहो को फैलाए।
निज हित हित वे लादें मुझ पर
नित नव बाँधों की बाधाएँ।

मर्यादाएँ जब-जब टूटीं, काल बनीं अग-जग की।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। २।।

व्यथा हृदय की सीमा लाँघे,
चिर-निद्रा को मैं ललचाऊँ।
द्रोणपुत्र-सी शापित लेकिन 
मृत्यु भला मैं कैसे पाऊँ?

बिना प्रलय के मुक्ति मुझे कब? राह निहारूँ कबकी।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। ३।।

- राजेश मिश्र

बुधवार, 21 जनवरी 2026

जीवन चौथेपन में दुष्कर

जीवन चौथेपन में दुष्कर,
धीरज धरना पड़ता है।
मरने से पहले वर्षों तक
घुट-घुट मरना पड़ता है।।

दुखित व्यक्ति का साथ जगत् में
किसको ईप्सित होता है,
घोंट गला दुख का, हँसने का
अभिनव करना पड़ता है‌।।

वाणी के तीखे तीरों से
हत हृत् क्रंदन करता है,
नीलकंठ-सा गरल कंठ में
धारण करना पड़ता है।।

पुण्य-अपुण्य कर्म-वृक्षों पर
सुख-दुख के फल लगते हैं,
गठरी ले जाते जो जग से,
आकर भरना पड़ता है।।

कर्मबंध के कारण जग में
आवागमन सतत चलता,
मुक्ति हेतु नित मन-इंद्रिय पर 
संयम करना पड़ता है।।

- राजेश मिश्र 

सोमवार, 12 जनवरी 2026

मधुप मन नाच उठता है

महकती मुस्कुराहट पर मधुप मन नाच उठता है। 
तुम्हारी एक आहट पर मधुप मन नाच उठता है।।

नासिकाभरण-द्युतिमंडल,
दमकते कान के कुण्डल।
मचलते किंकिणी कंगन,
चहकती चूड़ियाँ पायल।

तनिक-सी खनखनाहट पर मधुप मन नाच उठता है।
तुम्हारी एक आहट पर मधुप मन नाच उठता है।।१।।

थिरकते अंग इतराते,
नयन मदनीय मदमाते।
त्वचा मृदु रंग सिंदूरी
केश कटि-कूल बल खाते,

दशन-दल झिलमिलाहट पर मधुप मन नाच उठता है।
तुम्हारी एक आहट पर मधुप मन नाच उठता है।।२।।

व्यथित हृत् हर्ष भर जाएँ
चित्रिणी चपल चेष्टाएँ।
गमकती गंध कस्तूरी 
रसीले बोल बिखराएँ।

खनकती खिलखिलाहट पर मधुप मन नाच उठता है।
तुम्हारी एक आहट पर मधुप मन नाच उठता है।।३।।

- राजेश मिश्र

सोमवार, 5 जनवरी 2026

कुंडलियाँ

(१)

कोई भी सरकार हो, आरक्षण बढ़ जाय।
अरु शासन की दक्षता, दिन-दिन घटती जाय।।
दिन-दिन घटती जाय दक्षता मरती जाये।
अक्षम परजीवी की संख्या बढ़ती जाये।।
कह राजेश कि देश-धर्म को कौन बचाये। 
कोई भी सरकार समाज बाँटती जाए।।

(२)

संविधान की आत्मा, कैसे रहे अपेल।
दशकों से जब चल रहा, आरक्षण का खेल।।
आरक्षण का खेल देश दीमक सा चाटे।
सदियों से संपृक्त समाज शत्रु बन बाँटे।।
कह राजेश दरार दिनोंदिन बढ़ती जाए।
राजनीति अति क्रूर नए नित जाल बिछाए।।

(३)

बंगलादेश में हो रहा, बर्बर अत्याचार।
निर्बल नम्र निरीह हर, हिन्दू है लाचार।।
हिन्दू है लाचार जलाई जायँ बस्तियाँ।
जलकर मरते लोग लुट रहीं बहन-बेटियाँ।।
यहाँ सो रहे कोटि-कोटि चुप चद्दर ताने।
लीलेगी यह आग, आज मानें मत मानें।।


गुरुवार, 1 जनवरी 2026

देख लेना आस-पास

जब तुम्हारा मन दुखित हो, देख लेना आस-पास।
जब अभावों से ग्रसित हो, देख लेना आस-पास।।

वेदनाएँ देख सबकी निज व्यथा अति लघु लगेगी,
हिय तुम्हारा जब व्यथित हो, देख लेना आस-पास।

एक ही सच लोग जितने बात उतने ही तरह की,
बुद्धि जब सुनकर भ्रमित हो, देख लेना आस-पास।

इस जगत में कुछ नहीं है जो सदा सुखकर लगे,
कष्ट सीमा से अधिक हो, देख लेना आसपास।

हर समस्या हल करे कोई कभी संभव नहीं,
विपद कोई उपस्थित हो, देख लेना आस-पास। 

जन्म का गन्तव्य जग में मृत्यु ही तो है सदा,
जब अघट कोई घटित हो, देख लेना आस-पास।

- राजेश मिश्र 

नव वर्ष

बीते संवत की स्मृतियाँ ले नए वर्ष के संग चलें।
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।

जीवन-पथ पर आगे बढ़ते
एक और सन छूट गया है।
नवल वर्ष नव मीत बना है,
गत से नाता टूट गया है।

क्या सचमुच संबंध पूरते तज यदि कोई संग चले?
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।१।।

विगत वर्ष या विगत व्यक्ति को
क्या हम कभी भूल पाते हैं?
जीवन जब तक है तब तक वे 
यादों में आते जाते हैं।

मन में उनकी मृदु यादों की लेकर सदा तरंग चलें।
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।२।।

आगत के स्वागत में लेकिन
विघ्न विगत मत बनने पाए।
एक द्रवित छूकर कर जाए,
दूजा छूकर मन हरषाए। 

सामंजस्य रहे दोनों में हम कुछ ऐसे ढंग चलें। 
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।३।।

कज = दोष, छल

- राजेश मिश्र

"सौमित्र की सिंहगर्जना

धधक रही है ज्वाला उर में फटने को तैयार शिरायें। आँखों से चिनगारी फूटे, फड़क रही हैं व्यग्र भुजायें।। क्रोध भयंकर कालिय-विष सा पल में सब कुछ ...