मंगलवार, 17 मार्च 2026

मैं वह नदिया

मैं वह नदिया प्यासी है जो, प्यास बुझाकर सबकी।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। 

चाहे जितना भी थकती हूँ,
पर अविरल बहती रहती हूँ।
पग-पग पर कंकड़-पत्थर की
चोटें चुप सहती रहती हूँ।

वर्षा-आतप-हिम सह स्वागत करती हँस-हँस सबकी।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। १।।

जिनके हित निशि-दिन दौड़ूँ मैं
अपनी बाँहो को फैलाए।
निज हित हित वे लादें मुझ पर
नित नव बाँधों की बाधाएँ।

मर्यादाएँ जब-जब टूटीं, काल बनीं अग-जग की।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। २।।

व्यथा हृदय की सीमा लाँघे,
चिर-निद्रा को मैं ललचाऊँ।
द्रोणपुत्र-सी शापित लेकिन 
मृत्यु भला मैं कैसे पाऊँ?

बिना प्रलय के मुक्ति मुझे कब? राह निहारूँ कबकी।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। ३।।

- राजेश मिश्र

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हे लखन! उठो प्रिय भ्रात प्रात अब होने वाली है।। शयित उषा-दृग खुलने वाले लाली छाती होगी। पुरखों का आशीष समेटे किरणें आती होंगी। बीती घन काली ...