शुक्रवार, 5 जून 2026

बिजली रानी! क्या मनमानी?

बिजली रानी! क्या मनमानी? कितना हमें सताती हो!
रहना मुश्किल बिना तुम्हारे, छोड़ हमें क्यों जाती हो?

बिल तो हम पूरा देते हैं, टाइम पर भर आते हैं,
फिर भी क्यों तुम गाल फुलाकर धड़कन सदा बढ़ाती हो?

तुम बिन वाई-फाई, पंखे, एसी सब मर जाते हैं,
यम के जैसा प्राण सभी का निर्दय बन हर जाती हो।

कष्ट कोई तो बतला दो तुम, कही किसी ने बात कोई?
उससे हम लड़ लेंगे, यदि तुम सब कुछ हमें बताती हो!

लेकिन बार-बार हमको यूँ, फिर से छोड़ न जाना तुम,
तुम जाती, खुशियाँ ले जाती, मृत जैसा कर जाती हो।

- राजेश मिश्र

आज फिर कुछ मन व्यथित है

आज फिर कुछ मन व्यथित है! 

छोड़कर पीछे झमेला
पा रहा निज को अकेला 
तृषित मन नित तड़पता है 
नेह-जल हित तरसता है 

खेद से रग-रग ग्रसित है!।१।।

छोड़ जब घर-बार निकला
जीतने संसार निकला 
स्वप्न आँखों में बड़े थे 
शक्ति से युग-भुज भरे थे 

कब पता था दिग्भ्रमित है!।२।।

माँ-पिता का प्यार खोया
प्रेम का संसार खोया
खो गए संबंध सारे 
खो गए सारे सहारे 

बोझ दुख का ले थकित है!।३।।

- राजेश मिश्र 

और जाना है मुझे

रोकते हैं दृग-युगल पग, और जाना है मुझे।
चल न पाया एक भी डग, और जाना है मुझे।।

था बिताना पल खुशी के कुछ तुम्हारे साथ में,
तुम अभी आए यहाँ पर, और जाना है मुझे।

बात कहनी थी तुम्हें जो, अनकरी ही रह गई,
पास तुम आए झिझकते, और जाना है मुझे।

लड़ रहे थे हर लड़ाई तुम अकेले उम्र भर,
आज अब माँगा सहारा, और जाना है मुझे।

बचपने ने बस चखा है रस पिता के प्यार का,
भूख मिटने भी न पाई, और जाना है मुझे।

देखते माँ-बाप बूढ़े अश्रु भरकर आँख में,
आसरा अब बस तुम्हारा, और जाना है मुझे।

- राजेश मिश्र

दोराहे पर अटका हूँ मैं

दोराहे पर अटका हूँ मैं, जीवन के दो पन बीते।
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।

गाँठें बरसों की खुलना भी
है इतना आसान नहीं।
बिना सहारे खोल सके अब 
अंगुलियों में जान नहीं।

गुरु-विहीन का कौन सहारा, हाथ पकड़ ऊपर खींचे।
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।१।।

जिस पथ पर चलता आया हूँ
उसका अनुभव कुछ तो है।
क्या-क्या हो सकता है आगे,
यह प्रतीति मन कुछ तो है।

नव-पथ पर चल पाऊँगा भी, लौट न आऊँगा पीछे?
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।२।।

मन दुविधा में फँसा हुआ है 
समझ न आए किधर चलूँ।
जग ही सब कुछ? या सब मिथ्या?
कैसे यह निश्चय कर लूँ।

अतिशय कठिन डोर उलझन की, उसी राह पुनि पुनि खींचे। 
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।३।।

- राजेश मिश्र 

बिजली रानी! क्या मनमानी?

बिजली रानी! क्या मनमानी? कितना हमें सताती हो! रहना मुश्किल बिना तुम्हारे, छोड़ हमें क्यों जाती हो? बिल तो हम पूरा देते हैं, टाइम पर भर आते ह...