शुक्रवार, 5 जून 2026

दोराहे पर अटका हूँ मैं

दोराहे पर अटका हूँ मैं, जीवन के दो पन बीते।
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।

गाँठें बरसों की खुलना भी
है इतना आसान नहीं।
बिना सहारे खोल सके अब 
अंगुलियों में जान नहीं।

गुरु-विहीन का कौन सहारा, हाथ पकड़ ऊपर खींचे।
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।१।।

जिस पथ पर चलता आया हूँ
उसका अनुभव कुछ तो है।
क्या-क्या हो सकता है आगे,
यह प्रतीति मन कुछ तो है।

नव-पथ पर चल पाऊँगा भी, लौट न आऊँगा पीछे?
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।२।।

मन दुविधा में फँसा हुआ है 
समझ न आए किधर चलूँ।
जग ही सब कुछ? या सब मिथ्या?
कैसे यह निश्चय कर लूँ।

अतिशय कठिन डोर उलझन की, उसी राह पुनि पुनि खींचे। 
नव गंतव्य राह नव पकड़ूँ, या चलता जाऊँ सीधे?।३।।

- राजेश मिश्र 

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