गुरुवार, 30 जुलाई 2026

कितना मुश्किल होता है

इक छोटा परिवार चलाना कितना मुश्किल होता है।
आशाएँ पूरी कर पाना कितना मुश्किल होता है‌।।

संभव नहीं सभी की उम्मीदों पर खरा उतर पाना, 
किंतु उन्हें यह समझा पाना कितना मुश्किल होता है‌।

बहुत सरल है प्रश्न उठाना और किसी की क्षमता पर,
किंतु वही खुद कर दिखलाना कितना मुश्किल होता है।

दुनिया की हर एक चुनौती हँसकर है स्वीकार हमें,
लेकिन अपनों से लड़ पाना कितना मुश्किल होता है।

सबकी गलती पर उठ जाती है उंगली आसानी से, 
निज गलती का ढोल बजाना कितना मुश्किल होता है।

जहर तुम्हारे हिस्से का भी पी लेंगे हम, हमें पता है
रोक गले में इसको पाना कितना मुश्किल होता है। 

- राजेश मिश्र

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

राम का नाम लेकर जिएँ उम्र भर

राम का नाम लेकर जिएँ उम्र भर,
मौत पर राम का नाम मुख में रहे।
भाव ऐसा भरो राम! मन में मेरे,
प्रश्न कुछ भी रहे राम ही हम कहें।।

राम का नाम लेकर उठें प्रात में,
राम का नाम लेकर शयन हम करें।
राम से काम का हर शुभारंभ हो, 
राम का नाम लेकर अशन हम करें। 

राम का नाम ले घर से निकलें सदा, 
हर कदम राम का नाम संग-संग रहे।
भाव ऐसा भरो राम! मन में मेरे,
प्रश्न कुछ भी रहे राम ही हम कहें।।१।।

राम हों वाक् में, कर्म में राम हों,
राम हों चक्षु में, कर्ण में राम हों।
श्वास में अनवरत राम का नाम हो,
राम मन में रमें, भाव में राम हों। 

राम में प्रेम बढ़ता रहे रात-दिन 
राम हित हम सभी दुःख सुख से सहें।
भाव ऐसा भरो राम! मन में मेरे,
प्रश्न कुछ भी रहे राम ही हम कहें।।२।।

राम जंगम बसें, राम जड़ में बसें,
राम चेतन बसें, हर अचेतन बसें।
हैं उपादान प्रभु राम ही सृष्टि के,
दृष्टि निर्दोष यदि, राम कण-कण बसें। 

राम के नाम का घोष है हर तरफ, 
हर हृदय की धड़क राम ही बस कहे ।
भाव ऐसा भरो राम! मन में मेरे,
प्रश्न कुछ भी रहे राम ही हम कहें।।३।।

अशन = भोजन

- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

जहाँ जायें तुम्हें ढूँढें

भले हो भीड़ लाखों की जहाँ जायें तुम्हें ढूँढें।
अजब आदत इन आँखों की जहाँ जायें तुम्हें ढूँढें।।

कभी जब मन तड़पता है किसी के साथ की खातिर,
न देखें और की जानिब ये अकुलाएँ तुम्हें ढूँढें।

छलकता जाम महफिल में, सभी गाफिल हैं पी-पीकर,
पर इनको कुछ नहीं भाए, जिधर देखें, तुम्हें ढूँढें।

बरसती धार अमृत की मुसलसल चाँद से छनकर,
मगर प्यासी ये रह जाएँ, न पी पाएँ, तुम्हें ढूँढें।

तुम्हारे हुस्न की मारी बहुत कुछ सुन चुकीं फिर भी,
अभी भी बाज कब आएँ, तुम्हें चाहें तुम्हें ढूँढें।

- राजेश मिश्र 

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

मैं सभी कुछ लुटाकर लुटेरा बना

हर अँधेरी निशा का सवेरा बना।
मैं सभी कुछ लुटाकर लुटेरा बना।।

दैव ने उस दुखद मोड़ पर ला दिया, 
तू न मेरी बनी, मैं न तेरा बना।।

दोष उनको निराश्रित किया लग रहा
जिन खगों का हमेशा बसेरा बना।

मार्ग पर दूसरों को उजाला दिया,
पर स्वयं उम्र भर इक अँधेरा बना।।

बस न पाया किसी के हृदय में कभी,
सर्वदा दुःख का घन घनेरा बना।।

घाव इतने मिले जिंदगी में मुझे,
दर्द ही जिंदगी का चितेरा बना।।

- राजेश मिश्र

हे लखन! उठो प्रिय भ्रात

हे लखन! उठो प्रिय भ्रात प्रात अब होने वाली है।। शयित उषा-दृग खुलने वाले लाली छाती होगी। पुरखों का आशीष समेटे किरणें आती होंगी। बीती घन काली ...