रविवार, 26 अक्टूबर 2025

वसुधैव कुटुंबकम

बात-बात पर रटते रहते 
वसुधा एव कुटुम्बकम्।
पता नहीं कब टूटेगा भ्रम
वसुधा एव कुटुम्बकम्।।

शत्रु चतुर्दिक घात लगाए 
हम आंखें मूंदें बैठे ।
घुन बनकर खोखला कर रहे
सदियों से घर में पैठे।
कायरता का बना आवरण 
वसुधा एव कुटुम्बकम्।
पता नहीं कब टूटेगा भ्रम
वसुधा एव कुटुम्बकम्।।

संस्कृति-संस्कृत से पराङ्मुख
अति दयनीय दशा में है।
डगमग डग मग चला जा रहा
धुत निरपेक्ष नशा में है।
शास्त्र न माने, किंतु उचारे
वसुधा एव कुटुम्बकम्।
पता नहीं कब टूटेगा भ्रम
वसुधा एव कुटुम्बकम्।।

पूरी पृथ्वी ही कुटुंब है
पग-पग पर उपदेश करे।
निज कुटुंब में अपनों से ही
नित-प्रति लेकिन द्वेष करे।
भाई दुश्मन, दुश्मन भाई
वसुधा एव कुटुम्बकम्।
पता नहीं कब टूटेगा भ्रम
वसुधा एव कुटुम्बकम्।।

- राजेश मिश्र

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