रविवार, 10 मई 2026

माँ! धरा का धीर है तू

दुःख-आतप तप्त जग में छाँव घन, मृदु नीर है तू।
माँ! धरा का धीर है तू।।

वेद-विद् कहते सदा से
जीव ईश्वर अंश है यह
ईश्वरी! तुझसे सृजित ही
जगत का हर वंश है यह

जड़ जगत में ब्रह्म की प्रतिमूर्ति है, तस्वीर है तू!
माँ! धरा का धीर है तू।।१।।

पावनी निज कोख धरकर
रक्त से सींचे-सँवारे
प्रसव की दारुण व्यथा सह 
नर्क से तू ही उबारे

दुःख के भवसिन्धु में माँ! हारिणी हर पीर है तू।
माँ! धरा का धीर है तू।।२।।

सुखमयी माँ! वृष्टि है तू
आद्य शाश्वत सृष्टि है तू
स्वार्थरत संसार में माँ!
शुभकरी, शुभ-दृष्टि है तू

सोख ले संताप-सागर, भूसुता-पति तीर है तू।
माँ! धरा का धीर है तू।।३।।

- राजेश मिश्र 

शनिवार, 9 मई 2026

आज उपवन फिर खिला है

 ने करवट लिया है, प्राक केसरिया हुआ है,
आज उपवन फिर खिला है।।

रात्रि में अब दम नहीं है 
सिसकियाँ भी थम रही हैं
शुष्क आँखें नम हुई हैं
अब व्यथा कुछ कम हुई है 

उर उजाला भर रहा है, भाव-बिह्वल कर रहा है,
तमस का टूटा किला है।।१।।

लालिमा बढ़ने लगी है
रश्मि गिरि चढ़ने लगी है 
विहग कलरव कर रहे हैं 
मृग कुलाँचे भर रहे हैं 

घोर अँधियारा मिटा है, शुभकरी सुखकर छटा है,
प्रिय उषा का आ मिला है।।२।।

पृथुक पूषण ताप पाकर 
भोर का मृदु थाप पाकर
विहँसती कोमल कली है
वायु सुरभित बह चली है

कमल-दल-पट खुल रहे हैं, मुक्त मधुकर उड़ रहे हैं,
 धैर्य का प्रतिफल मिला है।।३।।

प्राक = पूर्व दिशा
तमस = अंधकार
रश्मि = किरण
पृथुक = बालक
पूषण = सूर्य 

- राजेश मिश्र

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