शनिवार, 9 मई 2026

आज उपवन फिर खिला है

 ने करवट लिया है, प्राक केसरिया हुआ है,
आज उपवन फिर खिला है।।

रात्रि में अब दम नहीं है 
सिसकियाँ भी थम रही हैं
शुष्क आँखें नम हुई हैं
अब व्यथा कुछ कम हुई है 

उर उजाला भर रहा है, भाव-बिह्वल कर रहा है,
तमस का टूटा किला है।।१।।

लालिमा बढ़ने लगी है
रश्मि गिरि चढ़ने लगी है 
विहग कलरव कर रहे हैं 
मृग कुलाँचे भर रहे हैं 

घोर अँधियारा मिटा है, शुभकरी सुखकर छटा है,
प्रिय उषा का आ मिला है।।२।।

पृथुक पूषण ताप पाकर 
भोर का मृदु थाप पाकर
विहँसती कोमल कली है
वायु सुरभित बह चली है

कमल-दल-पट खुल रहे हैं, मुक्त मधुकर उड़ रहे हैं,
 धैर्य का प्रतिफल मिला है।।३।।

प्राक = पूर्व दिशा
तमस = अंधकार
रश्मि = किरण
पृथुक = बालक
पूषण = सूर्य 

- राजेश मिश्र

आज उपवन फिर खिला है

 ने करवट लिया है, प्राक केसरिया हुआ है, आज उपवन फिर खिला है।। रात्रि में अब दम नहीं है  सिसकियाँ भी थम रही हैं शुष्क आँखें नम हुई हैं अब व्य...