सान्द्र कानन में बिलखता घूमता है।
व्यग्र वनवासी प्रिया को ढूँढता है।।
डगमगाते डगर डगमग पाँव पग-पग,
तन-विकम्पित मत्त-गज इव झूमता है।।
झर रहा नित नैन-निर्झर नीर निर्मल,
गण्ड-द्वय से ढुलकता उर चूमता है।।
आर्त मन, अवरुद्ध गल, अति भाव-विह्वल,
बुदबुदाता क्षीण-सा स्वर फूटता है।।
वृक्ष-वल्ली पुष्प षट्पद पशु-पतत्रिन्
हर किसी से सन्निकट जा पूछता है।।
लोचनी-मृग चन्द्रवदनी सीय देखा?
मौन पर सतत सबके हिय टूटता है।।
सान्द्र - सघन, घना
गण्ड - गाल
गल - गला
वल्ली - लता
षट्पद - भौंरा
पतत्रिन्= पक्षी
- राजेश मिश्र
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