धर्म जगत में परम अहिंसा बार-बार दुहराया है।।
सभी चराचर जीवों का हम सदा उचित सम्मान करें।
प्रेम-भाव जड़-चेतन के प्रति, सबका ही कल्याण करें।
द्वेष न पालें, शत्रु-मित्र प्रति अपनी दृष्टि समान करें।
कभी किसी को कष्ट न पहुँचे पल-पल इसका ध्यान धरें।
भारत के दर्शन-चिन्तन ने गूढ़ अर्थ समझाया है।
धर्म अहिंसा परम जगत में बार-बार दुहराया है।।१।।
किसी जीव को शारीरिक पीड़ा पहुँचाना हिंसा है।
वचन कठोर बोलकर उसका हृदय दुखाना हिंसा है।
कोई विकृत सोच उसके प्रति मन में लाना हिंसा है।
और घृणा-अपमान भरी दुर्दृष्टि उठाना हिंसा है।
गहन विचार किया मुनियों ने रूप यथार्थ दिखाया है।
धर्म अहिंसा परम जगत में बार-बार दुहराया है।।२।।
अरु जो हिंसा का अभाव है, समझो वही अहिंसा है।
मन कुभाव का यदि अभाव है, समझो वही अहिंसा है।
किसी जीव का प्राण न हरना, समझो वही अहिंसा है।
तन-मन-वचन दुखी नहिं करना, समझो वही अहिंसा है।
ईश्वर-ऋषियों-मुनियों सबने यही मार्ग दिखलाया है।
धर्म जगत में परम अहिंसा बार-बार दुहराया है।।३।।
किन्तु अहिंसा हिंसा प्रतिहिंसा पर और विचार हुआ।
हर हिंसा क्या हिंसा होती, मन्थन अमित अपार हुआ।
हर परिवेश, परिस्थिति, आवश्यकता के अनुसार हुआ।
एक नहीं, दो बार नहीं, यह चिन्तन बारम्बार हुआ।
क्या हरदम हिंसा मानें जो नयनों ने दिखलाया है?
धर्म जगत में परम अहिंसा बार-बार दुहराया है।।४।।
शल्य-चिकित्सा, राष्ट्र-सुरक्षा, क्या सचमुच हिंसा होती है?
आत्मसुरक्षा, निज-जन रक्षा, क्या सचमुच हिंसा होती है?
धर्म हेतु हथियार उठाना, क्या सचमुच हिंसा होती होती है?
आततायियों को निपटाना, क्या सचमुच हिंसा होती है?
बार-बार परमेश्वर ने फिर क्यों हथियार उठाया है?
धर्म जगत में परम अहिंसा बार-बार दुहराया है।।५।।
केशव ने जब समराङ्गण में गीता का उपदेश दिया।
कातर मोहित विह्वल अर्जुन की आशङ्का शेष किया।
राम-लखन ने कुल समेत जब रावण को निशःशेष किया।
वीर युवाओं ने अंग्रेजी सत्ता का परिशेष किया।
दवा गरल की गरल मात्र है, साफ-साफ सिखलाया है।
धर्म जगत में परम अहिंसा बार-बार दुहराया है।।६।।
- राजेश मिश्र