शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

अहिंसा परमो धर्मः

वेद-शास्त्र सारे ग्रन्थों ने हमको यह बतलाया है।
धर्म जगत में परम अहिंसा बार-बार दुहराया है।।

सभी चराचर जीवों का हम सदा उचित सम्मान करें।
प्रेम-भाव जड़-चेतन के प्रति, सबका ही कल्याण करें।
द्वेष न पालें, शत्रु-मित्र प्रति अपनी दृष्टि समान करें।
कभी किसी को कष्ट न पहुँचे पल-पल इसका ध्यान धरें।

भारत के दर्शन-चिन्तन ने गूढ़ अर्थ समझाया है।
धर्म अहिंसा परम जगत में बार-बार दुहराया है।।१।। 

किसी जीव को शारीरिक पीड़ा पहुँचाना हिंसा है। 
वचन कठोर बोलकर उसका हृदय दुखाना हिंसा है।
कोई विकृत सोच उसके प्रति मन में लाना हिंसा है। 
और घृणा-अपमान भरी दुर्दृष्टि उठाना हिंसा है।

गहन विचार किया मुनियों ने रूप यथार्थ दिखाया है।
धर्म अहिंसा परम जगत में बार-बार दुहराया है।।२।।

अरु जो हिंसा का अभाव है, समझो वही अहिंसा है।
मन कुभाव का यदि अभाव है, समझो वही अहिंसा है।
किसी जीव का प्राण न हरना, समझो वही अहिंसा है।
तन-मन-वचन दुखी नहिं करना, समझो वही अहिंसा है।

ईश्वर-ऋषियों-मुनियों सबने यही मार्ग दिखलाया है।
धर्म जगत में परम अहिंसा बार-बार दुहराया है।।३।।

किन्तु अहिंसा हिंसा प्रतिहिंसा पर और विचार हुआ।
हर हिंसा क्या हिंसा होती, मन्थन अमित अपार हुआ।
हर परिवेश, परिस्थिति, आवश्यकता के अनुसार हुआ।
एक नहीं, दो बार नहीं, यह चिन्तन बारम्बार हुआ।

क्या हरदम हिंसा मानें जो नयनों ने दिखलाया है?
धर्म जगत में परम अहिंसा बार-बार दुहराया है।।४।।

शल्य-चिकित्सा, राष्ट्र-सुरक्षा, क्या सचमुच हिंसा होती है?
आत्मसुरक्षा, निज-जन रक्षा, क्या सचमुच हिंसा होती है?
धर्म हेतु हथियार उठाना, क्या सचमुच हिंसा होती होती है?
आततायियों को निपटाना, क्या सचमुच हिंसा होती है?

बार-बार परमेश्वर ने फिर क्यों हथियार उठाया है?
धर्म जगत में परम अहिंसा बार-बार दुहराया है।।५।।

केशव ने जब समराङ्गण में गीता का उपदेश दिया। 
कातर मोहित विह्वल अर्जुन की आशङ्का शेष किया।
राम-लखन ने कुल समेत जब रावण को निशःशेष किया।
वीर युवाओं ने अंग्रेजी सत्ता का परिशेष किया।

दवा गरल की गरल मात्र है, साफ-साफ सिखलाया है।
धर्म जगत में परम अहिंसा बार-बार दुहराया है।।६।।

- राजेश मिश्र

रघुवर कब आओगे?

नैऩन नीर स्रवत है निशिदिन, रघुवर कब आओगे?
मन बदला, तन छूट गया तो प्रभुवर पछताओगे।।

जनम-जनम से राह निहारूँ
पल-पल केवल तुम्हें पुकारूँ
अब तो दर्शन दे दो राघव, कब तक तड़पाओगे?
मन बदला…(१)

कण-कण ढूँढ़ूँ, क्षण-क्षण ढूँढ़ूँ
अचला अम्बर उडुगण ढूँढ़ूँ
एक झलक को तरस रहा मन, छुपकर क्या पाओगे?
मन बदला…(२)

युग-युग भटका सरबस खोई
हृदय न भावे दूजा कोई 
बस तुमसे ही लगन लगी है, कह दो अपनाओगे? 
मन बदला…(३)

- राजेश मिश्र 

ब्राह्मण

स्वाभिमानी सदा से रहा ब्राह्मण, 
किंतु अभिमान से वह अछूता रहा।
राष्ट्रहित-धर्महित सर्वदा बलि हुआ, 
नित्य अपमान से वह अछूता रहा।।
स्वारथी जातिगत-द्वेष भड़का रहे, 
क्षुद्र अभियान से वह अछूता रहा। 
सोच उसकी सनातन सनातन रही, 
स्वार्थ-अज्ञान से वह अछूता रहा।।

- राजेश मिश्र

दोहे

पितरों का जो नर करे, आजीवन सम्मान। 
लहै कृपा रघुनाथ की, जीवन में धन-मान।।१।।

श्राद्ध समर्पण सह करें, राखि हृदय में प्रेम।
पितरों के आशीष से, पग-पग जग में क्षेम।।२।।

स्वारथरत संसार में, निःस्वारथ नहिं कोय।
मातु-पिता गुरुदेव से, बढ़कर सुहृद न होय।।३।।

नित-प्रति उठकर जो धरें, मातु-पिता पद शीश।
पाप-ताप-परिताप से, मुक्त करें जगदीश।।४।।

माँ ममता प्रतिमूर्ति हैं, पिता आत्मविश्वास। 
सन्तानों पर वार दें, जीवन की हर श्वास।।५।।

सहज सदय शुभकर सदा, मातू-पिता बिनु चाह।
उनके निश्छल प्रेम की, नहीं किसी को थाह।।६।।

मातु-पिता के दृग-कमल, जो नर आँसू देहिं।
उनकी सब सुख-सम्पदा, रघुकुलमणि हरि लेहिं।।७।।

अहिंसा परमो धर्मः

वेद-शास्त्र सारे ग्रन्थों ने हमको यह बतलाया है। धर्म जगत में परम अहिंसा बार-बार दुहराया है।। सभी चराचर जीवों का हम सदा उचित सम्मान करें। प्र...