शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

दोहे

पितरों का जो नर करे, आजीवन सम्मान। 
लहै कृपा रघुनाथ की, जीवन में धन-मान।।१।।

श्राद्ध समर्पण सह करें, राखि हृदय में प्रेम।
पितरों के आशीष से, पग-पग जग में क्षेम।।२।।

स्वारथरत संसार में, निःस्वारथ नहिं कोय।
मातु-पिता गुरुदेव से, बढ़कर सुहृद न होय।।३।।

नित-प्रति उठकर जो धरें, मातु-पिता पद शीश।
पाप-ताप-परिताप से, मुक्त करें जगदीश।।४।।

माँ ममता प्रतिमूर्ति हैं, पिता आत्मविश्वास। 
सन्तानों पर वार दें, जीवन की हर श्वास।।५।।

सहज सदय शुभकर सदा, मातू-पिता बिनु चाह।
उनके निश्छल प्रेम की, नहीं किसी को थाह।।६।।

मातु-पिता के दृग-कमल, जो नर आँसू देहिं।
उनकी सब सुख-सम्पदा, रघुकुलमणि हरि लेहिं।।७।।

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