सीय सुकुमारी चली है, कर-युगल वरमाल ले।।
कलित-कोमल-कमल-पद से
लिपट नूपुर झूमते हैं।
कर्ण-कुण्डल-युग मचलकर
चन्द्र-सा मुख चूमते हैं।
पाणि कङ्कण श्रोणि किङ्किणि, शिरोभूषण भाल ले।
सीय सुकुमारी चली है, कर-युगल वरमाल ले।।१।।
पद अलक्तक, तिलक-कुङ्कुम
अरुण-अम्बर सोहता है।
ललित लाली लसत नख-शिख
नेत्र अरुणिम मोहता है।
नासिका-मौक्तिक दमकता, छवि रदच्छद लाल ले।
सीय सुकुमारी चली है, कर-युगल वरमाल ले।।२।।
स्मित मधुर मृदु, मौन मुखरित
नयन सकुचित बोलते हैं।
खोलते हैं भेद हिय के
अङ्ग जब-जब डोलते हैं।
कर रही त्रैलोक्य दीपित, देह-द्युति पिञ्जाल ले।
सीय सुकुमारी चली है, कर-युगल वरमाल ले।।३।।
वपुसृ - शरीर
पद्मिनी - गज, हाथी
कलित - सुसज्जित, शोभित, सुंदर
पाणि - हाथ
कङ्कण - कंगन
श्रोणि - कमर
किङ्किणि - करधनी
शिरोभूषण - माँगटीका
अलक्तक - अल्ता, महावर
अरुण-अम्बर - लाल वस्त्र
रदच्छद - होंठ
पिञ्जाल - स्वर्ण, सोना
- राजेश मिश्र
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