गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

पीढ़ियाँ शत-शत कटें जब युद्ध में तब बुद्ध जनमे

पीढ़ियाँ शत-शत खपें जब युद्ध में तब बुद्ध जनमे।
वीर बलि चढ़ते करोड़ों युद्ध में तब बुद्ध जनमे।।

है सरल उपदेश देना 
प्रेम का, परमार्थ का।
पर कठिन बलिदान देना 
त्याग करके स्वार्थ का।

त्यागतीं सर्वस्व सदियाँ युद्ध में तब बुद्ध जनमे।
वीर बलि चढ़ते करोड़ों युद्ध में तब बुद्ध जनमे।।१।।

शान्ति अनुचर ही रही है 
सर्वदा से शक्ति की। 
शक्ति ही केदार, धारे
बीज करुणा-भक्ति की।

नवयुवक नित प्राण तजते युद्ध में तब बुद्ध जनमे।
वीर बलि चढ़ते करोड़ों युद्ध में तब बुद्ध जनमे।।२।।

देख लो इतिहास, पन्ने 
पलट लो, सब बाँच लो। 
शक्ति से जनमे अहिंसा 
पले-पोसे जाँच लो।

दुष्ट असि का ग्रास बनते युद्ध में तब बुद्ध जनमे।
वीर बलि चढ़ते करोड़ों युद्ध में तब बुद्ध जनमे।।३।।

केदार - खेत
असि - खड्ग, तलवार 
ग्रास - कौर, निवाला, आहार

- राजेश मिश्र

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