बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

चौदह वर्ष कटेंगे कैसे

बिलख रही है विरहाकुल अति अवधपुरी रघुनाथ बिना।
चौदह वर्ष कटेंगे कैसे राम-लखन-सिय साथ बिना।।

सूने-सूने गाँव-नगर हैं,
सूनी सूनी हैं राहें।
सूने-सूने घर आँगन सब
गूँज रहीं केवल आहें।

सब-के-सब श्रीहीन हो गये हैं नाथों के नाथ बिना।
चौदह वर्ष कटेंगे कैसे राम-लखन-सिय साथ बिना।।१।।

कई दिनों से आसमान में 
नहीं कहीं से धुआँ उठा।
भूख-प्यास की सुध-बुध किसको
हर कोई बस लुटा-लुटा।

सभी सनाथ अनाथ हो गए सिर रघुवर के हाथ बिना।
चौदह वर्ष कटेंगे कैसे राम-लखन-सिय साथ बिना।।२।।

बड़भागी राजा दशरथ ने
प्राण तजा प्रभु के जाते।
जीवित रहकर भी क्या करते 
जीते जी ही मर जाते।

सिंहासन रो-रो कर कहता मुकुट करे क्या माथ बिना।
चौदह वर्ष कटेंगे कैसे राम-लखन-सिय साथ बिना।।३।।

- राजेश मिश्र

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चौदह वर्ष कटेंगे कैसे

बिलख रही है विरहाकुल अति अवधपुरी रघुनाथ बिना। चौदह वर्ष कटेंगे कैसे राम-लखन-सिय साथ बिना।। सूने-सूने गाँव-नगर हैं, सूनी सूनी हैं राहें। सूने...