चौदह वर्ष कटेंगे कैसे राम-लखन-सिय साथ बिना।।
सूने-सूने गाँव-नगर हैं,
सूनी सूनी हैं राहें।
सूने-सूने घर आँगन सब
गूँज रहीं केवल आहें।
सब-के-सब श्रीहीन हो गये हैं नाथों के नाथ बिना।
चौदह वर्ष कटेंगे कैसे राम-लखन-सिय साथ बिना।।१।।
कई दिनों से आसमान में
नहीं कहीं से धुआँ उठा।
भूख-प्यास की सुध-बुध किसको
हर कोई बस लुटा-लुटा।
सभी सनाथ अनाथ हो गए सिर रघुवर के हाथ बिना।
चौदह वर्ष कटेंगे कैसे राम-लखन-सिय साथ बिना।।२।।
बड़भागी राजा दशरथ ने
प्राण तजा प्रभु के जाते।
जीवित रहकर भी क्या करते
जीते जी ही मर जाते।
सिंहासन रो-रो कर कहता मुकुट करे क्या माथ बिना।
चौदह वर्ष कटेंगे कैसे राम-लखन-सिय साथ बिना।।३।।
- राजेश मिश्र
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