भोग्या माने महिलाओं को बाकी दुनिया सारी है।
दिव्य सनातन सिखलाता है, नित-प्रति वन्दित नारी है।।
पूर्व पिता से पूज्या माता,
भ्राता से पहले भगिनी।
सप्तपदी रेखाङ्कित करती
सदा बराबर पति-पत्नी।
विना द्वितीया धर्म-कर्म का पुरुष नहीं अधिकारी है।
दिव्य सनातन सिखलाता है, नित-प्रति वन्दित नारी है।।१।।
विधि ने भाग किया दो तन का ,
नर-नारी का सृजन किया।
जहाँ-जहाँ नारी पूजित है,
देवगणों ने वसन किया।
रूप विदित जग पूजित पावन, शक्ति शम्भु ने धारी है।
दिव्य सनातन सिखलाता है, नित-प्रति वन्दित नारी है।।२।।
प्रकृति नित्य नाना रूपों में
जीवन धारण करती है।
नारी नित निज रुधिर पिलाकर
सबका पालन करती है।
मानव पर जितने ऋण जग में, माता का ऋण भारी है।
दिव्य सनातन सिखलाता है, नित-प्रति वन्दित नारी है।।३।।
नारी आदि-शक्ति जगदम्बा,
सृजन-शक्ति ईश्वर की है।
पशु-पक्षी मानव-दानव-सुर
सागर-भू-भूधर की है।
रवि-राकेश-शिखिन्-तारागण में भासित द्युति सारी है।
दिव्य सनातन सिखलाता है, नित-प्रति वन्दित नारी है।।४।।
है प्रतिमूर्ति प्रेम की नारी,
दया-क्षमा-करुणा की है।
ममता उपादान निर्मित मन,
त्याग-तपस-प्रज्ञा की है।
माँ की ममता को लालायित हो ईश्वर अवतारी है।
दिव्य सनातन सिखलाता है, नित-प्रति वन्दित नारी है।।५।।
द्वितीया - पत्नी
वसन - निवास
शिखिन् - अग्नि
- राजेश मिश्र
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