सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

सरस पावस आ गई है

गूँजती है छम-छमा-छम धुन चतुर्दिक,
सरस पावस आ गई है नाचती मन मोहती।

मदभरी काली घटाएँ झूमती हैं,
चूमती हैं गिरि-शिखर को झुक लचीली।
फिर उमड़ती-घुमड़ती हैं भावपूरित,
दूर जातीं, आ लिपटती हैं छबीली।

सींचती हैं तृषित गिरि को प्रेम-रस से,
बिखर बूँदें मोतियों सी हैं धरा पर सोहतीं।।१।।

फूटती रसधार फिर अवि के हृदय से,
और बन जाता सरोवर मृदु उदक का।
गूँजता कलरव विहरते पक्षियों का, 
प्यास मृदु जल से बुझाता प्राणि-जग का।

झूमते हैं तीर तरु, अरु छाँव शीतल 
तप्त-दिनमणि-दर्प से पीड़ित-पथिक को जोहती।।२।।

प्रेम तो उन्मुक्त सीमा में बँधा कब,
बह निकलता है चतुर्दिक स्रवित होकर।
सींचतीं जलधार अनगिन उपल उर को,
और बन जाते अनेकों प्रेम-निर्झर।

प्रस्फुटित पुनि निर्झरी निर्झर ह्रदय से,
सींचती प्यासी धरा को, सरित्पति को टोहती।।३।।

अवि - पर्वत
उदक - जल
दिनमणि - सूर्य 
दर्प - घमण्ड
उपल - पत्थर
निर्झर - झरना
निर्झरी - नदी
सरित्पति - समुद्र 

- राजेश मिश्र

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गूँजती है छम-छमा-छम धुन चतुर्दिक, सरस पावस आ गई है नाचती मन मोहती। मदभरी काली घटाएँ झूमती हैं, चूमती हैं गिरि-शिखर को झुक लचीली। फिर उमड़ती-...