दुःख आतप तप्त जग में छाँव घन, मृदु नीर है तू।
माँ! धरा का धीर है तू।।
वेद-विद् कहते सदा से
जीव ईश्वर अंश है यह
ईश्वरी! तुझसे सृजित ही
जगत का हर वंश है यह
जड़ जगत में ब्रह्म की प्रतिमूर्ति है, तस्वीर है तू!
माँ! धरा का धीर है तू।।१।।
पावनी निज कोख धरकर
रक्त से सींचे-सँवारे
प्रसव की दारुण व्यथा सह
नर्क से तू ही उबारे
दुःख के भवसिन्धु में माँ! हारिणी हर पीर है तू।
माँ! धरा का धीर है तू।।२।।
सुखमयी माँ! वृष्टि है तू
आद्य शाश्वत सृष्टि है तू
स्वार्थरत संसार में माँ!
शुभकरी, शुभ-दृष्टि है तू
सोख ले संताप-सागर, भूसुता-पति तीर है तू।
माँ! धरा का धीर है तू।।३।।
- राजेश मिश्र
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