शुक्रवार, 5 जून 2026

आज फिर कुछ मन व्यथित है

आज फिर कुछ मन व्यथित है! 

छोड़कर पीछे झमेला
पा रहा निज को अकेला 
तृषित मन नित तड़पता है 
नेह-जल हित तरसता है 

खेद से रग-रग ग्रसित है!।१।।

छोड़ जब घर-बार निकला
जीतने संसार निकला 
स्वप्न आँखों में बड़े थे 
शक्ति से युग-भुज भरे थे 

कब पता था दिग्भ्रमित है!।२।।

माँ-पिता का प्यार खोया
प्रेम का संसार खोया
खो गए संबंध सारे 
खो गए सारे सहारे 

बोझ दुख का ले थकित है!।३।।

- राजेश मिश्र 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कितना मुश्किल होता है

इक छोटा परिवार चलाना कितना मुश्किल होता है। आशाएँ पूरी कर पाना कितना मुश्किल होता है‌।। संभव नहीं सभी की उम्मीदों पर खरा उतर पाना,  किंतु उन...