छोड़कर पीछे झमेला
पा रहा निज को अकेला
तृषित मन नित तड़पता है
नेह-जल हित तरसता है
खेद से रग-रग ग्रसित है!।१।।
छोड़ जब घर-बार निकला
जीतने संसार निकला
स्वप्न आँखों में बड़े थे
शक्ति से युग-भुज भरे थे
कब पता था दिग्भ्रमित है!।२।।
माँ-पिता का प्यार खोया
प्रेम का संसार खोया
खो गए संबंध सारे
खो गए सारे सहारे
बोझ दुख का ले थकित है!।३।।
- राजेश मिश्र
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