इन्द्रियों की पहुँच से परे राम हैं,
किंतु कण-कण जगत के भरे राम हैं।
पातकी घोरतम नाम ही ले तरें,
कर-कमल नित्य शर-धनु धरे राम हैं।।
और न अब तड़पाओ श्याम। दर्शन तो दे जाओ श्याम।। कलिमल-कलुषित कुटिल कुचाली। भटकत इत-उत सतत मराली। मन मैला धो जाओ श्याम। दर्शन तो दे जाओ श्याम...
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