इन्द्रियों की पहुँच से परे राम हैं,
किंतु कण-कण जगत के भरे राम हैं।
पातकी घोरतम नाम ही ले तरें,
कर-कमल नित्य शर-धनु धरे राम हैं।।
हर अँधेरी निशा का सवेरा बना। मैं सभी कुछ लुटाकर लुटेरा बना।। दैव ने उस दुखद मोड़ पर ला दिया, तू न मेरी बनी, मैं न तेरा बना।। दोष उनको निराश...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें