इन्द्रियों की पहुँच से परे राम हैं,
किंतु कण-कण जगत के भरे राम हैं।
पातकी घोरतम नाम ही ले तरें,
कर-कमल नित्य शर-धनु धरे राम हैं।।
दुःख-आतप तप्त जग में छाँव घन, मृदु नीर है तू। माँ! धरा का धीर है तू।। वेद-विद् कहते सदा से जीव ईश्वर अंश है यह ईश्वरी! तुझसे सृजित ही जगत का...
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