(१)
कोई भी सरकार हो, आरक्षण बढ़ जाय।
अरु शासन की दक्षता, दिन-दिन घटती जाय।।
दिन-दिन घटती जाय दक्षता मरती जाये।
अक्षम परजीवी की संख्या बढ़ती जाये।।
कह राजेश कि देश-धर्म को कौन बचाये।
कोई भी सरकार समाज बाँटती जाए।।
(२)
संविधान की आत्मा, कैसे रहे अपेल।
दशकों से जब चल रहा, आरक्षण का खेल।।
आरक्षण का खेल देश दीमक सा चाटे।
सदियों से संपृक्त समाज शत्रु बन बाँटे।।
कह राजेश दरार दिनोंदिन बढ़ती जाए।
राजनीति अति क्रूर नए नित जाल बिछाए।।
(३)
बंगलादेश में हो रहा, बर्बर अत्याचार।
निर्बल नम्र निरीह हर, हिन्दू है लाचार।।
हिन्दू है लाचार जलाई जायँ बस्तियाँ।
जलकर मरते लोग लुट रहीं बहन-बेटियाँ।।
यहाँ सो रहे कोटि-कोटि चुप चद्दर ताने।
लीलेगी यह आग, आज मानें मत मानें।।
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