द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।
जीवन-पथ पर आगे बढ़ते
एक और सन छूट गया है।
नवल वर्ष नव मीत बना है,
गत से नाता टूट गया है।
क्या सचमुच संबंध पूरते तज यदि कोई संग चले?
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।१।।
विगत वर्ष या विगत व्यक्ति को
क्या हम कभी भूल पाते हैं?
जीवन जब तक है तब तक वे
यादों में आते जाते हैं।
मन में उनकी मृदु यादों की लेकर सदा तरंग चलें।
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।२।।
आगत के स्वागत में लेकिन
विघ्न विगत मत बनने पाए।
एक द्रवित छूकर कर जाए,
दूजा छूकर मन हरषाए।
सामंजस्य रहे दोनों में हम कुछ ऐसे ढंग चलें।
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।३।।
कज = दोष, छल
- राजेश मिश्र
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