विगत निमिष जब तड़पाते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।।
उमड़-घुमड़ घनघोर घटाएँ छा जाएँ जब हृदयांबर में,
नयन-जलद जल बरसाते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।
जब पीड़ित मन मौन साधकर एकाकी घुटने लगता है,
शब्द घुटन से घबराते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।
करक रही कुछ कड़वी बातें जिनको सहना सरल नहीं है,
केवल कागज सह पाते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।
मधुर पलों की मीठी यादें आकर मन में मुसकाती हैं,
तन-मन दोनों खिल जाते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।
जब-जब तुम सपनों में आती, इन आँखों में बस जाती हो,
लोचन पुट न उठा पाते हैं, बस यूँ ही कुछ लिख देता हूँ।
निमिष = पल
करकना = चुभना
पुट = पलक
- राजेश मिश्र
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