शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

जड़ और चेतन

श्रांत/क्लांत/निश्चल
दरवाजे के चौखट पर बैठीं
अम्मा!
निर्निमेष भाव से
एकटक
देखे जा रही थीं
कड़क/तपती/खड़ी दुपहरी में तपते
किन्तु, छाया प्रदान करते
टिकोरों से लदे हुए
अमोले को।

निश्चय किया था
उन्होंने और पिताजी ने
रोपेंगे एक वृक्ष
अपने पुत्र के जन्म के मौके पर;
और रोपा था इस अमोले को
अपने एकमात्र पुत्र के जन्म के समय।

इस तरह
जन्म दिया था दो पुत्रों को
एक जड़;
एक चेतन!

दोनों बढ़े
विकसित हुए
स्वावलम्बी हुए।

जड़ अभी भी वहीं खड़ा है
चुपचाप
तपती/चिलमिलाती धूप में
शीतल छाया प्रदान करता;
अम्मा-पिताजी के परिश्रम का/
प्रेम और वात्सल्य का/
त्याग का
प्रतिफल प्रदान करता।

और चेतन...?

खो गया है कहीं
दुनिया की भीड़ में
उन्नति के शिखर की ओर अग्रसर
आधुनिकता का हाथ थामे हुए
पुरातन सोच/
पुरातन परम्पराओं से
पीछा छुड़ाकर,
विवश बुढ़ापे को
अकेलापन/घुटन देकर
खो गया है कहीं
हमारा चेतन!

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

हम भारतीयों के भी बड़े ठाट होते हैं

हम भारतीयों के भी
बड़े ठाट होते हैं,
बारह चार की गाड़ी को पहुँचने में
बारह आठ होते हैं।
समय से कहीं भी
हम नहीं पहुँचते,
देर से पहुँचना/प्रतीक्षा करवाना/दूसरों का समय नष्ट करना
बड़प्पन की निशानी समझते॥

अपना लिया है हमने
पाश्चात्य गीत/संगीत/नृत्य/
भाषा-बोली/खान-पान/रहन-सहन,
किन्तु, नहीं अपना सके
उनकी नियमितता/राष्ट्रीयता/अनुशासन।

करते हैं आधुनिकता का पाखण्ड,
भरते हैं उच्च सामाजिकता का दम्भ;
कहते हैं हमारी सोच नई है,
किन्तु, मानवता मर गई है!

भूलते जा रहे हैं
अपनी उत्कृष्ट
सभ्यता/संस्कृति/संस्कार/स्वाभिमान/
माता-पिता-गुरु का
मान-सम्मान/
गाँव/समाज/खेत/खलिहान/
देशप्रेम/राष्ट्रसम्मान!

अंतर्राष्ट्रीय मंच पर
अपनी बात कहने का
साहस नहीं कर पाते हैं,
गली-नुक्कड़ पर भाषणबाजी करते
जाति-धर्म के नाम पर
लोगों को भड़काते/आग लगाते हैं।

नहीं समझते हैं कि
कश्मीर/लेह/लद्दाख दे देने में
नहीं है कोई बड़ाई,
यह कोई त्याग नहीं है
यह तो है कदराई।

अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है
समय है, सँभल जाओ;
अरे वो सुबह के भूले बुद्धू
शाम को तो घर आओ!

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

मैं नारी हूँ !

मैं नारी हूँ !

विधाता की अनुपम सृष्टि/
ममतामयी दृष्टि/
भावनाओं की वृष्टि।

मैं जीवनदायिनी
पालक/पोषक हूँ,
सारे दुखों की
अवशोषक हूँ ।

प्रेम की
परिभाषा हूँ,
ज्ञानियों की
जिज्ञासा हूँ,
थकित मन की
आशा हूँ,
कामुक तन की
अभिलाषा हूँ ।

साक्षात दुर्गा हूँ
काली/लक्ष्मी/पार्वती
वीणावादिनी हूँ मैं,
मोहिनी/रम्भा/मेनका
कामायिनी हूँ मैं ।

भक्तों की
भक्ति हूँ मैं,
प्रकृति की
सृजन-शक्ति हूँ मैं ।

मैं नारी हूँ !

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

गाँधीजी को एक संक्षिप्त रिपोर्ट

गाँधी तेरे देश का, हो गया बंटाधार।
जित देखो तित व्याप्त है, झूठ और भ्रष्ट्राचार॥
झूठ और भ्रष्ट्राचार, द्वेष, हिंसा, बेईमानी,
शहर-गाँव की बाबा तेरे यही कहानी॥
खूनी हो गई खाकी, चोर हो गई खादी,
बंटाधार हो गया तेरे देश का गाँधी॥

सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

मुर्गा और मैं

रमुआ के मुर्गे की बाँग सुनकर रोज़ की तरह मेरी नींद खुल गयी। वह एकदम नियम से सुबह के ठीक साढ़े पाँच बजे बाँग देता था। मैंने घड़ी में पौने छः का अलार्म सेट कर रखा था और पन्द्रह मिनट तक बिस्तर में पड़े रहने के पश्चात् अलार्म की आवाज के साथ ही बिस्तर छोड़ता था।

यह सिलसिला कई महीनों से निर्बाध रूप से चला आ रहा था। किन्तु आज मुर्गे को बाँग दिए लगभग आधे घंटे हो गए, अलार्म नहीं बजा। मेरा माथा ठनका। उठकर घड़ी में समय देखा, तो अभी सुबह के साढ़े तीन बज रहे थे। क्रोध से शरीर काँपने लगा। मुर्गे की एक लापरवाही ने पूरी नींद खराब कर दी।

जैसे-तैसे सुबह हुई। तैयार होकर ऑफिस पहुँचा, तो पता चला कि मेरी सहायिका ने अचानक छुट्टी ले ली थी। पूरा मूड चौपट हो गया। ऑफिस का जो भी काम था, किसी तरह जल्दी-जल्दी निपटाकर लंच के एक घंटे पश्चात् ही घर के लिए रवाना हो गया। संयोग से बगीचे में ही मुर्गे से मुलाक़ात हो गयी, जो मस्ती में गाना गाते हुए चहलकदमी कर रहा था।

उसे देखते ही सारा क्रोध आँखों में उतर आया। किसी तरह अपने-आपको संयमित करते हुए पहुँच गया उसके सामने। वह देखते ही मुस्कराकर बोला - "भैया प्रणाम! बहुत जल्दी आ गए ऑफिस से?"

उसकी मीठी मुस्कान ने आग में घी का काम किया और मैं भड़क गया - "ये सब छोड़, पहले ये बता कि सुबह तूने इतनी जल्दी बाँग क्यों दी?"

वह शर्माने लगा। बोला - "वो बात यह है भैया कि सुबह साढ़े तीन बजे पड़ोस की मुर्गी के साथ मुझे डेट पर जाना था। तो मैंने सोचा कि जाने के पहले काम ख़तम कर लूं, पता नहीं वापसी में कितना समय लगे?"

मेरा पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। मैं बोला - "क्या तुझे थोडा भी आभास है कि अपने छोटे से स्वार्थ के लिए तूने कितने लोगों की नीद खराब कर दी?"

मुर्गे ने बड़ी मासूमियत से कहा - "बिगड़ क्यों रहे हो? आप भी तो आज ऑफिस से जल्दी आ गए.श। आपने भी तो वही किया जो मैंने किया। तो फिर मेरे ऊपर इतना क्रोधित क्यों हो रहे हैं? रही बात डेट पर जाने की, तो सभी लोग प्यार करते हैं, शादी करते हैं, बच्चे पैदा करते हैं। इसीलिये तो भगवान् ने स्त्री और पुरुष दोनों की रचना की है।"

उसके इस उत्तर पर मैं बौखला गया और कहा - "क्रोधित क्यों हो रहा हूँ? डेट पर जाने के लिए लोगों को तकलीफ देना कहाँ तक ठीक है? अरे! तुझे अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का कुछ अहसास है कि नहीं?"

मुर्गा भड़क उठा और कहा - "मैं कुछ नहीं बोल रहा हूँ तो सिर पर चढ़े जा रहे हैं आप। आप जैसे आदमी को सामाजिक जिम्मेदारी की बात करते हुए शोभा नहीं देता। जोरू के गुलाम हैं आप। माँ-बाप की हमेशा उपेक्षा करते हैं, उनकी कोई बात नहीं सुनते। अपने ही बच्चों का ध्यान नहीं है, पढ़ रहे हैं या घूम रहे हैं? पढ़ रहे हैं, तो क्या पढ़ रहे हैं? परीक्षा में कितना नंबर आया है, यह भी पता नहीं है, और मुझे सिखाते हैं सामाजिक जिम्मेदारी! पहला अपने घर की जिम्मेदारी देखिये, फिर किसी और को सामाजिक जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाइये।"

"बड़ा बदतमीज है तू।" मैंने कहा - "नैतिकता नाम की कोई चीज ही नहीं है तेरे अन्दर।"

मुर्गा बोला - "अब नैतिकता का पाठ भी मुझे आपसे पढ़ना पड़ेगा? बच्चों के सामने सिगरेट पीते हैं, अपने बाप की उम्र के लोगों का मज़ाक उड़ाते हैं, पत्नी के होते हुए भी लेडीज बीयर बार की सैर करते हैं, ऑफिस की लड़कियों के सामने ऊटपटांग बातें करते हैं। फिर भी नैतिकता की बात करते हुए शर्म नहीं आती?"

उसके इस जवाब पर मैं खिसियाकर रह गया। सारी अकड़ ढीली पड़ गयी। फिर भी आवाज में थोड़ी सख्ती लाते हुए बोला - "बड़े-छोटे का लिहाज नहीं है तेरे अन्दर, तभी से जवाब पर जवाब दिए जा रहा है?"

मुर्गे ने कहा - "नहीं, मैं आपके जैसा बिलकुल नहीं हूँ। इसीलिये इतना सब कुछ सुनने के बावजूद भी मैं आपको 'आप' कहकर ही बुला रहा हूँ। वर्ना कौन सा आपका दिया खाता हूँ कि आपकी बात सुनूं? अब यह लेक्चरबाजी बंद कीजिये और घर जाइए। और हाँ, एक बात और। पहले अपने-आपको सुधारिए, फिर दूसरों को शिक्षा देने के बारे में सोचियेगा। प्रणाम!"

इतना कहकर वह फिर से गुनगुनाते हुए चल दिया और मैं अवाक खड़ा उसको जाते हुए देखता रहा।

- राजेश मिश्र

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

जय माँ अम्बे!

मेरे मन के अंध तमस में ज्योतिर्मय उतरो ||
जय जय माँ अम्बे !
जय जय माँ दुर्गे !

नहीं कहीं कुछ मुझमें सुंदर,
काजल सा काला सब अन्दर |
प्राणों के गहरे गह्वर में करुणामयि उतरो।।
जय जय माँ अम्बे !
जय जय माँ दुर्गे !

नहिं जप-योग, न यज्ञ प्रबीना,
ज्ञानशून्य मैं सब विधि हीना |
ज्ञानचक्षु जागृत कर अम्बे जगमग जग कर दो।।
जय जय माँ अम्बे !
जय जय माँ दुर्गे !

जीवन की तुम एक सहारा।
शक्ति स्वरूपा जगदाधारा।
नवजीवन नवज्योति भरो माँ पापमुक्त कर दो।।
जय जय माँ अम्बे !
जय जय माँ दुर्गे !

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

टीस

तिल-तिल जलते रहते हैं
आँसू ढलते रहते हैं
स्मृतियों के चित्र-पटल पर
दृश्य बदलते रहते हैं

गुल्ली-डंडा, चिकई, कबड्डी
नानी-दादी की लोरी
भाग के घर से खेलने जाना
बाबा से चोरी-चोरी
माँ-बाबू की प्यार सनी
झिड़की को मचलते रहते हैं
स्मृतियों के चित्र-पटल पर
दृश्य बदलते रहते हैं

दादुर की टर्र-टर्र
और झींगुर की झन-झन
चातक-पपीहा-कोयल-मोर
बोलें तो झूमे तन-मन
सर्दी-गर्मी-वर्षा ऋतु के
चक्र बदलते रहते हैं
स्मृतियों के चित्र-पटल पर
दृश्य बदलते रहते हैं

यादें मन को मथती हैं
गाँव की राहें तकती हैं
उजड़ी बगियाँ, सूनी गलियाँ
आन मिलो अब कहती हैं
कजरी-फगुआ, दंगल-मेले
पल-पल सालते रहते हैं
स्मृतियों के चित्र-पटल पर
दृश्य बदलते रहते हैं

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

प्यासा हूँ मैं!

हाँ, प्यासा हूँ मैं!

भटक रहा हूँ खोज में
एक बूँद पानी की...
आँखों में आस लिए
होंठों पर प्यास लिए
सागर की गर्त में
सहरा के गर्द में
नदिया के करारों पर
बर्फ के पहाड़ों पर
सूखे मैदानों में
पथरीली चट्टानों में।

भटक रहा हूँ मैं खोज में
प्रेम के दो बोल की...
ह्रदय में प्यार लिए
सपनों का संसार लिए
शहरों में, गावों में
उफनती भावनावों में
दुनिया की भीड़ में
जंगल के बीहड़ में
अपनों में, परायों में
अनजाने सायों में।

भटक रहा हूँ मैं खोज में
तेरी...
आस्था का दीप लिए
श्रद्धा और प्रीत लिए
अन्तस्थ शिराओं में
पहाड़ों की गुफाओं में
ग्रंथों के सिद्धांत में
अखिल ब्रह्माण्ड में
जड़ में, चेतन में
विनाश में, सृजन में।

भटक रहा हूँ मैं,
क्योंकि प्यासा हूँ मैं!

- राजेश मिश्र

जीवन चौथेपन में दुष्कर

जीवन चौथेपन में दुष्कर, धीरज धरना पड़ता है। मरने से पहले वर्षों तक घुट-घुट मरना पड़ता है।। दुखित व्यक्ति का साथ जगत् में किसको ईप्सित होता ह...