गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

टीस

तिल-तिल जलते रहते हैं
आँसू ढलते रहते हैं
स्मृतियों के चित्र-पटल पर
दृश्य बदलते रहते हैं

गुल्ली-डंडा, चिकई, कबड्डी
नानी-दादी की लोरी
भाग के घर से खेलने जाना
बाबा से चोरी-चोरी
माँ-बाबू की प्यार सनी
झिड़की को मचलते रहते हैं
स्मृतियों के चित्र-पटल पर
दृश्य बदलते रहते हैं

दादुर की टर्र-टर्र
और झींगुर की झन-झन
चातक-पपीहा-कोयल-मोर
बोलें तो झूमे तन-मन
सर्दी-गर्मी-वर्षा ऋतु के
चक्र बदलते रहते हैं
स्मृतियों के चित्र-पटल पर
दृश्य बदलते रहते हैं

यादें मन को मथती हैं
गाँव की राहें तकती हैं
उजड़ी बगियाँ, सूनी गलियाँ
आन मिलो अब कहती हैं
कजरी-फगुआ, दंगल-मेले
पल-पल सालते रहते हैं
स्मृतियों के चित्र-पटल पर
दृश्य बदलते रहते हैं

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