तिल-तिल जलते रहते हैं
आँसू ढलते रहते हैं
स्मृतियों के चित्र-पटल पर
दृश्य बदलते रहते हैं
गुल्ली-डंडा, चिकई, कबड्डी
नानी-दादी की लोरी
भाग के घर से खेलने जाना
बाबा से चोरी-चोरी
माँ-बाबू की प्यार सनी
झिड़की को मचलते रहते हैं
स्मृतियों के चित्र-पटल पर
दृश्य बदलते रहते हैं
दादुर की टर्र-टर्र
और झींगुर की झन-झन
चातक-पपीहा-कोयल-मोर
बोलें तो झूमे तन-मन
सर्दी-गर्मी-वर्षा ऋतु के
चक्र बदलते रहते हैं
स्मृतियों के चित्र-पटल पर
दृश्य बदलते रहते हैं
यादें मन को मथती हैं
गाँव की राहें तकती हैं
उजड़ी बगियाँ, सूनी गलियाँ
आन मिलो अब कहती हैं
कजरी-फगुआ, दंगल-मेले
पल-पल सालते रहते हैं
स्मृतियों के चित्र-पटल पर
दृश्य बदलते रहते हैं
गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
राम
इन्द्रियों की पहुँच से परे राम हैं, किंतु कण-कण जगत के भरे राम हैं। पातकी घोरतम नाम ही ले तरें, कर-कमल नित्य शर-धनु धरे राम हैं।।
-
मनुज स्वभाव, नहीं अचरज है। मानव हैं हम, द्वेष सहज है।। निर्बल को जब सबल सताए, वह प्रतिकार नहीं कर पाए, मन पीड़ा से भर जाता है, द्वेष हृदय घ...
-
लन्दन के हीथ्रो एअरपोर्ट से जैसे ही विमान ने उड़ान भरी, श्याम का दिल बल्लियों उछलने लगा. बचपन की स्मृतियाँ एक-एक कर मानस पटल पर उभरने लगीं और...
-
मुझ पातकी का मोहन! उद्धार नाथ कर दो। तुम बिन अनाथ भटकूँ, मुझको सनाथ कर दो।। मद-राग-द्वेष भगवन्! पल-पल सता रहे हैं। मैं निस्सहाय निर्बल निशि...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें