सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

प्यासा हूँ मैं!

हाँ, प्यासा हूँ मैं!

भटक रहा हूँ खोज में
एक बूँद पानी की...
आँखों में आस लिए
होंठों पर प्यास लिए
सागर की गर्त में
सहरा के गर्द में
नदिया के करारों पर
बर्फ के पहाड़ों पर
सूखे मैदानों में
पथरीली चट्टानों में।

भटक रहा हूँ मैं खोज में
प्रेम के दो बोल की...
ह्रदय में प्यार लिए
सपनों का संसार लिए
शहरों में, गावों में
उफनती भावनावों में
दुनिया की भीड़ में
जंगल के बीहड़ में
अपनों में, परायों में
अनजाने सायों में।

भटक रहा हूँ मैं खोज में
तेरी...
आस्था का दीप लिए
श्रद्धा और प्रीत लिए
अन्तस्थ शिराओं में
पहाड़ों की गुफाओं में
ग्रंथों के सिद्धांत में
अखिल ब्रह्माण्ड में
जड़ में, चेतन में
विनाश में, सृजन में।

भटक रहा हूँ मैं,
क्योंकि प्यासा हूँ मैं!

- राजेश मिश्र

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राम

इन्द्रियों की पहुँच से परे राम हैं, किंतु कण-कण जगत के भरे राम हैं। पातकी घोरतम नाम ही ले तरें, कर-कमल नित्य शर-धनु धरे राम हैं।।