बुधवार, 29 दिसंबर 2010

हिंद को बदलने की कसम हमने खाई है

भूख है, गरीबी है, दर्द है, रुसवाई है।
वोट से हिंद की जनता की ये कमाई है।
देश का पैसा गया स्विस बैंकी खातों में,
संसदी नदी में घोटालों की बाढ़ आई है।
खाकी हो, खादी हो, बेदाग कोई नहीं,
अख़बार और टीवी से तौबा है, दुहाई है।
दूध-घी नदारद हैं बच्चों की थाली से,
पिज्जा और बर्गर की पूछ है, पहुनाई है।
हम तो चुप ना रहेंगे, बोलेंगे, मुँह खोलेंगे,
हिंद को बदलने की कसम हमने खाई है।

रविवार, 12 दिसंबर 2010

सरोज

मैं पुनि समुझि देखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं॥

प्राननाथ करुनायतन सुन्दर सुखद सुजान।
तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान॥६४॥

श्रीरामचरितमानस का पाठ कर रही सरोज के कानों में अचानक सास की उतावली आवाज सुनाई दी - "अरे बहुरिया, अब जल्दी से ये पूजा-पाठ बंद कर और रसोई की तैयारी कर। दो-तीन घड़ी में ही बिटवा घर पहुँच जाएगा। अब ट्रेन के खाने से पेट तो भरता नहीं है, इसलिए घर पहुँचने के बाद उसे खाने का इंतजार न करना पड़े।" सरोज ने पाठ वहीं बंद कर दिया और भगवान को प्रणाम कर उठ गयी। शिवम को दूध देकर रसोई की तैयारी में लग गयी. आज भानू चार वर्षों के पश्चात् मुंबई से वापस आ रहा था।

भानू और सरोज का विवाह लगभग छः वर्ष पूर्व हुई था। दोनों साथ-साथ कॉलेज में पढ़ते थे और अपनी कक्षा के सर्वाधिक मेधावी विद्यार्थियों में से एक थे। पढ़ाई के दौरान ही एक दूसरे के संपर्क में आये और प्यार परवान चढ़ा। घरवालों ने विरोध किया तो भागकर शादी कर ली। इसी मारामारी में पढ़ाई से हाथ धो बैठे और जीवन में कुछ बनने, कुछ करने का सपना सपना ही रह गया। इस घटना के समय दोनों स्नातकोत्तर प्रथम वर्ष में अध्ययनरत थे।

घर से भागने के लगभग पाँच-छः महीने पश्चात् दोनों के माता-पिता ने आपस में विचार-विमर्श किया और इस नतीजे पर पहुंचे कि उनके कड़े रुख से बच्चों का जीवन और कष्टकारक ही होगा। अतः एक-दूसरे को अपना सम्बन्धी स्वीकार कर उन दोनों को समझा-बुझाकर किसी तरह से घर वापस ले आये। घर आने के लगभग सात महीने पश्चात् सरोज ने एक बड़े ही प्यारे से बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम शिवम रखा गया। शिवम के जन्म के पश्चात् भानू के सामने तमाम नए छोटे-बड़े खर्चे आने लगे, जिनके लिए रोज-रोज पिताजी से पैसा माँगना अच्छा नहीं लगता था। अतः बहुत सोच-विचार करने के पश्चात् उसने घर छोड़ने का निश्चय किया और अपने एक मित्र के पास मुंबई चला गया।

भानू बचपन से ही अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि तथा बातचीत में पारंगत था। जहाँ भी जाता था, अपनी बातों से लोगों को मंत्रमुग्ध कर देता था। भगवान ने शारीरिक सुन्दरता भी दी थी। कुल मिलकर वह एक अत्यन्त आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था। मुंबई में उसे एक मल्टीनेशनल कम्पनी में सेल्स एग्जीक्यूटिव का जॉब मिल गया। अपनी तीव्र बुद्धि और कड़ी मेहनत से कुछ महीनों में ही वह अपने सीनियर्स का चहेता बन गया और उसके प्रदर्शन को देखते हुए समय से पूर्व ही उसे प्रोमोशन मिल गया।

कमाई में बढ़ोत्तरी तथा खाने-पीने की समस्या  के कारण वह अपने परिवार को मुंबई बुलाना चाहता था। माँ से बात की तो माँ ने कहा कि गाँव में खेती-बारी और दादाजी की स्थिति को देखते हुए वह और पिताजी तो मजबूर थे, किन्तु वह चाहे तो सरोज को ले जा सकता था। बस क्या था, पहुँच गया अगले महीने सरोज और शिवम को लेने। किन्तु होनी को कुछ और ही स्वीकार था। घर पहुंचते ही उसकी सारी प्रसन्नता हवा हो गई। आस-पास की औरतों ने माँ को अच्छी तरह से समझा दिया था कि अगर एक बार बहू को बेटे के साथ रहने को भेज दिया, तो बेटे और बहू दोनों से हाथ धो बैठोगी। अतः माँ ने अपने स्वास्थ्य का बहाना कर सरोज को रोक लिया और भानू को मन मसोसकर अकेले वापस लौटना पड़ा।

मुम्बई पहुँचने के पश्चात् भानू हमेशा खोया-खोया रहने लगा। उसका मन खिन्न हो गया था। धीरे-धीरे घर पर फोन करना भी कम कर दिया। महीने, दो महीने में एक बार बात कर लेता था। शुरू-शुरू में शिवम की यादें उसे बेचैन कर देती थीं, लेकिन उसका आवेग भी अब कम हो गया था। खुश होने का कोई बहाना नहीं था। खोखली हँसी के पीछे से उदासी झाँकती रहती थी। उसका सतत उदास चेहरा सहकर्मियों को खटकने लगा। सबने समझाने की कोशिश की, किन्तु कुछ विशेष लाभ नहीं हुआ।

दुखित मन, युवा शरीर और उस पर अकेलेपन का दर्द; थोड़ी सी भी सहानुभूति और प्यार मिलने पर बरबस खिंचा चला जाता है। उस पर यदि यह सहानुभूति और प्यार एक खूबसूरत लड़की से मिले तो...! 

इस घटना के कुछ महीनों के पश्चात् भानू की मुलाकात आस्था नामक एक लड़की से हुई। एक मीटिंग के दौरान दोनों संपर्क में आये और जान-पहचान कब दोस्ती से होते हुए प्यार में बदल गई, पता ही नहीं चला। आस्था बहुत ही खूबसूरत और तेज-तर्रार लड़की थी। एक दिन अचानक उसने भानू के समक्ष शादी का प्रस्ताव रखा और हत्प्रभ भानू ने बिना कुछ सोचे-समझे एक महीने का समय माँग लिया। लोग कहते हैं कि इश्क-मुश्क छुपाये नहीं छुपता। किसी तरह से भानू के घर वालों को यह बात पता चल गयी। माँ ने समझाने की कोशिश की, तो असर विपरीत पड़ा और अंततः भानू ने आस्था से शादी कर ली।अभागी, हतबुद्धि सरोज अचानक लगे इस झटके से उबर न सकी और इस सारे घटनाक्रम में मौन रही। वह समझ न सकी कि उसे किस अपराध का दंड मिल रहा है!

आस्था एक निहायत ही समझदार और सुलझी हुई लड़की थी। वह मुम्बई में ही पैदा हुई और पली-बढ़ी थी। स्कूली शिक्षा पूरी करके उच्च-शिक्षा के लिए लन्दन चली गयी थी। भानू से मिलने के कुछ महीनों पहले ही मुम्बई वापस लौटी थी। उसे पता न था कि भानू पहले से ही विवाहित है। जब पता चला तो पैरों तले से ज़मीन खिसक गयी। वह अपने आपको अत्यन्त अपमानित और ठगी हुई महसूस करने लगी। लेकिन इससे भी बढ़कर उसके दिल पर यह बात बोझ बनकर बैठ गयी कि एक औरत होकर उसने अनजाने में ही सही, दूसरी औरत का सुहाग छीन लिया है और उस निरपराध को जीवन भर के लिए अँधेरे कुएँ में धकेल दिया है। अतः गर्भवती होते हुए भी उसने अपने माता-पिता से विचार-विमर्श करके भानू को तलाक दे दिया।

भानू की स्थिति अब बद से बदतर हो चली। निराशा और हताशा ने उसे चारों ओर से घेर लिया। घर लौटने की राह उसने स्वयं ही बंद कर दी थी। मुम्बई में उसके जानने वाले लोग उसे तिरस्कार की दृष्टि से देखने लगे। मान-प्रतिष्ठा धूल में मिल गयी। हमेशा शराब के नशे में धुत रहने लगा। काम में मन नहीं लगता था और परफोर्मेंस दिन-प्रतिदिन खराब होती गयी। परिणाम यह हुआ कि नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा। यह बात जब घरवालों को पता चली तो माँ ने पिताजी को अपनी कसम देकर किसी तरह से उसे वापस लाने पर सहमत कर लिया। आज पिताजी उसे मुम्बई से लेकर वापस आ रहे थे।

घर पहुँचने के पश्चात् सबसे दण्ड-प्रणाम कर ओसारे में माँ के पास सिर झुकाकर बैठ गया। किसी से भी आँख मिलाने की हिम्मत नहीं हुई। शिवम दूर से ही अजीब नजरों से देखता था, फिर भाग जाता था। माँ ने सिर पर हाथ फेरकर हालचाल पूछा तो अपराध-बोध से फफक-फफककर रो पड़ा। माँ ने समझा-बुझा कर शांत किया और कहा कि रोने से तो अब कुछ भी वापस नहीं आने वाला है, अतः आगे की सोचो। इन्हीं सब बातों में दिन बीत गया।

रात को अपने कमरे में कदम रखने के पहले उसने काफी सोच-विचार किया कि सरोज से किस तरह से क्षमा माँगे। जिस घड़ी की वह अधीरता से प्रतीक्षा कर रहा था, अंततः वह आ गई। घर के कामों से निवृत्त होकर सरोज जब कमरे में आयी, तो भानू के हृदय की धड़कन बढ़ गयी। दोनों बहुत देर तक पलंग के अलग-अलग किनारों पर चुपचाप लेटे विचारों में खोये रहे। फिर भानू ने ही बातचीत प्रारंभ की तथा अपने किये पर लज्जित होते हुए सरोज से क्षमा माँगी और कहा कि भगवान ने उसके कर्मों का दंड उसे दे दिया है। सरोज ने कहा कि उसे क्षमा माँगने की आवश्यकता नहीं है। भानू के मन से जैसे बहुत बड़ा बोझ उतर गया। फिर उसने अपना हाथ सरोज के हाथ की तरफ बढ़ा दिया। इससे पहले कि वह अपना हाथ सरोज के हाथ पर रखता, सरोज ने झटके से अपना हाथ खींच लिय।  भानू उसके चेहरे की ओर देखने लगा, जो कि इस समय एकदम कठोर एवं भावहीन था। तभी सरोज ने ठन्डे लहजे में कहा - "यह आपका घर है, अतः आपके यहाँ रहने पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है। बल्कि एक बूढ़े माँ-बाप को उनका बेटा वापस मिल जाएगा, जिसके लिए वे दिन-रात आँसू बहाया करते थे। शिवम को भी मैं पिता के प्यार से वंचित नहीं करना चाहती। किन्तु, कृपा करके आप मुझे स्पर्श करने की चेष्टा मत कीजियेगा। अब आप मेरे लिए पर-पुरुष हैं और मैं जीते-जी अपने पति के अलावा किसी और पुरुष को अपना शरीर छूने की अनुमति नहीं दे सकती। आपके साथ इस कमरे में मैं केवल इसलिए हूँ, ताकि उन तीनों की ख़ुशी में खलल न पड़े।"

भानू अवाक् सरोज का मुँह ताकता रहा। उसे एक दुखद, एकाकी, घुटन से भरा हुआ भविष्य आगे दिखाई दे रहा था। यही उसकी सजा थी. यही उसका पश्चात्ताप था।

- राजेश मिश्र

रविवार, 21 नवंबर 2010

अहमद चाचा

लन्दन के हीथ्रो एअरपोर्ट से जैसे ही विमान ने उड़ान भरी, श्याम का दिल बल्लियों उछलने लगा. बचपन की स्मृतियाँ एक-एक कर मानस पटल पर उभरने लगीं और जैसे-जैसे विमान आसमान की ऊँचाई की ओर बढ़ता गया, वह आस-पास के वातावरण से बेसुध अतीत में मग्न होता चला गया. माँ की ममता, पिताजी का प्यार, मित्रों के साथ मिलकर धमाचौकड़ी करना, गाँव के खेल, नदी का रेता, हरे-भरे खेत, अनाजों से भरे खलिहान और वहां कार्यरत लोगों की अथक उमंग, तीज त्यौहार की चहल-पहल आदि ह्रदय को रससिक्त करते गए.

गाँव के खेलों की बात ही कुछ और है. चिकई, कबड्डी, कूद, कुश्ती, गिल्ली-डंडा, लुका-छिपी, ओल्हा-पाती, कनईल के बीज से गोटी खेलना, कपड़े से बनी हुई गेंद से एक-दूसरे को दौड़ा कर मारना आदि-आदि. मनोरंजन से भरपूर ये स्वास्थ्यप्रद खेल शारीरिक और मानसिक उन्नति तो प्रदान करते ही हैं, इनमें एक पैसे का खर्च भी नहीं होता है. अतः धर्म, जाति, सामाजिक-आर्थिक अवस्था से निरपेक्ष सबके बच्चे सामान रूप से इन्हें खेल सकते हैं.

इन सबसे अलग एक सबसे प्यारी चीज़ थी जिसके लिए वह वर्षों व्याकुल रहा, वह थे अहमद चाचा. हिन्दुओं के इस गाँव में एक अहमद चाचा का ही परिवार मुस्लिम समुदाय से था. लेकिन उनका कहना था कि आज पचपन वर्ष की उम्र हो जाने तक भी उन्हें इस बात का कभी अहसास भी नहीं हुआ था. होली, दीवाली, ईद, बकरीद सबके साथ ही मनाते थे. पाँच वक्त के नमाज़ी थे, किन्तु गाँव में कहीं भी भजन-कीर्तन हो, उनकी उपस्थिति अनिवार्य रहती थी.

अहमद चाचा के दादाजी श्याम के गाँव से दो कोस दूर स्थित शाहपुर नामक गाँव के बाशिंदे थे. उनकी तीन बीवियों से सात पुत्र तथा तीन पुत्रियाँ थीं. अहमद चाचा के वालिद हुसैन मियाँ उनकी सबसे छोटी बीवी की पहली संतान थे. उन्होंने परिवार-समाज सबसे बगावत कर गाँव के ही एक दलित युवती से शादी कर ली और परिणामतः  घर से निकाल दिए गए. कहीं शरण नहीं मिली. श्याम के दादाजी को पता चला तो उन्होंने दो बीघे ज़मीन, घर बनाने के लिए थोड़ी सी जगह और तीन-चार पेड़ का एक छोटा सा बागीचा देकर उन्हें अपने गाँव में ही बसा दिया. हालाँकि कुछ लोगों ने विरोध अवश्य किया था, किन्तु धीरे-धीरे सब शान्त हो गया और हुसैन मियाँ ने अपनी व्यवहारकुशलता से सबके दिलों में जगह बना ली.

अहमद चाचा उनकी एकमात्र सन्तान थे और बचपन से ही अपने वालिद के साथ श्याम के खेत-खलिहान का कारोबार देखते थे. श्याम के पिताजी हर एक कार्य में उनसे विचार-विमर्श अवश्य करते थे. श्याम का बचपना उनके बाँहों के झूले में ही व्यतीत हुआ था. वह जैसे ही उन्हें देखता था, दौड़कर उनकी गोदी में चढ़ जाता था और दोनों हाथ से उनकी दाढ़ी सहलाने लगता था. कभी-कभी वह अपनी दाढ़ी प्यार से श्याम के चेहरे पर रगड़ देते थे और वह चिल्ला उठता था.

अहमद चाचा के कुल पाँच औलादें हुईं जिनमें से तीन पुत्रियाँ और दो पुत्र थे. पुत्रियों की शादी हो गई और वे अपने-अपने घर चली गयीं. छोटा लड़का दसवीं में पढ़ रहा था, जब साँप के काटने से उसकी मृत्यु हो गयी. अब परिवार में अहमद चाचा के अलावा उनका बड़ा लड़का असलम, उसकी बीवी तथा दो बच्चे थे. असलम ने श्याम के पिताजी की सहायता से पास के बाज़ार में फर्नीचर की एक दुकान खोल ली थी, जो अब काफी अच्छी चलने लगी थी.

दिल्ली के इंदिरा गाँधी हवाई अड्डे पर उतरने के पश्चात् ट्रेन पकड़कर श्याम दूसरे दिन अपने गाँव पहुँचा. पिताजी पास के गाँव में एक मित्र की लड़की की शादी में गए हुए थे, इसलिए कार लेकर ड्राईवर अकेला ही स्टेशन पर आया हुआ था. घर पहुँचते ही अम्मा उसे गले लगाकर फफक-फफककर रो पड़ीं. श्याम की आँखों से भी आँसुओं की धारा बह चली. कितना तड़पा था वह इस प्यार और दुलार के लिए!

कुछ देर के पश्चात् जब बातचीत का सिलसिला थमा और वह नहा-धोकर, चाय पीकर घर से निकलने लगा, तो अम्मा ने पूछा - "अरे! आते ही खाना-पीना खाए बिना किधर को निकल पड़े? अभी खाना खाकर आराम कर लो, फिर शाम को सबसे मिलना."

श्याम ने कहा - "अभी आधे घंटे में अहमद चाचा से मिलकर आ रहा हूँ, फिर खाना खाऊंगा."

अम्मा का चेहरा अचानक सफ़ेद पड़ गया. श्याम किसी अनहोनी की आशंका से दहल गया. अम्मा के चेहरे को ध्यान से देखते हुए पूछा - "क्या हुआ? सब ठीक तो है न? अहमद चाचा मुझे लेने के लिए स्टेशन भी नहीं गए थे और यहाँ भी कहीं नहीं दिख रहे हैं. उनकी तबियत तो ठीक हैं न?"

अम्मा के मुँह से बोल नहीं फूटे. उनकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी. श्याम के ह्रदय की धड़कन बढ़ गयी, हाथ-पाँव काँपने लगे. मन कड़ा करते हुए उसने फिर पूछा - "अम्मा, तुम बोलती क्यों नहीं? क्या हुआ अहमद चाचा को?"

अम्मा ने रोते हुए धीरे से कहा - "अहमद मियाँ अब नहीं रहे."

श्याम के पैरों तले से जैसे ज़मीन खिसक गयी हो. उसके ह्रदय पर वज्राघात सा हुआ. वह धम्म से ज़मीन पर बैठ गया. निश्चल, निर्विकार, स्तब्ध सामने की दीवार को घूरता रहा. अम्मा के बार-बार झकझोरने और बुलाने पर उसकी ख़ामोशी टूटी. फिर रोते हुए पूछा - "कैसे हुआ?"

अम्मा ने बतलाया - "तुम्हारे लन्दन जाने के कुछ दिनों पश्चात् ही असलम और उसकी बीवी से उनका झगड़ा शुरू हो गया था. वे दोनों कहते थे कि हिन्दुओं के इतने बड़े गाँव में अकेला मुस्लिम परिवार होने की वजह से वह लोग सुरक्षित नहीं हैं. अतः यहाँ की ज़मीन-जायदाद बेचकर किसी मुस्लिम गाँव में जाकर रहना चाहते थे. असलम के ससुराल वाले भी दोनों को इस बात के लिए उकसा रहे थे. किन्तु अहमद मियाँ जिद पर अड़े थे कि जिस माटी से पैदा हुए, उसी में दफ़न होंगे. उनका कहना था कि उनके वालिद साहब की और उनकी उम्र इसी गाँव में गुज़र गयी. इतने सालों में किसी ने उन्हें अहसास तक नहीं होने दिया कि वे मुसलमान हैं. उनके साथ कभी कोई भेदभाव नहीं किया गया. गाँव के किसी भी सम्मानित हिन्दू से कम उनकी इज्ज़त नहीं होती है. फिर अचानक यह हिन्दू-मुसलमान का मसला कहाँ से आ गया और असुरक्षा की बात कहाँ से आ गयी? दो-तीन साल तक यह झगड़ा चलता रहा. तभी अचानक एक दिन पता चला कि अहमद मियाँ ने ज़हर खाकर ख़ुदकुशी कर ली है. लेकिन गाँव के अधिकांश लोगों का मानना है कि असलम और उसकी बीवी ने ही उनको ज़हर दिया था."

"और अब असलम कहाँ है?" - श्याम ने पूछा.

"अपने ससुराल के गाँव में कुछ ज़मीन खरीदी है, वहीँ रह रहा है." - अम्मा ने बताया.

"उनकी ज़मीन?" - श्याम की आँखों से बहने वाली अश्रुधारा तेज हो गयी.

"वैसे ही पड़ी है." - अम्मा का जवाब था. "गाँव के लोगों ने न तो खुद खरीदा और न ही किसी और को खरीदने दिया."

श्याम के ह्रदय पर मानों कोई पत्थर रख दिया गया हो. वह लड़खड़ाते हुए क़दमों से अपने कमरे की ओर चल पड़ा. गाँव आने की सारी ख़ुशी जाती रही. उसकी हालत उस वणिक के जैसी हो गयी थी जो व्यापर में अपना मूलधन गवाँकर खाली हाथ घर लौटा हो.

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

दीये तो रोज जलते हैं, फिर दीपावली क्यों?

दीये तो रोज़ जलते हैं,
फिर दीपावली क्यों?
इस एक दिन के लिए,
इतनी प्रसन्नता/इतनी उतावली क्यों?

हाँ, दीये तो रोज़ जलते हैं,
किन्तु, अकेले
सुदूर, कोने में कहीं
सिमटे हुए
एक-दूसरे से अलग
भयानक अँधेरे में घुटते हुए
पल-पल क्षीण होती रोशनी के साथ
अन्त की ओर अग्रसर
दूसरों को प्रकाशित करने की कोशिश में
स्वयं बुझते हुए
जहाँ नहीं पहुंचता है
एक दीये का प्रकाश दूसरे दीये तक
अकेले जलते हैं, अकेले ही बुझ जाते हैं
बिना अपनी कोई पहचान छोड़े
बिना अपना कोई निशान छोड़े
दफ़न हो जाते हैं अतीत के गर्त में
खो जाते हैं इतिहास के पन्नों में

पर इस एक दिन
जलते हैं सारे दीये साथ-साथ
एक-दूसरे को प्रकाशित करते हुए
एक-दूसरे के प्रकाश से प्रकाशित होते हुए
इस जहाँ को जगमगाते
हर घर/गाँव/समाज/देश से
अँधेरे को भगाते
जलते हैं एक साथ
और जीत जाते हैं
काले घनघोर अँधेरे से

आइये, हम भी साथ खड़े हों, साथ चलें
साथ बढ़ें, साथ लड़ें
मानवता की जंग
विजय हमारी ही होगी
फिर चारों ओर होगा
अमन का उजियारा
चारों तरफ होगी सुख-शांति/
प्रेम और सद्भाव
सारे भेद-भाव भूलकर
मानवता मानवता को गले से लगा लेगी,
वही सच्ची दीवाली होगी!
वही सच्ची दीवाली होगी!!
वही सच्ची दीवाली होगी!!!

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

जड़ और चेतन

श्रांत/क्लांत/निश्चल
दरवाजे के चौखट पर बैठीं
अम्मा!
निर्निमेष भाव से
एकटक
देखे जा रही थीं
कड़क/तपती/खड़ी दुपहरी में तपते
किन्तु, छाया प्रदान करते
टिकोरों से लदे हुए
अमोले को।

निश्चय किया था
उन्होंने और पिताजी ने
रोपेंगे एक वृक्ष
अपने पुत्र के जन्म के मौके पर;
और रोपा था इस अमोले को
अपने एकमात्र पुत्र के जन्म के समय।

इस तरह
जन्म दिया था दो पुत्रों को
एक जड़;
एक चेतन!

दोनों बढ़े
विकसित हुए
स्वावलम्बी हुए।

जड़ अभी भी वहीं खड़ा है
चुपचाप
तपती/चिलमिलाती धूप में
शीतल छाया प्रदान करता;
अम्मा-पिताजी के परिश्रम का/
प्रेम और वात्सल्य का/
त्याग का
प्रतिफल प्रदान करता।

और चेतन...?

खो गया है कहीं
दुनिया की भीड़ में
उन्नति के शिखर की ओर अग्रसर
आधुनिकता का हाथ थामे हुए
पुरातन सोच/
पुरातन परम्पराओं से
पीछा छुड़ाकर,
विवश बुढ़ापे को
अकेलापन/घुटन देकर
खो गया है कहीं
हमारा चेतन!

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

हम भारतीयों के भी बड़े ठाट होते हैं

हम भारतीयों के भी
बड़े ठाट होते हैं,
बारह चार की गाड़ी को पहुँचने में
बारह आठ होते हैं।
समय से कहीं भी
हम नहीं पहुँचते,
देर से पहुँचना/प्रतीक्षा करवाना/दूसरों का समय नष्ट करना
बड़प्पन की निशानी समझते॥

अपना लिया है हमने
पाश्चात्य गीत/संगीत/नृत्य/
भाषा-बोली/खान-पान/रहन-सहन,
किन्तु, नहीं अपना सके
उनकी नियमितता/राष्ट्रीयता/अनुशासन।

करते हैं आधुनिकता का पाखण्ड,
भरते हैं उच्च सामाजिकता का दम्भ;
कहते हैं हमारी सोच नई है,
किन्तु, मानवता मर गई है!

भूलते जा रहे हैं
अपनी उत्कृष्ट
सभ्यता/संस्कृति/संस्कार/स्वाभिमान/
माता-पिता-गुरु का
मान-सम्मान/
गाँव/समाज/खेत/खलिहान/
देशप्रेम/राष्ट्रसम्मान!

अंतर्राष्ट्रीय मंच पर
अपनी बात कहने का
साहस नहीं कर पाते हैं,
गली-नुक्कड़ पर भाषणबाजी करते
जाति-धर्म के नाम पर
लोगों को भड़काते/आग लगाते हैं।

नहीं समझते हैं कि
कश्मीर/लेह/लद्दाख दे देने में
नहीं है कोई बड़ाई,
यह कोई त्याग नहीं है
यह तो है कदराई।

अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है
समय है, सँभल जाओ;
अरे वो सुबह के भूले बुद्धू
शाम को तो घर आओ!

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

मैं नारी हूँ !

मैं नारी हूँ !

विधाता की अनुपम सृष्टि/
ममतामयी दृष्टि/
भावनाओं की वृष्टि।

मैं जीवनदायिनी
पालक/पोषक हूँ,
सारे दुखों की
अवशोषक हूँ ।

प्रेम की
परिभाषा हूँ,
ज्ञानियों की
जिज्ञासा हूँ,
थकित मन की
आशा हूँ,
कामुक तन की
अभिलाषा हूँ ।

साक्षात दुर्गा हूँ
काली/लक्ष्मी/पार्वती
वीणावादिनी हूँ मैं,
मोहिनी/रम्भा/मेनका
कामायिनी हूँ मैं ।

भक्तों की
भक्ति हूँ मैं,
प्रकृति की
सृजन-शक्ति हूँ मैं ।

मैं नारी हूँ !

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

गाँधीजी को एक संक्षिप्त रिपोर्ट

गाँधी तेरे देश का, हो गया बंटाधार।
जित देखो तित व्याप्त है, झूठ और भ्रष्ट्राचार॥
झूठ और भ्रष्ट्राचार, द्वेष, हिंसा, बेईमानी,
शहर-गाँव की बाबा तेरे यही कहानी॥
खूनी हो गई खाकी, चोर हो गई खादी,
बंटाधार हो गया तेरे देश का गाँधी॥

सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

मुर्गा और मैं

रमुआ के मुर्गे की बाँग सुनकर रोज़ की तरह मेरी नींद खुल गयी। वह एकदम नियम से सुबह के ठीक साढ़े पाँच बजे बाँग देता था। मैंने घड़ी में पौने छः का अलार्म सेट कर रखा था और पन्द्रह मिनट तक बिस्तर में पड़े रहने के पश्चात् अलार्म की आवाज के साथ ही बिस्तर छोड़ता था।

यह सिलसिला कई महीनों से निर्बाध रूप से चला आ रहा था। किन्तु आज मुर्गे को बाँग दिए लगभग आधे घंटे हो गए, अलार्म नहीं बजा। मेरा माथा ठनका। उठकर घड़ी में समय देखा, तो अभी सुबह के साढ़े तीन बज रहे थे। क्रोध से शरीर काँपने लगा। मुर्गे की एक लापरवाही ने पूरी नींद खराब कर दी।

जैसे-तैसे सुबह हुई। तैयार होकर ऑफिस पहुँचा, तो पता चला कि मेरी सहायिका ने अचानक छुट्टी ले ली थी। पूरा मूड चौपट हो गया। ऑफिस का जो भी काम था, किसी तरह जल्दी-जल्दी निपटाकर लंच के एक घंटे पश्चात् ही घर के लिए रवाना हो गया। संयोग से बगीचे में ही मुर्गे से मुलाक़ात हो गयी, जो मस्ती में गाना गाते हुए चहलकदमी कर रहा था।

उसे देखते ही सारा क्रोध आँखों में उतर आया। किसी तरह अपने-आपको संयमित करते हुए पहुँच गया उसके सामने। वह देखते ही मुस्कराकर बोला - "भैया प्रणाम! बहुत जल्दी आ गए ऑफिस से?"

उसकी मीठी मुस्कान ने आग में घी का काम किया और मैं भड़क गया - "ये सब छोड़, पहले ये बता कि सुबह तूने इतनी जल्दी बाँग क्यों दी?"

वह शर्माने लगा। बोला - "वो बात यह है भैया कि सुबह साढ़े तीन बजे पड़ोस की मुर्गी के साथ मुझे डेट पर जाना था। तो मैंने सोचा कि जाने के पहले काम ख़तम कर लूं, पता नहीं वापसी में कितना समय लगे?"

मेरा पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। मैं बोला - "क्या तुझे थोडा भी आभास है कि अपने छोटे से स्वार्थ के लिए तूने कितने लोगों की नीद खराब कर दी?"

मुर्गे ने बड़ी मासूमियत से कहा - "बिगड़ क्यों रहे हो? आप भी तो आज ऑफिस से जल्दी आ गए.श। आपने भी तो वही किया जो मैंने किया। तो फिर मेरे ऊपर इतना क्रोधित क्यों हो रहे हैं? रही बात डेट पर जाने की, तो सभी लोग प्यार करते हैं, शादी करते हैं, बच्चे पैदा करते हैं। इसीलिये तो भगवान् ने स्त्री और पुरुष दोनों की रचना की है।"

उसके इस उत्तर पर मैं बौखला गया और कहा - "क्रोधित क्यों हो रहा हूँ? डेट पर जाने के लिए लोगों को तकलीफ देना कहाँ तक ठीक है? अरे! तुझे अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का कुछ अहसास है कि नहीं?"

मुर्गा भड़क उठा और कहा - "मैं कुछ नहीं बोल रहा हूँ तो सिर पर चढ़े जा रहे हैं आप। आप जैसे आदमी को सामाजिक जिम्मेदारी की बात करते हुए शोभा नहीं देता। जोरू के गुलाम हैं आप। माँ-बाप की हमेशा उपेक्षा करते हैं, उनकी कोई बात नहीं सुनते। अपने ही बच्चों का ध्यान नहीं है, पढ़ रहे हैं या घूम रहे हैं? पढ़ रहे हैं, तो क्या पढ़ रहे हैं? परीक्षा में कितना नंबर आया है, यह भी पता नहीं है, और मुझे सिखाते हैं सामाजिक जिम्मेदारी! पहला अपने घर की जिम्मेदारी देखिये, फिर किसी और को सामाजिक जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाइये।"

"बड़ा बदतमीज है तू।" मैंने कहा - "नैतिकता नाम की कोई चीज ही नहीं है तेरे अन्दर।"

मुर्गा बोला - "अब नैतिकता का पाठ भी मुझे आपसे पढ़ना पड़ेगा? बच्चों के सामने सिगरेट पीते हैं, अपने बाप की उम्र के लोगों का मज़ाक उड़ाते हैं, पत्नी के होते हुए भी लेडीज बीयर बार की सैर करते हैं, ऑफिस की लड़कियों के सामने ऊटपटांग बातें करते हैं। फिर भी नैतिकता की बात करते हुए शर्म नहीं आती?"

उसके इस जवाब पर मैं खिसियाकर रह गया। सारी अकड़ ढीली पड़ गयी। फिर भी आवाज में थोड़ी सख्ती लाते हुए बोला - "बड़े-छोटे का लिहाज नहीं है तेरे अन्दर, तभी से जवाब पर जवाब दिए जा रहा है?"

मुर्गे ने कहा - "नहीं, मैं आपके जैसा बिलकुल नहीं हूँ। इसीलिये इतना सब कुछ सुनने के बावजूद भी मैं आपको 'आप' कहकर ही बुला रहा हूँ। वर्ना कौन सा आपका दिया खाता हूँ कि आपकी बात सुनूं? अब यह लेक्चरबाजी बंद कीजिये और घर जाइए। और हाँ, एक बात और। पहले अपने-आपको सुधारिए, फिर दूसरों को शिक्षा देने के बारे में सोचियेगा। प्रणाम!"

इतना कहकर वह फिर से गुनगुनाते हुए चल दिया और मैं अवाक खड़ा उसको जाते हुए देखता रहा।

- राजेश मिश्र

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

जय माँ अम्बे!

मेरे मन के अंध तमस में ज्योतिर्मय उतरो ||
जय जय माँ अम्बे !
जय जय माँ दुर्गे !

नहीं कहीं कुछ मुझमें सुंदर,
काजल सा काला सब अन्दर |
प्राणों के गहरे गह्वर में करुणामयि उतरो।।
जय जय माँ अम्बे !
जय जय माँ दुर्गे !

नहिं जप-योग, न यज्ञ प्रबीना,
ज्ञानशून्य मैं सब विधि हीना |
ज्ञानचक्षु जागृत कर अम्बे जगमग जग कर दो।।
जय जय माँ अम्बे !
जय जय माँ दुर्गे !

जीवन की तुम एक सहारा।
शक्ति स्वरूपा जगदाधारा।
नवजीवन नवज्योति भरो माँ पापमुक्त कर दो।।
जय जय माँ अम्बे !
जय जय माँ दुर्गे !

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

टीस

तिल-तिल जलते रहते हैं
आँसू ढलते रहते हैं
स्मृतियों के चित्र-पटल पर
दृश्य बदलते रहते हैं

गुल्ली-डंडा, चिकई, कबड्डी
नानी-दादी की लोरी
भाग के घर से खेलने जाना
बाबा से चोरी-चोरी
माँ-बाबू की प्यार सनी
झिड़की को मचलते रहते हैं
स्मृतियों के चित्र-पटल पर
दृश्य बदलते रहते हैं

दादुर की टर्र-टर्र
और झींगुर की झन-झन
चातक-पपीहा-कोयल-मोर
बोलें तो झूमे तन-मन
सर्दी-गर्मी-वर्षा ऋतु के
चक्र बदलते रहते हैं
स्मृतियों के चित्र-पटल पर
दृश्य बदलते रहते हैं

यादें मन को मथती हैं
गाँव की राहें तकती हैं
उजड़ी बगियाँ, सूनी गलियाँ
आन मिलो अब कहती हैं
कजरी-फगुआ, दंगल-मेले
पल-पल सालते रहते हैं
स्मृतियों के चित्र-पटल पर
दृश्य बदलते रहते हैं

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

प्यासा हूँ मैं!

हाँ, प्यासा हूँ मैं!

भटक रहा हूँ खोज में
एक बूँद पानी की...
आँखों में आस लिए
होंठों पर प्यास लिए
सागर की गर्त में
सहरा के गर्द में
नदिया के करारों पर
बर्फ के पहाड़ों पर
सूखे मैदानों में
पथरीली चट्टानों में।

भटक रहा हूँ मैं खोज में
प्रेम के दो बोल की...
ह्रदय में प्यार लिए
सपनों का संसार लिए
शहरों में, गावों में
उफनती भावनावों में
दुनिया की भीड़ में
जंगल के बीहड़ में
अपनों में, परायों में
अनजाने सायों में।

भटक रहा हूँ मैं खोज में
तेरी...
आस्था का दीप लिए
श्रद्धा और प्रीत लिए
अन्तस्थ शिराओं में
पहाड़ों की गुफाओं में
ग्रंथों के सिद्धांत में
अखिल ब्रह्माण्ड में
जड़ में, चेतन में
विनाश में, सृजन में।

भटक रहा हूँ मैं,
क्योंकि प्यासा हूँ मैं!

- राजेश मिश्र

बुधवार, 15 सितंबर 2010

माँ हूँ मैं!

माँ हूँ मैं!
पल रही हूँ कोख में एक माँ की
लेकिन डरी-सहमी सी-
क्या मैं जन्म ले पाऊँगी? ये दुनिया देख पाऊंगी?
कहीं गर्भ में ही मार तो नहीं दी जाऊंगी?

माँ हूँ मैं!
उमंगो से भरी
कुलाचें भर रही हूँ मैं
माँ के प्यार तले, पापा के दुलार तले
लेकिन कांप उठती हूँ सोचकर
क्या मैं ससुराल जा पाऊँगी? क्या मैं माँ बन पाऊंगी?
कहीं जला तो नहीं दी जाऊंगी दहेज़ के लिए?

माँ हूँ मैं!
बेटी की शादी हो गई है
सुंदर सी बहू है मेरी, कभी-कभी मिल पाती हूँ
वृद्धाश्रम में रह रही हूँ न
बेटे का घर थोड़ा छोटा है!

माँ हूँ मैं!
चिंता लगी रहती है हमेशा अपने बच्चों की
घुलती रहती हूँ उनकी याद में
भगवान् उन्हें सुखी रखें! सदा सुखी रखें!!

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

मुझको भी पढ़ना है

लाओ, मेरा बस्ता दे दो,
मुझको भी अब पढ़ना है.
सीढियाँ सफलता की,
जीवन में अब चढ़ना है.
भूखे रहकर बहुत मैं सोया,
पेट मुझे भी भरना है.
फटे-पुराने छोड़ चीथड़े,
कपड़े नए पहनना है.
बोझ तले मैं तड़प रहा था,
अम्बर में अब उड़ना है.
पुरुषार्थ-चतुष्टय प्राप्ति के पथ पर,
मुझको आगे बढ़ना है.

सोमवार, 23 अगस्त 2010

गंगा बचाओ अभियान

विश्व की तमाम सभ्यताओं और संस्कृतियों का प्रादुर्भाव एवं विकास किसी न किसी नदी के तट पर हुआ है. नदियाँ हमेशा से ही किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था का आधार स्तम्भ रही हैं. अतः मानव-समाज सदा ही इनका ऋणी रहा है एवं जन्मदायिनी माता की भाँति इनका सम्मान करता आया है.

भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के पल्लवित एवं पुष्पित होने में जिन नदियों ने अपना अमूल्य योगदान दिया है, गंगा का स्थान उनमें सर्वोपरि है. गंगा एक पौराणिक नदी है एवं प्राचीन काल से ही हमारी आर्थिक एवं धार्मिक गतिविधियों का केंद्र-बिंदु रही है. यह गंगोत्री से उद्भूत होकर देश के एक बड़े भू-भाग को अपने अमृतमय मीठे जल से सिंचित करते हुए गंगासागर में जाकर समुद्र के आगोश में समाहित हो जाती है. गंगा का तटीय क्षेत्र भारतभूमि के सर्वाधिक उपजाऊ क्षेत्रों में से एक है. काशी, प्रयाग, हरिद्वार, कानपुर, कन्नौज, पाटलिपुत्र आदि पौराणिक एवं ऐतिहासिक नगरों का उद्भव एवं विकास इसी के पवित्र एवं समृद्ध तट पर हुआ है.

किन्तु मानव-सभ्यता के विकास में अत्यंत नजदीकी भूमिका निभाने वाली इन नदियों को इसका भयंकर दुष्परिणाम भी भुगतना पड़ा है. अनेकों नदियों का अस्तित्व समाप्त होने के कगार पर है. गंगा भी इससे अछूती नहीं रही है. इसके तट पर विकसित हुए कल-कारखानों का अवशिष्ट तथा नगरों की गन्दगी के इसमें लगातार प्रवाहित होने के कारण इसका अमृतमय जल लगातार प्रदूषित होता जा रहा है. अपने धारा के वेग से जन-समुदाय को रोमांचित कर देने वाली गंगा आज जीर्ण-शीर्ण हो गयी है तथा अनवरत अपने अंत की ओर अग्रसर होती जा रही है. वर्षों से मानव-समाज का उद्धार करती चली आ रही गंगा आज अपने स्वयं के उद्धार के लिए निरीह अवस्था में स्वार्थी मनुष्यों का मुँह ताक रही है.

हालाँकि गंगा को प्रदूषित होने से बचाने एवं इसकी प्रवाहमयता को बनाए रखने के लिए तमाम प्रबुद्ध जनों द्वारा व्यक्तिगत तथा संस्थागत तौर पर कई वर्षों से प्रयास किये जा रहे हैं, किन्तु सरकार के उपेक्षापूर्ण रवैये के कारण अभी तक इच्छित परिणाम प्राप्त करने में सफलता नहीं मिली है. लेकिन यह असफल रहा हो, ऐसा भी नहीं है. इनके प्रयास ने सरकार को इस कार्य में रूचि लेने को बाध्य कर दिया और पिछले वर्ष केंद्र-सरकार ने इस दिशा में एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए NGRBA (National Ganga River Basin Authority ) का गठन किया, जिसका उद्देश्य सन २०२० तक गंगा में अनुपचारित मल-प्रवाह या औद्योगिक-अवशिष्ट-प्रवाह पर पूर्णतया लगाम लगाना है.

अब आवश्यकता इस बात की है कि जो लक्ष्य सरकार ने निर्धारित किया है, वह सिर्फ फाइलों में सिमटकर न रह जाय, वरन कार्यरूप में परिणत हो. इसके लिए सारे भारतवासियों से मेरी अपील है कि व्यक्तिगत या संस्थागत, जिस स्तर पर भी संभव हो, इस अभियान में अपना अमूल्य योगदान प्रदान करें और आन्दोलन की तीव्रता को इतना बढ़ा दें कि सरकार किसी भी स्थिति में इससे पीछे न हट सके.

जय हिंद, जय भारत!

रविवार, 15 अगस्त 2010

उत्सव

कल १५ अगस्त है - हमारा स्वाधीनता दिवस. भारतवर्ष के दो प्रमुख राष्ट्रीय त्यौहारों में से एक. हम सभी भारतवासियों के लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण दिन. हम स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक हैं - यह याद करके खुश होने, इतराने का दिन... सारी दुनिया में अपनी स्वतंत्रता का डंका बजने का दिन... स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों की शहादतों को याद करने का दिन... तिरंगे झंडे को फहराने का और राष्ट्रगीत गाने का दिन... राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत भाषण देने, सुनने और राष्ट्रीयता के भावों से लबरेज गानों को बजाने और सुनाने का दिन... सरकार की उपलब्धियाँ (जिसमें से कुछ पिछले सालों से उधार ली जाती हैं, कुछ आने वाले सालों के लिए तैयार की जाती हैं) गिनाने का दिन... बड़े-बड़े वादे करने का दिन...इत्यादि...इत्यादि...

इतना बड़ा दिन! इतना बड़ा त्यौहार!! इतने सारे क्रिया-कलाप!!! ज़ाहिर है उत्सव भी बड़ा होगा. होगा क्या, होता ही है. स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस ही तो सबसे बड़े राष्ट्रोत्सव हैं. इस दिन की चहल-पहल, लोगों का उत्साह आदि अपने चरम पर होते हैं. वैसे सब लोगों के उत्साह के अपने-अपने कारण होते हैं. इसीलिए अनेक होते हैं, सिर्फ एक ही नहीं होता (समझ रहे हैं न, आप तो समझदार हैं...).

स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस के अलावा भी बहुत सारे उत्सव मनाए जाते हैं हमारे देश में. कुछ राष्ट्रीय स्तर पर, कुछ राज्य स्तर पर, कुछ जनपद स्तर पर, कुछ ग्राम्य स्तर पर, कुछ जाति के नाम पर, कुछ धर्म के नाम पर, कुछ भाषा के नाम पर, कुछ राज्य के नाम पर, कुछ क्षेत्र के नाम पर आदि (इंसानियत के नाम पर कुछ भी नहीं सुना है मैंने). क्रिया-कलाप के आधार पर इनको चुनावी उत्सव, धर्मोत्सव, क्रीड़ोत्सव आदि वर्गों में रखा जा सकता है. आपको शायद पता न हो (क्यों नहीं होगा, जब सारी दुनिया को पता है), दिल्ली में एक बहुत बड़े उत्सव की तैयारी जोर-शोर से चल रही है, जिसकी चर्चा हमारे गली-नुक्कड़ों से लेकर पूरी दुनिया में हो रही है.

उत्सवों के नाम पर एक बात याद आई. बचपन में हमने अपने गाँव-देहात में बहुत सारे छोटे-बड़े उत्सव देखे हैं. इनके कारण अलग-अलग होते थे, शरीक होने वालों की संख्या अलग-अलग होती थी, तैयारियाँ अलग-अलग तरीके से होती थीं, उद्देश्य अलग-अलग होते थे, खान-पान की व्यवस्था अलग-अलग होती थी. किन्तु, जो एक चीज़ सबमें सामान्य थी वह थी - कुत्तों की मौजूदगी.

ये कुत्ते भी बड़ी अजीब चीज़ होते हैं. आपके पड़ोस में रहने वाले भाई-बंधुओं को शायद पता न हो कि आपके घर कोई उत्सव होने वाला है, किन्तु गाँव के बाहर के (शायद आस-पास के गाँवों के भी) कुत्तों को पता चल जाता है. फिर क्या, काफी संवेदनशील जीव हैं ये. आते-जाते सारी तैयारी, सारी व्यवस्था और ख़ासकर सारी सामग्री पर पूरी संजीदगी से नज़र रखते हैं. मौका मिला नहीं कि मुँह मार लिया. उत्सव के दिन तक जिनको मौका नहीं मिला, वो जूठन पर ही हाथ साफ कर लेते हैं. चलो, जो ही हाथ सो ही साथ. इसी में एक-आध हरामी के पिल्ले होते हैं जो भण्डारे में घुसकर सारी भोजन-सामग्री का सत्यानाश कर देते हैं और आयोजन को पूरी तरह से चौपट कर देते हैं. परिणामस्वरूप, जग-हँसाई और सारी दुनिया में थू-थू. अरे भाई, अब इतने बड़े आयोजन की तैयारी एक दिन में तो नहीं की जा सकती है न.

आयोजन के चौपट होने में सिर्फ़ कुत्ते ही जिम्मेदार नहीं होते, प्रबन्ध-तन्त्र भी होता है. बल्कि ये कहें कि प्रबन्ध-तन्त्र की जिम्मेदारी सर्वोपरि होती है, तो गलत नहीं होगा. अब यह सबको मालूम है कि जहाँ उत्सव होगा, वहाँ कुत्ते तो आयेंगे ही. और आयोजन को कुत्तों के द्वारा बर्बाद होने से बचाने कि जिम्मेदारी प्रबन्ध-तन्त्र की ही होती है. तो स्वाभाविक है कि आयोजन की बर्बादी का प्रमुख जिम्मेदार प्रबन्ध-तन्त्र ही होगा.

तो क्या ऐसे नाकारा प्रबन्ध-तन्त्र को बने रहने का हक़ है? क्या उसे उखाड़कर फेंक नहीं देना चाहिए? क्या इन कुत्तों को सलाखों के पीछे नहीं ढकेल देना चाहिए? क्या उनको मौत के घाट नहीं उतार देना चाहिए जो हमारे मान-सम्मान को सारी दुनिया में नीलाम कर रहे हैं?

ज़रूर करना चाहिए. लेकिन, हमारी भोली-भाली (बेवकूफ कहना अच्छा नहीं लगता) जनता इन कुत्तों के पीछे खड़ी रहती है और उनके आवभगत में तल्लीन रहती है. जाति-धर्म-भाषा-क्षेत्र के बन्धनों से मुक्त होना ही नहीं चाहती.

अरे भाई, अब तो जागो... इस स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कुछ ऐसा करने का संकल्प लो कि हमारी आने वाली पीढ़ी का कल्याण हो.

जय हिंद, जय भारत.

जीवन चौथेपन में दुष्कर

जीवन चौथेपन में दुष्कर, धीरज धरना पड़ता है। मरने से पहले वर्षों तक घुट-घुट मरना पड़ता है।। दुखित व्यक्ति का साथ जगत् में किसको ईप्सित होता ह...