गुरुवार, 1 जनवरी 2026

देख लेना आस-पास

जब तुम्हारा मन दुखित हो, देख लेना आस-पास।
जब अभावों से ग्रसित हो, देख लेना आस-पास।

वेदनाएँ देख सबकी निज व्यथा अति लघु लगेगी,
हिय तुम्हारा जब व्यथित हो, देख लेना आस-पास।

एक ही सच लोग जितने बात उतने ही तरह की,
बुद्धि जब सुनकर भ्रमित हो, देख लेना आस-पास।

इस जगत में कुछ नहीं है जो सदा सुखकर लगे,
कष्ट कोई जब अधिक हो, देख लेना आसपास।

हर समस्या हल करे कोई कभी संभव नहीं,
विपद कोई उपस्थित हो, देख लेना आस-पास। 

जन्म का गन्तव्य जग में मृत्यु ही तो है सदा,
जब अघट कोई घटित हो, देख लेना आस-पास।

- राजेश मिश्र 

नव वर्ष

बीते संवत की स्मृतियाँ ले नए वर्ष के संग चलें।
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।

जीवन-पथ पर आगे बढ़ते
एक और सन छूट गया है।
नवल वर्ष नव मीत बना है,
गत से नाता टूट गया है।

क्या सचमुच संबंध पूरते तज यदि कोई संग चले?
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।१।।

विगत वर्ष या विगत व्यक्ति को
क्या हम कभी भूल पाते हैं?
जीवन जब तक है तब तक वे 
यादों में आते जाते हैं।

मन में उनकी मृदु यादों की लेकर सदा तरंग चलें।
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।२।।

आगत के स्वागत में लेकिन
विघ्न विगत मत बनने पाए।
एक द्रवित छूकर कर जाए,
दूजा छूकर मन हरषाए। 

सामंजस्य रहे दोनों में हम कुछ ऐसे ढंग चलें। 
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।३।।

कज = दोष, छल

- राजेश मिश्र

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

संघर्ष हमारा जारी है

पुरखों के त्याग परिश्रम से उत्कर्ष हमारा जारी है। 
बाह्याभ्यंतर रिपुओं से नित संघर्ष हमारा जारी है।।

सदियों से सतत चला आया 
संघर्ष सदा संस्कृतियों का,
कुछ का अस्तित्व अभी बाकी, 
कुछ पुंज शेष स्मृतियों का।
हाँ, शेष वही बस बच पायीं
जिनको निज पर विश्वास रहा,
दुनिया में वही फलीं-फूलीं
जिनको सत्ता का साथ रहा।

हम श्रेष्ठ रहे, हम श्रेष्ठ रहें, अनुतर्ष हमारा जारी है। 
बाह्याभ्यंतर रिपुओं से नित संघर्ष हमारा जारी है।।१।।

चाहे जिस कारण से जग में
जब-जब सत्ता संघर्ष हुआ, 
इक संस्कृति नवजीवन पायी,
इक संस्कृति का अपकर्ष हुआ।
युग-युग से यह चलता आया,
युग-युग तक चलता जाएगा,
जो सतत सतर्क सबल होगा,
केवल वह ही बच पायेगा।

हमने हर युग बलिदान दिया, उत्सर्ग हमारा जारी है।
बाह्याभ्यंतर रिपुओं से नित संघर्ष हमारा जारी है।।२।।

कुछ संस्कृतियाँ अनुदार अधम
असहिष्णु और अति हिंस्र रहीं,
कुछ अति उदार अरु अति सहिष्णु,
कुछ संस्कृतियाँ सम्मिश्र रहीं।
जो अति उदार अरु अति सहिष्णु 
वे आगे चल इतिहास बनीं,
अनुदार हिंस्र संस्कृतियों का 
अति सरल सहज सब ग्रास बनीं।

हम सह-अस्तित्व समर्थक नित दृढ़ मर्ष हमारा जारी है।
बाह्याभ्यंतर रिपुओं से नित संघर्ष हमारा जारी है।।३।।

हम रहे उदार सहिष्णु सदा,
हम सबको लेकर साथ चले।
इस सदय सनातन संस्कृति की 
छाया में कितने पौध पले।
हमने निज शोणित से सींचा
शरणागत सब संस्कृतियों को 
नित पाला-पोसा, प्रेम दिया,
बिसरा उनकी अपकृतियों को।

उन्मुख उस पथ पर हैं अब भी, आदर्श हमारा जारी है। 
बाह्याभ्यंतर रिपुओं से नित संघर्ष हमारा जारी है।।४।।

भारत जब तक परतंत्र रहा
हम क्षरणोन्मुख निरुपाय रहे,
नित प्रति जूझे अस्तित्व हेतु
दिन-दिन अनगिन अन्याय सहे।
पुनि संरक्षक सत्ता पाकर
कुछ वर्षों से फल-फूल रहे,
हो अब प्रयास पर्यंत-प्रलय
सत्ता अपने अनुकूल रहे।

संकल्प सभी का हो सबसे अवमर्श हमारा जारी है।
बाह्याभ्यंतर रिपुओं से नित संघर्ष हमारा जारी है।।५।।

अनुतर्ष  = कामना, इच्छा 
मर्ष = सहनशीलता, धैर्य 
अपकृति = आघात, दूसरा, उत्पीड़न, कुकर्म 
क्षरणोन्मुख = क्षरण + उन्मुख
अवमर्श = सम्पर्क 

- राजेश मिश्र

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

किसी को शायरी मुश्किल, कहीं श्रोता नहीं मिलता

किसी को शायरी मुश्किल, कहीं श्रोता नहीं मिलता।
चतुर्दिक प्रेम का सूखा कहीं सोता नहीं मिलता। 
जहाँ जाते जगत में तुम हँसी बस ढूँढते रहते,
इसी कारण कभी कोई कहीं रोता नहीं मिलता।।

धधकती भू, तड़पते जन, सिसकते फेफड़े निशिदिन,
हवा का शुद्ध शहरों में, कहीं झोंका नहीं मिलता।

जहाँ लहलह लहरती थी फसल मौसम कोई भी हो,
पड़े परती उन्हें कोई कहीं बोता नहीं मिलता।

सुनी थी श्रवण की गाथा सदा हमने लड़कपन में, 
दुखद अब वृद्ध कोई भी कहीं ढोता नहीं मिलता।

लुटेरे-चोर-हत्यारे सदा थे किंतु अब कोई 
लहू के दाग छुप-छुपकर कहीं धोता नहीं मिलता।

प्रिये! जब तुम मिला करती मगन मन नाच उठता था,
वही मन किंतु अब विह्वल कहीं होता नहीं मिलता।

- राजेश मिश्र 

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

वीर बाल दिवस

भारत सतत समृद्ध समर्पित राष्ट्रभक्त दीवानों से।
सत्य सनातन सदा सुरक्षित वीरों के बलिदानों से।।
इस्लामी आँधी के आगे झुके नहीं वे तने रहे।
नमन है गुरु, गुरु-पुत्रों को जो धर्म-धुरंधर बने रहे।

मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

कौन पाया पार तेरा

शून्य-सा विस्तृत सरस संसार तेरा।
इस जगत में कौन पाया पार तेरा?।

कर्म तू करता नहीं, सब बोलते हैं, 
किंतु क्षण-क्षण चल रहा व्यापार तेरा।।

है नहीं आकार कोई, कौन कहता,
रूप कण-कण में सदा साकार तेरा।।

सत्त्व-रज-तम से परे नहिं राग तुझमें,
पर बरसता है सभी पर प्यार तेरा।।

तू अक्रिय है, मान लेते हैं कि सच है 
क्या घटित, जिस पर नहीं अधिकार तेरा?।

है अजन्मा, जन्म तुझसे ही सभी का,
जीव-जड़ से प्रेम ही सत्कार तेरा।।

अहम् मेरा जब कभी चोटिल हुआ,
स्नेह जैसे बढ़़ गया हर बार तेरा।।

चित्त व्याकुल, करूँ साक्षात्कार कैसे?
स्मरण हो हिय में सतत दातार तेरा।।

लोग विह्वल, शुभ चतुर्दिक हो रहा है,
अवध में जबसे सजा दरबार तेरा।।

- राजेश मिश्र 

सनातन

ऋषियों-मुनियों-कवियों ने नित सदियों से गाथा गाई है।
शिव सत्य सनातन की महिमा, पूरी किसने कह पाई है?। 

ईश्वर-श्रीमुख-निस्सृत निर्मल
यह प्राणि-धर्म अति पावन है।
जड़-चेतन मंगलकारक है,
सुखकर, सब दुःख नसावन है।
श्रुति-पथ समदर्शी समग्राही,
शाश्वत संसृति सरसावन है।
सद्धर्म अनादि आदि अद्भुत
अति मनमोहक मनभावन है।

जो भी इसके शरणागत है, उसने जीवन-निधि पाई है।
शिव सत्य सनातन की महिमा पूरी किसने कह पाई है?।१।।

इसमें जड़ता का नाम नहीं,
यह चेतन है, नित नूतन है। 
दृढ़ आत्मनियंत्रण, आत्मशुद्धि,
इसमें निज का प्रतिचिंतन है।
सब धर्मों-पंथों का जन्मद,
यह कालातीत चिरंतन है।
इसकी सब शाखायें-टहनी,
यह परम पुनीत पुरातन है।

हिमगिरि अभेद्य, यह अमित सिंधु, इसमें अथाह गहराई है।
शिव सत्य सनातन की महिमा पूरी किसने कह पाई है?।२।।

ईश्वर प्रदत्त उपहार अतुल,
यह प्राणिमात्र परिपोषक है।
पुरुषार्थ-चतुष्टय पथदर्शक,
जग सकल काम परितोषक है।
निज जन-जीवन नित हितकारक,
भव दारुण दुख अवशोषक है।
इस वैभवशाली संस्कृति का
परिचायक है, उद्घोषक है। 

ईश्वर दुर्लभ प्रत्यक्ष भले, यह ईश्वर की परछाईं है।
शिव सत्य सनातन की महिमा, पूरी किसने कह पाई है?।३।।

श्रुति रुचिर ऋचाओं का गायन
देवों को मोहित करता है।
दैवी अनुकंपा से सिंचित
जग-जीवन सदा सँवरता है।
यह ज्ञान, कर्म अरु भक्ति सरस
जस विविध मार्ग बतलाता है।
ये दीर्घ-सूक्ष्म, मृदु-कठिन-सरल,
जन निज-निज रुचि अपनाता है।

दर्शन पुराण स्मृति गीता ने, पग-पग पर राह दिखाई है।
शिव सत्य सनातन की महिमा, पूरी किसने कह पाई है?।४।।

इस सुंदर सघन गहन वन को
दुष्टों ने नित रौंदा-काटा।
कुछ आए, लूटे, चले गए,
कुछ ने शरणागत हो छाँटा।
सामर्थ्य कहाँ किसमें इतनी 
इसका अस्तित्व मिटा पाए?
जिसका कोई प्रारंभ नहीं,
फिर अंत भला कैसे आए?

अपनों ने औरों से बढ़कर, आभ्यंतर क्षति पहुँचाई है।
शिव सत्य सनातन की महिमा पूरी किसने कह पाई है?।५।।

- राजेश मिश्र

शनिवार, 20 दिसंबर 2025

कुंडी फिर भी खटकाऊँगा

तुम चाहे मुझको दुत्कारो, मैं द्वार तुम्हारे आऊँगा।
दरवाजा मुँह पर बंद करो, कुंडी फिर भी खटकाऊँगा।

यह स्वाभिमान की बात नहीं, 
अस्तित्व हमारा संकट में।
सारी दुनिया से शेष हुए,
सिमटे हैं केवल भारत में।
कुछ स्वार्थ-पूर्ति में लिप्त रहे
निज नेताओं ने पाप किया।
यह देश बँटा पर म्लेच्छों सँग
रहने का चिर अभिशाप दिया।

तुम जितना इसे नकारोगे, मैं बार-बार दोहराऊंगा।
दरवाजा मुँह पर बंद करो, कुंडी फिर भी खटकाऊँगा।।१।।

हम सदियों तक परतंत्र रहे,
अति अत्याचार हुए हम पर।
शासक अब्राहम के वंशज,
लूटे काटे हमको जमकर। 
इक छोड़ गया, पर तोड़ गया,
इक हिस्सा ले भी जमा रहा।
जो आस्तीन में पल-पल कर
नित दंत विषैले धँसा रहा।

तुम स्वीकारो मत स्वीकारो, मैं अरि को अरि बतलाऊँगा। 
दरवाजा मुँह पर बंद करो, कुंडी फिर भी खटकाऊँगा।।२।।

सन सैंतालिस पश्चात पाक
में कितने हिंदू शेष अभी?
शलवार पहन ली, जीवित हैं,
जो लड़े, रहे वे खेत सभी।
इकहत्तर में जिनकी खातिर
यह बांग्लादेश बनाया था। 
उन सबने कब, किस मौके पर
भारत का साथ निभाया था?

तुम झूठे सपने देखोगे, मैं विकट सत्य दिखलाऊँगा।
दरवाजा मुँह पर बंद करो, कुंडी फिर भी खटकाऊँगा।।३।।

भारत में जो भी रहे शेष
वे चिंगारी से आग बने।
इन अठहत्तर वर्षों में भी 
अपने कितने घर-बार जले?
जैसे बांग्लादेशी हिंदू
जल रहा आजकल सड़कों पर। 
चेतो, वरना दिन दूर नहीं
तुम भी तड़पोगे जल-जलकर।

तुम जब तक नहीं समझ जाओ, मैं लगातार समझाऊँगा।
दरवाजा मुँह पर बंद करो, कुंडी फिर भी खटकाऊँगा।।४।।

पुरखों ने निज बलिदान दिया
हमको यह हिंदुस्थान दिया।
उनके कारण हम शेष अभी
क्या तुमने यह संज्ञान लिया?
यदि यह टुकड़ा भी गँवा दोगे,
अपनी संतति को क्या दोगे?
बच्चे किस कोने जाएंगे?
वंशज समाप्त हो जाएंगे।

तुम गीत पुराने भूलोगे, मैं नया गीत रच लाऊँगा।
दरवाजा मुँह पर बंद करो, कुंडी फिर भी खटकाऊँगा।।५।।

- राजेश मिश्र

मन मगन मनमीत मुझको मिल गए

व्योम-प्रांगण में सितारे खिल गए।
मन मगन मनमीत मुझको मिल गए।।

प्यार से देखा, मिले कुछ इस तरह,
अधर पर मुसकान दे, ले दिल गए।।

व्यर्थ की बकवाद तो करता रहा,
पर समय पर होंठ उसके सिल गए।।

मेहनताना तय प्रदर्शन पर हुआ,
सब निकम्मे काम पर फिर पिल गए।।

योग्यता पर जाति यूँ हावी हुई,
देश तज परदेश सब काबिल गए।।

दूसरों का दर्द ही ढोता रहा,
क्या पता कब पाँव मेरे छिल गए।।

- राजेश मिश्र

मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

तुमको खोकर खो जायेंगे

गीत हमारे उपजे तुमसे तुममें ही लय हो जायेंगे।।
तुमको पाकर पाया खुद को तुमको खोकर खो जायेंगे।।

तुमसे ही प्रातः होती है 
रात तुम्हारे सँग सोती है
रवि-राकेश तुम्हीं से भासित
संध्या भी रक्तिम होती है 

तुमसे ही उगते हैं तारे बिन तुम सब गुम जायेंगे।
तुमको पाकर पाया खुद को तुमको खोकर खो जायेंगे।।१।।

तुमसे कलियाँ मुसकाती हैं
विकसित होकर इतराती हैं
हँसता है यह मधुमय मधुबन
भृंगावलियाँ भी गाती हैं

सुमन-सुमन सुरभित तुमसे तुम बिन बिन सौरभ हो जाएंगे।
तुमको पाकर पाया खुद को तुमको खोकर खो जायेंगे।।

तुमसे ही पंछी गाते हैं 
पंख तुम्हीं से बल पाते हैं 
और तुम्हारा ही संबल ले
नभ में निर्भय मंडराते हैं

तुमसे ही जगमग जीवन है तुम बिन शव सम हो जायेंगे।
तुमको पाकर पाया खुद को तुमको खोकर खो जायेंगे।।

- राजेश मिश्र

प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।

चिर विरह देकर चले तुम, प्राण मेरे!
प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।

दोष मेरा क्या? भला कुछ तो बताओ,
छोड़कर मुझको अकेले यूँ न जाओ।
स्वप्न जितने संग मिल हमने सजाये
कल्पनाओं के महल जो भी बनाये।

भस्म सब कुछ कर चले तुम, प्राण मेरे!
प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।१।।

जो नयन निशि-दिन तुम्हारी राह तकते,
भंगिमाओं पर तुम्हारे नत थिरकते।
जगत से निर्लिप्त नित तुमको निहारें,
कामनायें संपदा सुख त्याग सारे।

अश्रु उनमें भर चले तुम, प्राण मेरे!
प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।२।।

हृदय-मंदिर में सदा तुमको बिठाया,
भोग तन-मन का सदा तुमको लगाया।
किए अर्पित भावना के पुष्प सारे,
नित रहा जीवन समर्पित हित तुम्हारे श।

भूल क्या? तजकर चले तुम, प्राण मेरे!
प्राण मेरा हर चले तुम, प्राण मेरे!।२।।

- राजेश मिश्र

आखेटक आँखों से कह दो

आखेटक आँखों से कह दो कुछ तो अब आराम करें।
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।

भृकुटि-कमान काम-सी चंचल
तीक्ष्ण तीर हावों-भावों के।
सन-सन सन-सन चलते रहते 
भर देते अगणित घावों से।

निर्दय व्याध दृगों से कह दो थोड़ा तो विश्राम करें। 
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।१।।

हृष्ट-पुष्ट कंचन काया पर
दृष्टि सहज ही रुक जाती है।
मंद-मंद मनमोहक चालें 
गजगामिनि! मन ललचाती हैं।

आमंत्रक अंगों से कह दो यूँ मत मेरे प्राण हरें।
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।२।।

कोमल कलियों-से अधरों पर 
मधुर हँसी जब-जब आती है। 
तन-मन उपवन को शब्दों के 
सौरभ से महका जाती है।

मुस्काते होंठों से कह दो बेसुध कर मत ध्यान हरें।
हृदय-हिरण हो बिद्ध तड़पता और न शर संधान करें।।३।।

- राजेश मिश्र

वानप्रस्थी हो चला पर मन भटकता ही रहा

वानप्रस्थी हो चला पर मन भटकता ही रहा। 
कामनाओं के प्रलोभन पर अटकता ही रहा।।

दुरदुराकर दूर करता जब कभी आता यहाँ,
स्नेह या फिर विवशता, लेकिन फटकता ही रहा।।

लड़खड़ाया जब कभी, उसको सँभाला हाथ दे 
पर उसी की आँख में हरदम खटकता ही रहा।।

मन दिलासा दे रहा था डर नहीं कोई मगर,
वह अगर कह दे 'नहीं'? यह दिल धड़कता ही रहा।।

विघ्न-बाधाएँ बहुत थीं जिंदगी में हर कदम,
किंतु कब जीवन रुका? पल-पल सरकता ही रहा।।

विरह का शोला उठा तुमसे बिछड़कर के प्रिये!
उम्र तो ढलती गई, पर वह धधकता ही रहा।।

- राजेश मिश्र 

सोमवार, 15 दिसंबर 2025

शुष्क सरिता का किनारा हो गया हूँ

शुष्क सरिता का किनारा हो गया हूँ।
शून्य का खोया सितारा हो गया हूंँ।।

मैं सहारा क्या बनूँगा और का?
जब स्वयं ही बेसहारा हो गया हूँ।।

सगर-पुत्रों! कौन तारेगा तुम्हें?
गंग की विपरीत धारा हो गया हूँ।।

नासमझ निज झुंड से कटता गया 
शत्रुओं का सहज चारा हो गया हूँ।।

सूर्य-सा तन तेज सारा ढल गया
शाम का गुमसुम नजारा हो गया हूँ।।

जिंदगी में और पर आश्रित हुआ 
वृद्ध या बालक दुबारा हो गया हूँ।।

- राजेश मिश्र

रविवार, 14 दिसंबर 2025

अपरिमित कष्ट होता है

पुराने घाव मत छेड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।
अगर कटु सत्य, मत बोलो, अपरिमित कष्ट होता है।।

छुवा तुमने गुलों को जब हँसे वे खिलमिलाकरके,
न काँटों से प्रिये! लिपटो, अपरिमित कष्ट होता है।।

नहीं सम्भव, नहीं कह दो, न झूठे स्वप्न दिखलाओ,
न देकर आसरा तोड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।।

भला है तो भला कह दो, बुरा है तो बुरा कह दो,
मगर कुल-जाति मत उघटो, अपरिमित कष्ट होता है।।

न हो संगी समय फिर भी अकेले बीत जाता हैं,
न अपनाकर कभी छोड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।।

जिन्होंने थाम कर उँगली सिखाया दौड़ना जग में,
न उनसे मुँह कभी मोड़ो, अपरिमित कष्ट होता है।।

- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025

अमन की आशा

भाईचारे के नकाब में 
छलती रही अमन की आशा।
पीठ में खंजर भोक-भोंक कर
चलती रही अमन की आशा।।

गंगा की उज्ज्वल धारा के
श्यामल यमुना से संगम पर
तहजीबों का नाम चलाकर
पलती रही अमन की आशा।।

श्रुति-पुराण को, धर्म-ध्यान को
ऋषि-मुनियों के अगम ज्ञान को
झूठ और पाखंड बताकर
फलती रही अमन की आशा।।

कभी जाति के नाम लड़ाकर 
कभी कहीं आतंक मचाकर
हिंदू-रक्त-तेल पी-पीकर
जलती रही अमन की आशा।।

बहन बेटियों के गौरव को 
धर्म बदलकर छत से, बल से 
सदियों से पैरों के नीचे 
दलती रही अमन की आशा।।

अब भी सोते रह जाओगे 
लुट जाओगे, मिट जाओगे
जाग्रत जन को सदा-सदा से
खलती रही अमन की आशा।।

- राजेश मिश्र

पहला-पहला पत्र तुम्हाराजबसे मैंने पाया है

पहला-पहला पत्र तुम्हारा
जबसे मैंने पाया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।

कितना प्यारा पल होगा जब
पत्र तुम्हारा बाँचूँगा।
प्रथम पत्र का अनुपम अनुभव
अंतस् ही में जाँचूँगा।

वक्ष लगाए घूम रहा हूँ
जबसे यह खत आया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।१।।

जो भी काम अधूरा दिखता
तुरत वहाँ लग जाता हूँ
तज आलस्य-प्रमाद, सजग हो
सद्य उसे निपटाता हूँ

नहीं चाहता कोई आए
कहते तुम्हें बुलाया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।२।।

विह्वल विह्वल हृदय हमारा 
सँभली सँभली धड़कन है
तपन बढ़ रही, अधर शुष्क हैं
अंग अंग में कंपन है

अनियंत्रित तन, झूम रहा मन
स्वेद माथ पर छाया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।३।।

भीड़ चतुर्दिक, अवसर ढूँढूँ
पत्र खोल पढ़ पाऊँ मैं।
तुम अति दूर, बताओ कैसे
हिय का हाल बताऊँ मैं?

जिनका साथ सदा से प्रिय था,
सबसे जी उकताया है।
कब एकाकी होऊँ, खोलूँ
मन अतिशय अकुलाया है।।४।।

- राजेश मिश्र

रविवार, 7 दिसंबर 2025

मैंने तुमको देखा है

दबे पाँव छुप-छुपकर जाते मैंने तुमको देखा है।
खिड़की का परदा सरकाते मैंने तुमको देखा है।।

चाहे जितना भी बोलो तुम मुझसे तुमको प्रेम नहीं,
मेरी चर्चा पर मुसकाते मैंने तुमको देखा है।।

कल तक दाँत-कटी-रोटी का जिससे घन संबंध रहा, 
आज उसी से आँख चुराते मैंने तुमको देखा है।।

छोटी सी इक चूक हुई है, क्यों इतने उद्वेलित हो?
गलती करते और छुपाते मैंने तुमको देखा है।।

अपने बारे में कुछ सुनकर इतना क्षूब्ध न होवो तुम,
निंदा-रस आनंद उठाते मैंने तुमको देखा है।।

बात-बात पर नैतिकता की बात उठाना ठीक नहीं, 
उन गलियों में आते-जाते मैंने तुमको देखा है।।

- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

प्रिय! तुमने अन्याय किया है।

प्रिय! तुमने अन्याय किया है।

वाणी से जो-जो करना था, आँखों से अंजाम दिया है।
प्रिय! तुमने अन्याय किया है।।

भाव हृदय के जब भी शब्दों में ढल आए 
क्रूर मौन से लड़कर बोल नहीं बन पाए 
विवश वाक् की हर पीड़ा को मर्यादा का नाम दिया है। 
प्रिय! तुमने अन्याय किया है।।१।।

अधरो की कलियों ने जब-जब खुलना चाहा
मधुमय हो श्रवणों में जब-जब घुलना चाहा
प्रेम-पयस् पावन-प्रवाह को निर्दयता से थाम लिया है। 
प्रिय! तुमने अन्याय किया है।।२।।

चंचल निर्मल कोमल दृग किसको बतलाएँ
सबके कर्तव्यों का थककर बोझ उठाएँ
तुमने इन नाजुक अंगों को हद से बढ़कर काम दिया है।
प्रिय! तुमने अन्याय किया है।।३।।

- राजेश मिश्र

मंगलवार, 25 नवंबर 2025

धर्म-ध्वजा फहराई है

सदियाँ बीतीं, शुभ दिन आया, अवधपुरी हर्षाई है।
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

हर्षित हैं सब देव-देवियाँ
हर्षित हैं धरतीवासी 
मन प्रसन्न आशान्वित नाचें
संभल, मथुरा अरु काशी

शीघ्र हमें भी मुक्ति मिलेगी, आँख सजल हो आई है।
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

हर शरणागत, दुखी-दीन को
हमने हृदय लगाया है 
किंतु कृतघ्नों ने पीछे से 
हम पर छुरा चलाया है 

छद्मयुद्ध में धर्म निभाकर हमने जान गँवाई है। 
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

करुणा और प्रेम से हमने 
उनके आँसू पोंछे हैं
प्रत्युत्तर में अश्रु दिया है 
वे घाती हैं, ओछे हैं

कायरता माना सबने जब हमने दया दिखाई है।
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

रक्तबीज हैं शेष अभी भी
धर्मयुद्ध नित जारी है
उन्हें समूल नष्ट करने की 
अपनी भी तैयारी है

साँपों और सँपोलों का वध करने की रुत आई है।
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

हर हिंदू अब जाग रहा है 
म्लेच्छ मिलेंगे गारत में 
लहर लहर लहराएगा अब
हर घर भगवा भारत में

खोया यश पाने के क्रम में यह पहली अँगड़ाई है 
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

- राजेश मिश्र 

देख लेना आस-पास

जब तुम्हारा मन दुखित हो, देख लेना आस-पास। जब अभावों से ग्रसित हो, देख लेना आस-पास। वेदनाएँ देख सबकी निज व्यथा अति लघु लगेगी, हिय तुम्हारा जब...