रविवार, 19 जनवरी 2025

मानव हैं हम द्वेष सहज है

मनुज स्वभाव, नहीं अचरज है।
मानव हैं हम, द्वेष सहज है।।

निर्बल को जब सबल सताए,
वह प्रतिकार नहीं कर पाए,
मन पीड़ा से भर जाता है, 
द्वेष हृदय घर कर जाता है।

वचन कठोर बोलता कोई,
जब औकात तोलता कोई,
व्यक्ति जहाँ जब डर जाता है,
द्वेष हृदय घर कर जाता है।

जब कोई प्रिय वस्तु हमारी,
लगती जो प्राणों से प्यारी,
कोई हमसे हर जाता है,
द्वेष हृदय घर कर जाता है।

जब जीवन दुखमय हो अपना,
सुख बस बन जाए इक सपना,
औरों का सुख खल जाता है,
द्वेष हृदय घर कर जाता है।

कर्महीन जब हम होते हैं,
दैव-दैव करते रोते हैं,
कर्मठ आगे बढ़ जाता है,
द्वेष हृदय घर कर जाता है।

आशंका से त्रस्त रहें जब,
तिरस्कार-दुत्कार सहें जब,
प्रेम हृदय का मर जाता है,
द्वेष हृदय घर कर जाता है।

यद्यपि द्वेष सहज होता है,
किंतु सदा दुखप्रद होता है।
शांति हमारी हर लेता है,
क्रोध-घृणा मन भर देता है।

तिल-तिल हमें जलाता रहता,
रोगी सतत बनाता रहता।
तन-मन को दूषित कर देता,
अंदर विष-ही-विष भर देता।

सुहृद दूर हो जाते सारे,
सुख सपने बन जाते सारे।
कोई निकट नहीं आता है,
यह एकाकी कर जाता है।

सारा ज्ञान नष्ट कर देता।
निर्मल बुद्धि भ्रष्ट कर देता।
पापाचार बढ़ा देता है।
जीवन नर्क बना देता है।

दावानल यह द्वेष सहज है।
इसको तज पाना अचरज है।‌।

- राजेश मिश्र 

सोमवार, 13 जनवरी 2025

चुपके-चुपके मुझको देखें

चुपके-चुपके मुझको देखें,
मैं देखूँ तो छुप जाते हैं।
प्रेम हृदय का दृग से छलके,
कहते-कहते रुक जाते हैं।।

आँखें चञ्चल हिरनी जैसी,
सतत कुलाँचें भरती हैं।
पल को झाँके, पल में भागे,
पल भर सद्य ठहरती है।

खुलती मधुर अधर कलियों पर,
लोलुप भँवरे लुट जाते हैं।
प्रेम हृदय का दृग से छलके,
कहते-कहते रुक जाते हैं।।१।।

कांत-कपोल अरुण आभा से
हृदय-कमल खिल जाता है।
भावों की भावन सुगंध से
मन महमह महकाता है।

दंतावलि-द्युति चकाचौंध पर
लाखों दिनकर झुक जाते हैं।
प्रेम हृदय का दृग से छलके,
कहते-कहते रुक जाते हैं।।२।।

अलकें लोल कलोल निरत नित
अंग-अंग को चूम रहीं।
अन्-अधिकृत अंगों पर जहँ-तहँ
आवारा बन घूम रहीं।

लालायित द्वेषित दृग सबके
मुझ भागी पर उठ जाते हैं।
प्रेम हृदय का दृग से छलके,
कहते-कहते रुक जाते हैं।।३।।

- राजेश मिश्र 

शनिवार, 11 जनवरी 2025

हिंदी की शुद्धता

हमारी संस्कृति और परंपरा में माता-पिता का स्थान सर्वोच्च है, और इन दोनों में भी माता प्रथम पूजनीया है। कहा गया है कि यदि माता और पिता दोनों साथ में बैठे हों तो पहले माता को प्रणाम करना चाहिए, तत्पश्चात पिता को। उल्लेखनीय है कि जब भगवान राम वनगमन के लिए तत्पर हुए तो माता कौशल्या ने उनसे कहा -

जौं केवल पितु आयसु ताता। 
तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।
जौं पितु मातु कहेउ बन जाना।
तौ कानन सत अवध समाना।।

वाल्मीकि रामायण में कहा गया है -

जननीजन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

स्कंद पुराण में माता के संबंध में उद्धृत है कि - 

नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गति:। नास्ति मातृसमा त्राण नास्ति मात्सया प्रपा।। 

विभिन्न शास्त्र बार-बार माता की महिमा का बखान करते हैं। साथ ही ध्यातव्य  है कि माता शब्द केवल जन्मदात्री के लिए रूढ़ नहीं है। इसकी व्यापकता जड़ से चेतन और स्थूल से सूक्ष्म तक सर्वत्र है। इन्हीं असंख्य माताओं में एक माता हमारी भाषा भी है। उदाहरण के लिए संस्कृत भाषा की वंदना करते हुए कहा जाता है कि -

वन्दे संस्कृत मातरम्।

राजभाषा और हमारी मातृभाषा हिंदी भी हमारी इन्ही पूजनीय माताओं में से एक है। भारतवर्ष की अनेकानेक भाषाओं की भाँति हिंदी का भी उद्भव-स्रोत संस्कृत ही है और विकास-क्रम संस्कृत - पालि - प्राकृत - अपभ्रंश - अवहट्ट - खड़ी बोली है।

विदेशी आक्रमणों, मुगलों के आधिपत्य और उर्दू के विकास के साथ-साथ हिंदी में अरबी, फारसी इत्यादि विदेशी भाषाओं के शब्द स्थान पाने लगे। कालांतर में एक योजना के अनुरूप भी हिंदी में संस्कृतनिष्ठ शब्दों को इन विदेशी भाषाओं के शब्दों से विस्थापित किया जाने लगा। एक ओर संस्कृत को अत्यंत कठिन और क्लिष्ट बढ़कर लोगों में उसके प्रति भय और द्वेष पैदा किया गया, तो दूसरी ओर हिंदीभाषियों के बीच हिंदी को माँ (जो कि निस्संदेह है भी) और उर्दू को उनकी मौसी बढताकर दुष्प्रचार किया गया ताकि वे निर्विरोध उर्दू के अस्तित्व को स्वीकार कर लें। साथ ही पत्र-पत्रिकाओं तथा शायरियों और गजलों इत्यादि के माध्यम से उर्दू का खूब प्रचार-प्रसार किया गया। संस्कृत और हिंदी के उत्कृष्ट छंदों को बंधन बढताकर छंदमुक्त कविता का प्रचार-प्रसार हुआ, किंतु वहीं शायरी के लिए बहर में ही लिखना आज भी आवश्यक है। ठीक वैसे ही जैसे घूंघट को पिछड़ेपन तथा स्त्री की स्वतंत्केरता -हनन से जोड़ दिया गया और बुर्के को संस्कृति, धर्म और स्त्री की मर्यादा से। 

धीरे-धीरे हिंदी में उर्दू के शब्दों की अधिकता होती गई और इसमें एक बड़ी भूमिका निभाई वामपंथियों और बॉलीवुड के छद्म धर्मनिरपेक्षियों ने। बड़े से बड़ा रचनाकार भी, जो शुद्ध हिंदी में कुछ भी लिखने में समर्थ था, इस चक्रव्यूह में फँसता गया और ख्याति तथा स्वीकार्यता के लोग में उर्दू के प्रयोग की ओर बढ़ता गया। स्थिति ऐसी हो गई कि शुद्ध हिंदी की बात करने वालों को वैसे ही अछूत समझा जाने लगा जैसे हिंदुत्व की बात करने वालों को। 

सोशल मीडिया के आगमन के साथ ही नवोदित रचनाकारों और कवियों को अपने आप को व्यक्त करने के लिए एक ऐसा मंच मिला जहां उन्हें पाठक सहज ही सुलभ थे और किसी मंचीय कवि की चाटुकारिता की आवश्यकता नहीं थी। जो लोग साहित्य के क्षेत्र से नहीं जुड़े थे, किंतु हिंदी और साहित्य में जिनकी रुचि थी, ऐसे अनेकानेक रचनाकारों का प्रादुर्भाव हुआ और उनमें से कई तो इतने उत्कृष्ट हुए कि नामधारी मंचीय रचनाकार भी उनके समक्ष पानी भरते दृष्टिगत होने लगे। धीरे-धीरे हिंदी की शुद्धता पर भी चर्चा प्रारंभ हुई और संस्कृत के पुनरुत्थान के प्रयासों तथा हिंदू पुनर्जागरण के साथ-साथ यह बहस आगे बढ़ती गई। आज सोशल मीडिया पर अनेकानेक ऐसे रचनाकार हैं जिनकी भाषा की शुद्धता और विषय वस्तु के अपनी परंपराओं और संस्कृति से जुड़ाव को देखकर मन गद्गद् हो जाता है। 

किंतु अभी भी दिल्ली बहुत दूर है और इस दिशा में सफलता हेतु अभी एक लंबी यात्रा तय करनी पड़ेगी। हिंदी के बारे में और हिंदी की शुद्धता के बारे में हमें और अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है तथा लोगों को भी इसके प्रति तथा इसके परिणामों के प्रति सचेत करने की आवश्यकता है। गुलामी की मानसिकता से अपने आप को मुक्त करने के लिए तथा आने वाली पीढ़ियों की सोच को सही दिशा देने के लिए भी यह अत्यंत आवश्यक है। आइए हम सब मिलकर इस दिशा में आगे बढ़ें और जहाँ तक हो सके हिंदी की शुद्धता को बनाए रखने के लिए अपना योगदान दें।

- राजेश मिश्र

बुधवार, 8 जनवरी 2025

मनमोहन ने झलक दिखाई

मनमोहन ने झलक दिखाई।
तन-कम्पन मन-नंद न जाई।।

माथे मोर-मुकुट मनभावन,
तन पट-पीत तड़ित सकुचावन,
उर वैजन्ती माल सुहाई।
मनमोहन ने झलक दिखाई।।१।।

झर-झर प्रेम नयन-निर्झर से,
भक्तन-जन-मन-मधुवन सरसे,
अधर मधुर मुरली मुसकाई।
मनमोहन ने झलक दिखाई।।२।।

अतुलित छवि लखि लज्जित रति-पति,
जन निरखत पावत यदुपति-गति,
पाप-ताप-परिताप नसाई।
मनमोहन ने झलक दिखाई।।३।।

- राजेश मिश्र 

रविवार, 5 जनवरी 2025

बम्-बम् बोल जगाना है

गोली नहीं चलानी तुमको,
नहीं कृपाण उठाना है।
शून्य, सुषुप्त, अचेतन जन को
बम्-बम् बोल जगाना है।।

कुछ अनभिज्ञ और अवगत कुछ,
कुछ हैं आँखें मूँदे।
कुछ अपनों के ही विरोध में,
निशि-दिन नाचें-कूदें।

सरल नहीं है, पर सम्भव है,
संग सभी को लाना है।
बम्-बम् बोल जगाना है।।१।।

कुछ समझेंगे समझाने से,
कुछ भय से जागेंगे।
कुछ निर्बल, सहयोग अपेक्षित,
स्वयं नहीं माँगेंगे।

साम-दान से, दण्ड-भेद से,
अपने साथ मिलाना है।
बम्-बम् बोल जगाना है।।२।।

मिल-जुलकर सब संग चलेंगे,
संस्कृति बच जाएगी।
धर्म-ध्वजा चहुँ-दिशि फहरेगी,
सन्तति सुख पाएगी।

"हेयं दुःखम् अनागतम्" का
सबको पाठ पढ़ाना है।
बम्-बम् बोल जगाना है।।३।।

**हेयं दुःखमनागतम्।।
(पातंजलि योगसूत्र, साधनपाद, सूत्र १६)

हेयम् - नष्ट करने योग्य 
दु:खम् - दुख
अनागतम् - जो आया न हो, आने वाला हो 

अर्थात् आने वाले दुख नष्ट करने योग्य होते हैं।

- राजेश मिश्र 

गुरुवार, 2 जनवरी 2025

प्रिय! तेरा संदेश मिला है

रीते नैना झर-झर झरते,
झम-झम बरसे सावन।
प्रिय! तेरा संदेश मिला है, 
झूम रहा है तन-मन।।

कितने सावन बीते, सूखे रीते-रीते।
प्रेम-लता को हमने दृग-निर्झर से सींचे।

प्रेम-पुष्प पुनि आज खिला है,
महका है फिर उपवन।
झूम रहा है तन-मन।।१।।

उर ऊसर था मेरा, संग मिला जब तेरा।
उर्वरता भर आयी, आया नया सवेरा।

हरियाली बंजर में छाई,
उदित हुआ मन मधुवन।
झूम रहा है तन-मन।।२।।

विधि को मिलन हमारा, लेकिन रास न आया।
टूटा प्रेम-घरौंदा, हमने साथ बनाया।

चकनाचूर हुए सब सपने,
बिखर गया था जीवन।
झूम रहा है तन-मन।।३।।

- राजेश मिश्र

जीवन चौथेपन में दुष्कर

जीवन चौथेपन में दुष्कर, धीरज धरना पड़ता है। मरने से पहले वर्षों तक घुट-घुट मरना पड़ता है।। दुखित व्यक्ति का साथ जगत् में किसको ईप्सित होता ह...