रविवार, 9 फ़रवरी 2020

यादों के झरोखों से

कर्मरत इस थकित मन ने ज्यों तनिक विश्राम पाया।
मौन ज्यों मुखरित हुआ अरु सलिल सुरभित कुनमुनाया।
ज्यों झुकीं पलकें दृगों पर, तिमिर आँखों में समाया।
खोल खिड़की स्मृति-पटल की बिम्ब तेरा झिलमिलाया।।

याद फिर आने लगे वे प्यार के मौसम सुहाने।
झूमती गाती हवाएँ, वे मधुर मीठे तराने।
खिलखिलाती-सी चहकती चन्द्रिमा के वे फसाने।
मिलन के मासूम-से वे स्नेह में लिपटे बहाने।।

देखना, पलकें झुकाना, पर नहीं कुछ बोल पाना।
साथ रहना, कुछ न कहना, किन्तु कब प्रिय दूर जाना?
हो अहन या यामिनी, कब कौन किंचित चैन पाया?
खोल खिड़की स्मृति-पटल की.................... ।।१।।

जब कभी भी तुम गुजरती कृष्ण केशों को उड़ाती।
श्वास से अपनी गमकती साँस मेरी महमहाती।
मदन के तूणीर से ले स्नेह-शर दृग पर नचाती।
भेदती मेरे हृदय को विजय-दर्पित मुस्कुराती।।

यूँ लगे तपती धरा पर वारि-बूँदें गिर रही हों।
मृत्तिका सोंधी सुरभि से श्वास सुरभित कर रही हो।
प्रिय धरित्री को जलद ने प्रेम-वर्षा से भिगाया।
खोल खिड़की स्मृति-पटल की.................... ।।२।।

मधुर दिन वे मधुर रातें, मधुर बातें प्यार की वे।
गीत मीठे मिलन के वे लहरियाँ शृंगार की वे।
केलियाँ, अठखेलियाँ मृदु प्रेममय अभिसार की वे।
तुनकने की, रूठने की, फिर मधुर मनुहार की वे।

क्या तुम्हें भी याद हैं वे पल सुनहरे, दिन सुहाने?
महकती मदमस्त रातें, मिलन के अपने ठिकाने?
मन ये पूछे, मन ये सोचे, मैं कभी कुछ कह न पाया।
खोल खिड़की स्मृति-पटल की....................।।३।।

अहन् = दिन
यामिनी = रात

- राजेश मिश्र

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