मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

हे जननि! तव चरण-वंदन

हे जननि! तव चरण-वंदन

वार दूँ तुझ पर ये तन-मन
हे जननि! तव चरण वंदन

दिव्य है तू इस धरा पर
स्वर्ग है चरणों में तेरे
तू ही बहती है लहू बन
माँ मेरी रग-रग में मेरे

धूप जो भव-दु:ख ये सारा
तू है छाया, तू ही उपवन
हे जननि!...

तेरे अमृत-रस-धार से ही
नवल जीवन हो सुसिंचित
दृष्टि तेरी है कृपामयि
वचन प्रति पल प्रेम पूरित

तू प्रकृति की सृजन-शक्ति
तू प्रकृति का प्रथम चिन्तन
हे जननि!...

तू ही शक्ति, तू ही दुर्गा
तू ही लक्ष्मी, तू ही काली
ये सभी हैं रूप तेरे
तू ही प्रति कण बसने वाली

तेरी महिमा सबसे न्यारी
गायें प्रतिपल सुर-नर-मुनि जन
हे जननि!...

है अभागा पुरुष वह
जो प्रेम से सिंचित न तेरे
धैर्य धारे धरा-सी तू
चाहे कितने दु:ख घनेरे

सोख लेती कष्ट दारुण
विष की गर्मी जैसे चंदन
हे जननि!...

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

हरि दर्शन

हरि दर्शन
तड़पत है मन
तकें नयन

मृदु वचन
पवित्र आचरण
सत्य कथन

सेवा मगन
सहायक निर्धन
प्रभु चिन्तन

मन दर्पण
सब प्रभु अर्पण
कृपा अयन

प्रभु मिलन
हर्षित तन-मन
धन्य जीवन

गोरी चली है

गोरी चली है
सज-के, सँवर-के
ललचें लाल

कोमल पाँव
महावर दमके
करे निहाल

मादक ध्वनि
छम-छम पायल
हिरनी-चाल

चूड़ी छनके
कँगना खन-खन
लोग बेहाल

कानों झुमके
कमर करधनी
बिंदिया भाल

लाल अधर
कपोल दमकते
ज्यों उषाकाल

माँग में टीका
द्युति दामिनि की है
नागिन बाल

रसिया सारे
मर-मिट जाये हैं
नेत्र विशाल

ज्यों कामायिनी
जगत धन्य हुआ
रूप कमाल

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

साया

नज़रें उठाकर देख मैं तेरा साया हूँ
छुप के छुपाकर देख मैं तेरा साया हूँ
दिल से लगाकर देख मैं तेरा साया हूँ
पास में आकर देख मैं तेरा साया हूँ

दु:ख की धूप में तुझे नज़र मैं आती हूँ
सुख की छाँव में मैं ओझल हो जाती हूँ
पग-पग तेरे साथ मैं तेरा साया हूँ
दिन हो या हो रात मैं तेरा साया हूँ

चाह हमेशा यही खुशी के रंग बिखेरूँ
जब-जब हो तुम थकित अंक में अपने ले लूँ
चाँद मेरे हमराह मैं तेरा साया हूँ
तेरी ही मुझे चाह मैं तेरा साया हूँ

विधि का है यह मेल मैं तेरे साथ में हूँ
जीवन का यह खेल मैं तेरे साथ में हूँ
थक ना, ना कर आह मैं तेरा साया हूँ
भर ले मन में उछाह मैं तेरा साया हूँ

हार नहीं मानूँगी मैं अंतिम साँसों तक
वचन निबाहूँगी पिया आखिरी रातों तक
मुझमें समाकर देख मैं तेरा साया हूँ
हर जनम बुलाकर देख मैं तेरा साया हूँ

जीवन चौथेपन में दुष्कर

जीवन चौथेपन में दुष्कर, धीरज धरना पड़ता है। मरने से पहले वर्षों तक घुट-घुट मरना पड़ता है।। दुखित व्यक्ति का साथ जगत् में किसको ईप्सित होता ह...