गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

गोरी चली है

गोरी चली है
सज-के, सँवर-के
ललचें लाल

कोमल पाँव
महावर दमके
करे निहाल

मादक ध्वनि
छम-छम पायल
हिरनी-चाल

चूड़ी छनके
कँगना खन-खन
लोग बेहाल

कानों झुमके
कमर करधनी
बिंदिया भाल

लाल अधर
कपोल दमकते
ज्यों उषाकाल

माँग में टीका
द्युति दामिनि की है
नागिन बाल

रसिया सारे
मर-मिट जाये हैं
नेत्र विशाल

ज्यों कामायिनी
जगत धन्य हुआ
रूप कमाल

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राम

इन्द्रियों की पहुँच से परे राम हैं, किंतु कण-कण जगत के भरे राम हैं। पातकी घोरतम नाम ही ले तरें, कर-कमल नित्य शर-धनु धरे राम हैं।।