नवजीवन संचार हुआ है,
भूमि सतत सींचे जाने से।
आखिर अंकुर फूट पड़ा है,
धरती में सोये दाने से।।
निष्फल वृक्ष रहे या जाये,
बीज सुरक्षित रखना होगा।
श्रुति-संस्कृति-अस्तित्व हेतु नित,
हिम-आतप सब सहना होगा।
विटप विशाल उखड़ जाते हैं,
झंझावातों के आने से।
आखिर अंकुर फूट पड़ा है,
धरती में सोये दाने से ।।१।।
एक-एक कर टूट न जायें,
मुट्ठी बनकर रहना होगा।
प्रबल-प्रवाह न निर्बल होवे,
एक दिशा में बहना होगा।
विद्युत-शक्ति न शेष बचेगी,
धाराओं में बँट जाने से ।
आखिर अंकुर फूट पड़ा है,
धरती में सोये दाने से ।।२।।
ग्रहपति का परिचय आतप से,
शशधर का शीतलता से है।
भारत का परिचय संसृति में,
सत्य सनातन सत्ता से है।
वंश हमारा मिट जाएगा,
धर्म सनातन मिट जाने से।
आखिर अंकुर फूट पड़ा है,
धरती में सोये दाने से ।।३।।
- राजेश मिश्र
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