शुक्रवार, 6 सितंबर 2024

कहो कान्हा? करोगे कैसे तुम उद्धार?

कहो कान्हा! करोगे कैसे तुम उद्धार?

तुमको तो दधि-माखन प्यारा, 
ढूँढो हर घर-द्वार।
मेरे घर नहिं गाय न बछिया, 
नहिं कुछ अन्य अधार।

कहो कान्हा! करूँ कैसे स्वागत-सत्कार?
कहो कान्हा! करोगे कैसे तुम उद्धार?

तुम तो भक्ति-भाव के भूखे, 
पियो भक्ति-रस-धार।
ज्यों ही भक्त पुकारे तुमको, 
पहुँचत लगे न बार।

सुनो कान्हा! नहीं मुझमें वह अमृत धार।
कहो कान्हा! करोगे कैसे तुम उद्धार?

कलि कलुषित कुत्सित कपटी मन, 
किये हैं पाप अपार।
काम-क्रोध-मद-मोह-लोभ सब, 
भरे पड़े हैं विकार।

कहो कान्हा! तुमसे सँभलेगा यह भार?
कहो कान्हा! करोगे कैसे तुम उद्धार?

- राजेश मिश्र

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