रविवार, 24 अगस्त 2025

देश में ही हम विदेशी हो गए हैं

वे घृणा के बीज ऐसे बो गए हैं,
देश में ही हम विदेशी हो गए हैं।

मनुज हो या श्वान या पशु और कोई,
आप घर बेघर स्वदेशी हो गए हैं।

मान लो! सम्भव नहीं उनको जगाना,
जागते हैं, और मुँह ढँक सो गए हैं।

सेज कुक्कुर, सड़क पर माता-पिता हैं,
पतित होकर आज क्या हम हो गए हैं।

मरे कोई, जिए कोई, फर्क क्या है,
आँख के आँसू कहीं पर खो गए हैं।

अज्ञ हैं घर में हमारे कौन, कैसा
दूसरों में व्यस्त इतने हो गए हैं।

रो रहे होंगे कहीं पर बैठकर वे,
धर्म पर, इस राष्ट्र पर मिट जो गए हैं।

- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

आज कुछ ऐसा सुनाओ, चित्त को आराम दे जो

आज कुछ ऐसा सुनाओ, चित्त को आराम दे जो।
विकल हिय को शान्त कर दे, धड़कनों को थाम ले जो।।

हाँ, सुनाओ गीत कोई
प्रेम हो, अनुराग भी हो।
हो सरस सङ्गीत सज्जित
ताल स्वर लय राग भी हो।

मनस् मीठे भाव भर दे, प्रीति का पैगाम दे जो।
विकल हिय को शान्त कर दे, धड़कनों को थाम ले जो।।१।।

या सुनाओ परम पावन 
कथा दमयंती की नल की।
अमित साहस शौर्य निष्ठा
त्याग तप धीरज अचल की।

आत्मगौरव आत्मचिन्तन ज्ञान दे सम्मान दे जो।
विकल हिय को शान्त कर दे, धड़कनों को थाम ले जो।।२।।

या सुनाओ तान मीठी
कृष्ण की प्रिय बाँसुरी की।
राधिका के समर्पण की 
गोपिका मन माधुरी की।

तृषित तन-मन तृप्त कर दे, भक्ति का वरदान दे जो।
विकल हिय को शान्त कर दे, धड़कनों को थाम ले जो।।१।।

- राजेश मिश्र

बुधवार, 20 अगस्त 2025

अश्रु

हर दशा में साथ रहते
अश्रु अपने सुख के साथी, दुख के साथी।
मौन रह हर बात कहते
अश्रु अपने सुख के साथी, दुख के साथी।।

चिर प्रतीक्षित कामना जब
पूर्ण हो जाती कभी 
हर्ष का संदेश लेकर 
ढुलक पड़ते हैं तभी 
टीस को ले साथ बहते
अश्रु अपने सुख के साथी, दुख के साथी।…(१)

प्रिय हमें बिछड़ा हुआ जब 
कोई सहसा आ मिले
भावना उर की उफनती
साथ अपने ले चलें
मगन मन का हाल कहते
अश्रु अपने सुख के साथी, दुख के साथी।…(२)

दाहता दुख जब अपरिमित 
हो व्यथा सहना कठिन
घुट रहे हों हम अकेले
तड़पते हों रात-दिन
दग्ध दिल का दाह सहते 
अश्रु अपने सुख के साथी, दुख के साथी।…(३)

- राजेश मिश्र

मुक्तक

(१)
मेरे भावों की समिधा पर,
तुम चाहे जितना जल डालो।
उसे हविस् कर, राष्ट्र-यज्ञ में,
मैं आहुति देता जाऊँगा।।

हविस् = घृत

(२)

पता है तुमने देखा दरवाजे से जाते मुझको,
हिला था खिड़की का परदा तुम्हारे ओट लेने पर।

(३)

कविगण दया करिए।
कुछ तो नया करिए।।

निशि-दिन इश्क के चर्चे,
और कुछ बयाँ करिए।।

(४)

उसे अति अभिमान था अपने होने का,
वह नहीं है, फिर भी दुनिया चल रही है।

(५)

मेरे पथ पर बीज बोये तुमने कीकर समझकर,
पर मैंने पाया पारिजात के पौथे खिले हुए।

कीकर = बबूल

(६)

ऐसा उलझा हूँ तेरे मधुर मन्दहास के इन्द्रजाल में,
छटपटा रहा हूँ निकलने को, किन्तु गाँठ नहीं मिलती।

७)

लीन थे हम अपनी साधना में,
जगत के प्रपंच से मुँह मोड़कर।
री मेनके! क्यों आई पल भर को
फिर चली गई तड़पता छोड़कर

८)

सुर्ख़ लबों पर तेरे मेरा नाम क्या आया,
हंगामा बरप रहा है महफ़िल में मुसलसल।।

(९)

देखो, बस मुझको मत देखो, 
खुद को भी देखो मुझमें ही। 
इसी देह में मैं भी रहता,
इसी देह में रहती तुम भी।।

(10)

वर्षों बाद छँटे थे बादल चाँद नजर आया था।
अमृतपान कर शुष्क हृदय यह अतिशय हर्षाया था।
किंतु क्षणिक था वह उजियारा घने घनों में खोया,
मैं हतभाग्य, भाग्य में मैंने अँधियारा पाया था।।

(11)

मंगलवार, 19 अगस्त 2025

क्यों आती सपनों में मेरे?

जब दिल मेरा तोड़ दिया है

मुझे तड़पता छोड़ दिया है 

शपथ-वचन तुम सभी भुलाकर 

चली गई जब मुझे रुलाकर

क्यों आती सपनों में मेरे?


पल भर को भी सोचा होता 

मन को अपने टोका होता 

पग जब उठे दूर जाने को 

कोई और अंक पाने को 

ठिठकी होती, सँभली होती

दुनिया अपनी बदली होती 

पर तुमने तो दृष्टि घुमा ली 

तब, जब मुझसे आँख चुरा ली 

क्यों आती सपनों में मेरे?……(१)


मैं तो मगन-मगन रहता था 

ताप-शीत हँस-हंँस सहता था 

तुमसे ही सारी दुनिया थी 

तुम मेरी प्यारी दुनिया थी 

भोर तुम्हारी उठती पलकें

हंसीं शाम थीं झुकती पलकें

रात रँगीली, दिवस निराला 

तुमने तहस-नहस कर डाला 

क्यों आती सपनों में मेरे?……(२)


चलो मान लें अगर विवश थी

स्ववश नहीं थी, तुम परवश थी

एक नजर तो डाली होती

पलकें जरा उठा ली होती

हाँ, वाणी चुप रह सकती थी

आँखें तो सब कह सकती थीं 

लेकिन मुझसे नजर बचाकर

चली गई मुख अगर फिराकर 

क्यों आती सपनों में मेरे?……(३)


- राजेश मिश्र

शनिवार, 16 अगस्त 2025

लम्पट भँवरा

माली! तेरे सुघड़ बाग में

नवयौवनयुत हरित लता पर

जबसे प्यारी कली खिली है 

लम्पट मधुकर दृष्टि गड़ाए

उसको प्रतिदिन निरख रहा है

मन में अपने मचल रहा है

जिस दिन भी यह फूल बनेगी

मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…


कली, छली का भाव न जाने

वह अबोध, पशु क्या पहचाने 

उसको सब सच्चे लगते हैं 

अच्छी है, अच्छे लगते हैं 

कोई नहीं पराया उसको

अपना लेती मिलती जिसको

सोच रहा वह कुटिल मधुप पर 

मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…


गुनगुन गुनगुन गुनगुन करता

बगिया में निशि-वासर फिरता

लता-लता, हर विटप निहारे 

भँवरा भटके मारे-मारे 

कहाँ, कौन, कब कली खिल रही

किस ममता के अङ्क पल रही 

पता लगाता, मन मुसुकाता

मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…


चञ्चरीक जब तान सुनाए 

भोले माली! तू हरषाए

नहीं जानता, वह लम्पट है

उसकी मीठी तान कपट है

बगिया की गलियों में घूमे

चूसे कुसुम, कली को चूमे 

कली-कली को चूम बोलता 

मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…


- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

तेरी लीला वह ही जाने, तू जतलाए जिसको

जन्म लिया है कोख से किसकी, 
मिले बधाई किसको 
तेरी लीला वह ही जाने, 
तू जतलाए जिसको
कान्हा! तू जतलाए जिसको…

कौन जानता कारागृह में 
क्या लीला दिखलाई।
हर्षित हैं वसुदेव-देवकी 
झूमे जसुदा माई।
बाबा नंद मगन-मन नाचें 
सुध-बुध किसकी किसको
तेरी लीला वह ही जाने, 
तू जतलाए जिसको
कान्हा! तू जतलाए जिसको…(1)

गगनगिरा सुन कैद में डाला 
बहन प्राण से प्यारी।
बालक मारे, नहीं विचारे 
खल पापी कुविचारी।
कंस अभागा कभी न जागा 
मारा चाहे किसको 
तेरी लीला वह ही जाने, 
तू जतलाए जिसको
कान्हा! तू जतलाए जिसको…(2)

घर-घर मंगलगान बज रहा 
मुदित नगर नर-नारी।
बाल-वृद्ध वय भूल कूदते 
चहुँदिसि उत्सव भारी।
हे जगवंदन! दारुण बन्धन 
भव का, काटो इसको 
तेरी लीला वह ही जाने, 
तू जतलाए जिसको
कान्हा! तू जतलाए जिसको…(3)

- राजेश मिश्र

स्वतंत्रता दिवस

वीरों ने निज रक्तधार से 

धरती को नहलाया।

सात समुन्दर पार पहुँचकर 

ऊधम खूब मचाया।।

खोकर पुत्र-कन्त माँ-बहनों 

ने आँसू  न बहाया‌।

छाती ताने खड़ा तिरंगा 

तब जाकर लहराया।।


- राजेश मिश्र 

गुरुवार, 14 अगस्त 2025

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस

"विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस" पर व्यथित हृदय की अभिव्यक्ति…

आओ, फिर से याद करें हम 
भरकर आँख में पानी।
बँटवारे की बर्बरता की 
वह कारुणिक कहानी।।

पुश्तों से जाने-पहचाने
गाँव, गली, चौबारे।
चूल्हा, चाकी, चौकी, चौखट 
घर, बगिया ये सारे।
इक रेखा से हुए पराये
किसकी कारस्तानी?
बँटवारे की बर्बरता की 
वह कारुणिक कहानी।।१।।

धन-दौलत, पुरखों की थाती
लूट लिए आराती।
बेटे कटे, बेटियाँ लुट गईं
फटती है सुन छाती।
लाशों को भर-भर ट्रेनों में
भेजी गई निशानी।
बँटवारे की बर्बरता की 
वह कारुणिक कहानी।।२।।

बचते, छुपते, गिरते-पड़ते
जीवन ले जो आए।
अपनापन ले, आस लगाए
आकर हुए पराए।
रोटी, कपड़ा, घर न दे सके 
दुश्चरित्र, अभिमानी।
बँटवारे की बर्बरता की 
वह कारुणिक कहानी।।३।।

- राजेश मिश्र

चित्तभूमियाँ

क्षिप्तं, मूढं, विक्षिप्तमेकाग्रं, निरुद्धमिति चित्तभूमय:।


क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र और निररुद्ध -  चित्त की ये पाँच भूमियाँ होती हैं।


सारी सृष्टि सत्त्व, राजस् और तमस् - इन तीन गुणों का ही परिणाम है। एक धर्म, आकार अथवा रूप को छोड़कर दूसरे धर्म, आकार अथवा रूप के धारण करने को परिणाम कहते हैं। चित्त इन गुणों का सर्वप्रथम सत्त्वप्रधान परिणाम है। इसीलिए इसको चित्तसत्त्व भी कहते हैं। 


यह सारा स्थूल जगत जिसमें हमारा व्यवहार चल रहा है, रज तथा तमप्रधान गुणो का परिणाम है। इसके बाह्य तथा अभ्यंतर संसर्ग से जो चित्तसत्त्व में क्षण-क्षण गुणों का परिणाम हो रहा है, उसकी चित्तवृत्ति कहते हैं। 


चित्तसत्त्व ज्ञान स्वभाव वाला है। जब उसमें रजोगुण और तमोगुण का मेल होता है तब ऐश्वर्य, विषय प्रिय होते हैं। जब यह तमोगुण से युक्त होता है, तब अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्य को प्राप्त होता है। यही चित्त जब तमोगुण के नष्ट होने पर रजोगुण के अंश से युक्त होता है, तब धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्या को प्राप्त होता है। घोड़े की साम्यता ही चित्त की भूमियों या अवस्थाओं का आधार है।


१. क्षिप्त

इसमें रजोगुण की प्रधानता होती है। तम और सत्त्व दबे हुए गौण रूप से रहते हैं। यह राग-द्वेषादि के कारण होती है। इस अवस्था में धर्म-अधर्म, राग-विराग, ज्ञान-अज्ञान, ऐश्वर्य तथा अनैश्वर्य में प्रवृत्ति होती है। जब तमोगुण सत्त्वगुण को दबा लेता है तब अधर्म अज्ञानादि और जब सत्त्व तम को दबा लेता है, तब धर्म, ज्ञानादि में प्रवृत्ति होती है। साधारण सांसारिक मनुष्य इसी अवस्था में रहते हैं।


२. मूढ

इस अवस्था में तम प्रधान होता है। रज तथा सत्त्व दबे हुए गौण रूप से रहते हैं। यह काम, क्रोध, लोभ और मोह के कारण होती है। चित्र की ऐसी अवस्था में मनुष्य की प्रवृत्ति अज्ञान, अधर्म, राग और अनैश्वर्य में होती है। यह अवस्था नीच मनुष्यों की है।


३. विक्षिप्त 

इस अवस्था में सत्त्वगुण प्रधान रहता है तथा रज और तम दबे हुए गौण रूप से रहते हैं। यह निष्काम कर्म करने तथा राग-द्वेष, काम-क्रोध, लोभ और मोह के छोड़ने से उत्पन्न होती है। इस अवस्था में मनुष्य की प्रवृत्ति धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य में होती है। किंतु रजोगुण बीच-बीच में विक्षेप उत्पन्न करता रहता है। यह अवस्था ऊँचे मनुष्यों तथा जिज्ञासुओं की है।


४. एकाग्र 

चित्त में एक ही विषय में सदृश वृत्तियों का प्रवाह निरंतर बने रहने को एकाग्रता कहते हैं। यह चित्त की स्वाभाविक अवस्था है। इस अवस्था में रजोगुण और तमोगुण पूरी तरह से दबे हुए रहते हैं। इसे सम्प्रज्ञात समाधि भी कहते हैं। इसकी अंतिम स्थिति विवेकख्याति है।


५. निरुद्ध

विवेकख्याति द्वारा जब चित्र और पुरुष के भेद का साक्षात्कार हो जाता है, तब उस विवेकख्याति से भी वैराग्य हो जाता है। यह पर वैराग्य है। इससे उस अंतिम वृत्ति का भी निरोध हो जाता है, केवल पर वैराग्य के संस्कार मंत्र शेष होते हैं। सर्व वृत्तियों के निरोध की इस अंतिम निरुद्धाभावस्था को असम्प्रज्ञात या निर्बीज समाधि भी कहते हैं।


**वह सर्वोच्च, निर्मल ज्ञान जिससे चित्त और पुरुष के भेद का पता चलता है, विवेकख्याति कहलाता है।

मंगलवार, 12 अगस्त 2025

छोड़कर मुझको न जाओ, प्राण मेरे!

वचन पावन मत भुलाओ, प्राण मेरे!
छोड़कर मुझको न जाओ, प्राण मेरे!

बस तुम्हारे सँग रहूँगी,
तपन-शीतलता सहूँगी।
सुख सभी तुमको समर्पित,
दुख तुम्हारा बाँट लूँगी।।

विकल तन-मन तरस खाओ, प्राण मेरे!
छोड़कर मुझको न जाओ, प्राण मेरे!……(१)

भूख को व्रत जान लूँगी,
तरु तले घर मान लूँगी।
कामनाएँ त्याग सारी
इक तुम्हारा नाम लूँगी।।

साथ ले लो, मान जाओ, प्राण मेरे!
छोड़कर मुझको न जाओ, प्राण मेरे!……(२)

ये महल के भोग सारे,
वसन-भूषन बिन तुम्हारे।
दाहते तन, ले चलो बस
वपुस् वल्कल वस्त्र धारे।।

विरह-दुख में मत जलाओ, प्राण मेरे!
छोड़कर मुझको न जाओ, प्राण मेरे!……(३)

- राजेश मिश्र

योग करें, नीरोग रहें

शरीर और मन का अन्योन्याश्रित संबंध है। सभी शारीरिक क्रियाओं और कार्यों का मन पर तथा मानसिक संकल्प-विकल्प व भावनाओं का शरीर पर प्रभाव पड़ता ही है। उसमें मन का शरीर के ऊपर अधिक प्रभाव पड़ता है। मनुष्य अपनी मनमानी और आचार-विचार के कारण पग-पग पर समस्याओं को आमंत्रित करता रहता है और दुःखी होता है। मन पर नियंत्रण उसे इन दुःखों से बचा सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए हमारे ऋषि-मुनियों ने विविध योग-प्रक्रियाओं की रचना की, जिन्हें अपनाकर शरीर और मन में संतुलन स्थापित किया जा सकता है और मन को नियंत्रित किया जा सकता है। आधुनिक विज्ञान भी व्यक्तित्व विकास में मन की भूमिका को पूरी तरह स्वीकार करता है। 

अतः योग करें, नीरोग रहें।

- राजेश मिश्र

शुक्रवार, 8 अगस्त 2025

पातंजल योगसूत्र

योगेन चित्तस्य पदेन वाचां
मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।
योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां
पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि।।

भोजराज जी द्वारा महर्षि पतंजलि की यह स्तुति योगाभ्यासियों में अत्यंत प्रचलित है।  योग, व्याकरण और आयुर्वेद के क्षेत्रों में उनकी देन अभूतपूर्व है और मानवजन की आने वाली पीढ़ियों को प्रलयान्त तक लाभान्वित करती रहेगी। चूंकि मैं भी कुछ अंशों तक योग से जुड़ा हुआ हूं, अतः यथासंभव और यथाशक्ति किंचित अध्ययन होता रहता है। इसी क्रम में थोड़ा-बहुत अध्ययन 'पातंजल योगसूत्र' का भी हुआ है।

भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक परंपरा में योग का विशेष स्थान है। इससे संबंधित अनेकानेक ग्रन्थों में 'पातंजल योगसूत्र' का स्थान सर्वोपरि है जो कि योग का सर्वाधिक प्रामाणिक और व्यवस्थित ग्रंथ है। चार पादों (अध्यायों) के केवल 195 सूत्रों में सारा जीवन-दर्शन समेट दिया है जिस पर कई भाष्य और टीकाएं लिखी गईं, लिखी जा रही हैं और लिखी जाएंगी। चाहे जितनी बार गोते लगाइए, इसकी गहराई का पार पाना आसान नहीं है। लेकिन यह सुनिश्चित है कि जितना डूबते जाएंगे, उतना ही आनंद के रस में सराबोर होते जाएंगे और फिर मन यही चाहेगा कि बस यहीं पड़े रहें। प्रत्येक पाद के नाम और सूत्रों की संख्या इस प्रकार है -

१. समाधिपाद - 51 सूत्र 
२. साधनपाद - 55 सूत्र 
३. विभूतिपाद - 55 सूत्र 
४. कैवल्यपाद - 34 सूत्र

प्रथम पाद में योग के स्वरूप समाधि, द्वितीय पाद में उसका साधन, तृतीय पाद में उससे होने वाली सिद्धियों तथा चतुर्थ पाद में कैवल्य का वर्णन किया है।

क्योंकि इस समय संस्कृत-सप्ताह चल रहा है, तो मन में आया कि कुछ और भले नहीं कर सकते, संस्कृत में कुछ पोस्ट तो किया ही जा सकता है। अब इतनी विद्वत्ता तो नहीं है कि संस्कृत में कुछ लेख या कविता इत्यादि लिख सकें, लेकिन कहीं से पढ़कर कुछ लाइनें तो पोस्ट की जा सकती हैं। सोचा कि कुछ अलग विषय लिया जाए तो 'पातंजल योगसूत्र' का विचार मन में आया कि क्यों न इसी का एक सूत्र शब्दार्थ और सूत्रार्थ के साथ प्रतिदिन पोस्ट किया जाए। साथ ही यदि संभव हुआ तो बीच-बीच में किन्ही विषयों पर अपनी बुद्धि के अनुसार कुछ प्रकाश डालने का भी प्राय एस किया जाए। उसी के प्रति लोगों के ध्यानाकर्षण हेतु यथामति अनधिकार चेष्टा करते हुए यहां इस ग्रंथ के विषय में उल्लेख करने का दुस्साहस किया है। आशा है कि विद्वज्जन मेरी इस धृष्टता के लिए क्षमा करेंगे। 

- राजेश मिश्र

गुरुवार, 7 अगस्त 2025

क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…

प्रेम की पूंजी तुम्हारी ले हृदय में घूमता हूं।

भीड़ में सबको भुलाकर बस तुम्हीं को ढूंढता हूं।

उम्र अब चढ़ने लगी है, 

थकन भी बढ़ने लगी है,

हर तरह के भार से अब मुक्त होना चाहता हूं,

भूल कर तुमको स्वयं से युक्त होना चाहता हूं,

क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…


हां हृदय फटता है मेरा, सोचकर तुमसे जुदाई।

इस जुदाई में छिपी है, किंतु दोनों की भलाई।

मोह बढ़ता जा रहा है,

धैर्य घटता जा रहा है,

डिग न जाएं कदम मेरे अडिग रहना चाहता हूं,

छोड़कर अनुकूल धारा उलट बहना चाहता हूं,

क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…


कठिन था मैंने मगर मन को प्रिये! समझ लिया है।

इस जगत में अभिलषित जो भी रहा वह पा लिया है।

मन को मेरे जानती हो,

तुम मुझे पहचानती हो,

बस तुम्हीं हिय में रही हो पुनः कहना चाहता हूं,

कर लिया संकल्प उस पर अटल रहना चाहता हूं,

क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…

क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…

क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…


- राजेश मिश्र 


जीवन चौथेपन में दुष्कर

जीवन चौथेपन में दुष्कर, धीरज धरना पड़ता है। मरने से पहले वर्षों तक घुट-घुट मरना पड़ता है।। दुखित व्यक्ति का साथ जगत् में किसको ईप्सित होता ह...