रविवार, 24 अगस्त 2025
देश में ही हम विदेशी हो गए हैं
शुक्रवार, 22 अगस्त 2025
आज कुछ ऐसा सुनाओ, चित्त को आराम दे जो
बुधवार, 20 अगस्त 2025
अश्रु
मुक्तक
मंगलवार, 19 अगस्त 2025
क्यों आती सपनों में मेरे?
जब दिल मेरा तोड़ दिया है
मुझे तड़पता छोड़ दिया है
शपथ-वचन तुम सभी भुलाकर
चली गई जब मुझे रुलाकर
क्यों आती सपनों में मेरे?
पल भर को भी सोचा होता
मन को अपने टोका होता
पग जब उठे दूर जाने को
कोई और अंक पाने को
ठिठकी होती, सँभली होती
दुनिया अपनी बदली होती
पर तुमने तो दृष्टि घुमा ली
तब, जब मुझसे आँख चुरा ली
क्यों आती सपनों में मेरे?……(१)
मैं तो मगन-मगन रहता था
ताप-शीत हँस-हंँस सहता था
तुमसे ही सारी दुनिया थी
तुम मेरी प्यारी दुनिया थी
भोर तुम्हारी उठती पलकें
हंसीं शाम थीं झुकती पलकें
रात रँगीली, दिवस निराला
तुमने तहस-नहस कर डाला
क्यों आती सपनों में मेरे?……(२)
चलो मान लें अगर विवश थी
स्ववश नहीं थी, तुम परवश थी
एक नजर तो डाली होती
पलकें जरा उठा ली होती
हाँ, वाणी चुप रह सकती थी
आँखें तो सब कह सकती थीं
लेकिन मुझसे नजर बचाकर
चली गई मुख अगर फिराकर
क्यों आती सपनों में मेरे?……(३)
- राजेश मिश्र
शनिवार, 16 अगस्त 2025
लम्पट भँवरा
माली! तेरे सुघड़ बाग में
नवयौवनयुत हरित लता पर
जबसे प्यारी कली खिली है
लम्पट मधुकर दृष्टि गड़ाए
उसको प्रतिदिन निरख रहा है
मन में अपने मचल रहा है
जिस दिन भी यह फूल बनेगी
मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…
कली, छली का भाव न जाने
वह अबोध, पशु क्या पहचाने
उसको सब सच्चे लगते हैं
अच्छी है, अच्छे लगते हैं
कोई नहीं पराया उसको
अपना लेती मिलती जिसको
सोच रहा वह कुटिल मधुप पर
मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…
गुनगुन गुनगुन गुनगुन करता
बगिया में निशि-वासर फिरता
लता-लता, हर विटप निहारे
भँवरा भटके मारे-मारे
कहाँ, कौन, कब कली खिल रही
किस ममता के अङ्क पल रही
पता लगाता, मन मुसुकाता
मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…
चञ्चरीक जब तान सुनाए
भोले माली! तू हरषाए
नहीं जानता, वह लम्पट है
उसकी मीठी तान कपट है
बगिया की गलियों में घूमे
चूसे कुसुम, कली को चूमे
कली-कली को चूम बोलता
मस्त मधुर रस चूसूँगा मैं…
- राजेश मिश्र
शुक्रवार, 15 अगस्त 2025
तेरी लीला वह ही जाने, तू जतलाए जिसको
स्वतंत्रता दिवस
वीरों ने निज रक्तधार से
धरती को नहलाया।
सात समुन्दर पार पहुँचकर
ऊधम खूब मचाया।।
खोकर पुत्र-कन्त माँ-बहनों
ने आँसू न बहाया।
छाती ताने खड़ा तिरंगा
तब जाकर लहराया।।
- राजेश मिश्र
गुरुवार, 14 अगस्त 2025
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस
चित्तभूमियाँ
क्षिप्तं, मूढं, विक्षिप्तमेकाग्रं, निरुद्धमिति चित्तभूमय:।
क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र और निररुद्ध - चित्त की ये पाँच भूमियाँ होती हैं।
सारी सृष्टि सत्त्व, राजस् और तमस् - इन तीन गुणों का ही परिणाम है। एक धर्म, आकार अथवा रूप को छोड़कर दूसरे धर्म, आकार अथवा रूप के धारण करने को परिणाम कहते हैं। चित्त इन गुणों का सर्वप्रथम सत्त्वप्रधान परिणाम है। इसीलिए इसको चित्तसत्त्व भी कहते हैं।
यह सारा स्थूल जगत जिसमें हमारा व्यवहार चल रहा है, रज तथा तमप्रधान गुणो का परिणाम है। इसके बाह्य तथा अभ्यंतर संसर्ग से जो चित्तसत्त्व में क्षण-क्षण गुणों का परिणाम हो रहा है, उसकी चित्तवृत्ति कहते हैं।
चित्तसत्त्व ज्ञान स्वभाव वाला है। जब उसमें रजोगुण और तमोगुण का मेल होता है तब ऐश्वर्य, विषय प्रिय होते हैं। जब यह तमोगुण से युक्त होता है, तब अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्य को प्राप्त होता है। यही चित्त जब तमोगुण के नष्ट होने पर रजोगुण के अंश से युक्त होता है, तब धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्या को प्राप्त होता है। घोड़े की साम्यता ही चित्त की भूमियों या अवस्थाओं का आधार है।
१. क्षिप्त
इसमें रजोगुण की प्रधानता होती है। तम और सत्त्व दबे हुए गौण रूप से रहते हैं। यह राग-द्वेषादि के कारण होती है। इस अवस्था में धर्म-अधर्म, राग-विराग, ज्ञान-अज्ञान, ऐश्वर्य तथा अनैश्वर्य में प्रवृत्ति होती है। जब तमोगुण सत्त्वगुण को दबा लेता है तब अधर्म अज्ञानादि और जब सत्त्व तम को दबा लेता है, तब धर्म, ज्ञानादि में प्रवृत्ति होती है। साधारण सांसारिक मनुष्य इसी अवस्था में रहते हैं।
२. मूढ
इस अवस्था में तम प्रधान होता है। रज तथा सत्त्व दबे हुए गौण रूप से रहते हैं। यह काम, क्रोध, लोभ और मोह के कारण होती है। चित्र की ऐसी अवस्था में मनुष्य की प्रवृत्ति अज्ञान, अधर्म, राग और अनैश्वर्य में होती है। यह अवस्था नीच मनुष्यों की है।
३. विक्षिप्त
इस अवस्था में सत्त्वगुण प्रधान रहता है तथा रज और तम दबे हुए गौण रूप से रहते हैं। यह निष्काम कर्म करने तथा राग-द्वेष, काम-क्रोध, लोभ और मोह के छोड़ने से उत्पन्न होती है। इस अवस्था में मनुष्य की प्रवृत्ति धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य में होती है। किंतु रजोगुण बीच-बीच में विक्षेप उत्पन्न करता रहता है। यह अवस्था ऊँचे मनुष्यों तथा जिज्ञासुओं की है।
४. एकाग्र
चित्त में एक ही विषय में सदृश वृत्तियों का प्रवाह निरंतर बने रहने को एकाग्रता कहते हैं। यह चित्त की स्वाभाविक अवस्था है। इस अवस्था में रजोगुण और तमोगुण पूरी तरह से दबे हुए रहते हैं। इसे सम्प्रज्ञात समाधि भी कहते हैं। इसकी अंतिम स्थिति विवेकख्याति है।
५. निरुद्ध
विवेकख्याति द्वारा जब चित्र और पुरुष के भेद का साक्षात्कार हो जाता है, तब उस विवेकख्याति से भी वैराग्य हो जाता है। यह पर वैराग्य है। इससे उस अंतिम वृत्ति का भी निरोध हो जाता है, केवल पर वैराग्य के संस्कार मंत्र शेष होते हैं। सर्व वृत्तियों के निरोध की इस अंतिम निरुद्धाभावस्था को असम्प्रज्ञात या निर्बीज समाधि भी कहते हैं।
**वह सर्वोच्च, निर्मल ज्ञान जिससे चित्त और पुरुष के भेद का पता चलता है, विवेकख्याति कहलाता है।
मंगलवार, 12 अगस्त 2025
छोड़कर मुझको न जाओ, प्राण मेरे!
योग करें, नीरोग रहें
शुक्रवार, 8 अगस्त 2025
पातंजल योगसूत्र
गुरुवार, 7 अगस्त 2025
क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…
प्रेम की पूंजी तुम्हारी ले हृदय में घूमता हूं।
भीड़ में सबको भुलाकर बस तुम्हीं को ढूंढता हूं।
उम्र अब चढ़ने लगी है,
थकन भी बढ़ने लगी है,
हर तरह के भार से अब मुक्त होना चाहता हूं,
भूल कर तुमको स्वयं से युक्त होना चाहता हूं,
क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…
हां हृदय फटता है मेरा, सोचकर तुमसे जुदाई।
इस जुदाई में छिपी है, किंतु दोनों की भलाई।
मोह बढ़ता जा रहा है,
धैर्य घटता जा रहा है,
डिग न जाएं कदम मेरे अडिग रहना चाहता हूं,
छोड़कर अनुकूल धारा उलट बहना चाहता हूं,
क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…
कठिन था मैंने मगर मन को प्रिये! समझ लिया है।
इस जगत में अभिलषित जो भी रहा वह पा लिया है।
मन को मेरे जानती हो,
तुम मुझे पहचानती हो,
बस तुम्हीं हिय में रही हो पुनः कहना चाहता हूं,
कर लिया संकल्प उस पर अटल रहना चाहता हूं,
क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…
क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…
क्षमा करना प्रिय! मुझे तुम…
- राजेश मिश्र
जीवन चौथेपन में दुष्कर
जीवन चौथेपन में दुष्कर, धीरज धरना पड़ता है। मरने से पहले वर्षों तक घुट-घुट मरना पड़ता है।। दुखित व्यक्ति का साथ जगत् में किसको ईप्सित होता ह...
-
लन्दन के हीथ्रो एअरपोर्ट से जैसे ही विमान ने उड़ान भरी, श्याम का दिल बल्लियों उछलने लगा. बचपन की स्मृतियाँ एक-एक कर मानस पटल पर उभरने लगीं और...
-
बीते पलों के अफ़साने लिख रहा हूँ। जिंदगी मैं तेरे तराने लिख रहा हूँ॥ हालत कुछ यूँ कि वक्त काटे नहीं कटता, वक्त काटने के बहाने लिख रहा हूँ॥...
-
मनुज स्वभाव, नहीं अचरज है। मानव हैं हम, द्वेष सहज है।। निर्बल को जब सबल सताए, वह प्रतिकार नहीं कर पाए, मन पीड़ा से भर जाता है, द्वेष हृदय घ...