बुधवार, 21 जनवरी 2026

जीवन चौथेपन में दुष्कर

जीवन चौथेपन में दुष्कर,
धीरज धरना पड़ता है।
मरने से पहले वर्षों तक
घुट-घुट मरना पड़ता है।।

दुखित व्यक्ति का साथ जगत् में
किसको ईप्सित होता है,
घोंट गला दुख का, हँसने का
अभिनव करना पड़ता है‌।।

वाणी के तीखे तीरों से
हत हृत् क्रंदन करता है,
नीलकंठ-सा गरल कंठ में
धारण करना पड़ता है।।

पुण्य-अपुण्य कर्म-वृक्षों पर
सुख-दुख के फल लगते हैं,
गठरी ले जाते जो जग से,
आकर भरना पड़ता है।।

कर्मबंध के कारण जग में
आवागमन सतत चलता,
मुक्ति हेतु नित मन-इंद्रिय पर 
संयम करना पड़ता है।।

- राजेश मिश्र 

सोमवार, 12 जनवरी 2026

मधुप मन नाच उठता है

महकती मुस्कुराहट पर मधुप मन नाच उठता है। 
तुम्हारी एक आहट पर मधुप मन नाच उठता है।।

नासिकाभरण-द्युतिमंडल,
दमकते कान के कुण्डल।
मचलते किंकिणी कंगन,
चहकती चूड़ियाँ पायल।

तनिक-सी खनखनाहट पर मधुप मन नाच उठता है।
तुम्हारी एक आहट पर मधुप मन नाच उठता है।।१।।

थिरकते अंग इतराते,
नयन मदनीय मदमाते।
त्वचा मृदु रंग सिंदूरी
केश कटि-कूल बल खाते,

दशन-दल झिलमिलाहट पर मधुप मन नाच उठता है।
तुम्हारी एक आहट पर मधुप मन नाच उठता है।।२।।

व्यथित हृत् हर्ष भर जाएँ
चित्रिणी चपल चेष्टाएँ।
गमकती गंध कस्तूरी 
रसीले बोल बिखराएँ।

खनकती खिलखिलाहट पर मधुप मन नाच उठता है।
तुम्हारी एक आहट पर मधुप मन नाच उठता है।।३।।

- राजेश मिश्र

सोमवार, 5 जनवरी 2026

कुंडलियाँ

(१)

कोई भी सरकार हो, आरक्षण बढ़ जाय।
अरु शासन की दक्षता, दिन-दिन घटती जाय।।
दिन-दिन घटती जाय दक्षता मरती जाये।
अक्षम परजीवी की संख्या बढ़ती जाये।।
कह राजेश कि देश-धर्म को कौन बचाये। 
कोई भी सरकार समाज बाँटती जाए।।

(२)

संविधान की आत्मा, कैसे रहे अपेल।
दशकों से जब चल रहा, आरक्षण का खेल।।
आरक्षण का खेल देश दीमक सा चाटे।
सदियों से संपृक्त समाज शत्रु बन बाँटे।।
कह राजेश दरार दिनोंदिन बढ़ती जाए।
राजनीति अति क्रूर नए नित जाल बिछाए।।

(३)

बंगलादेश में हो रहा, बर्बर अत्याचार।
निर्बल नम्र निरीह हर, हिन्दू है लाचार।।
हिन्दू है लाचार जलाई जायँ बस्तियाँ।
जलकर मरते लोग लुट रहीं बहन-बेटियाँ।।
यहाँ सो रहे कोटि-कोटि चुप चद्दर ताने।
लीलेगी यह आग, आज मानें मत मानें।।


गुरुवार, 1 जनवरी 2026

देख लेना आस-पास

जब तुम्हारा मन दुखित हो, देख लेना आस-पास।
जब अभावों से ग्रसित हो, देख लेना आस-पास।।

वेदनाएँ देख सबकी निज व्यथा अति लघु लगेगी,
हिय तुम्हारा जब व्यथित हो, देख लेना आस-पास।

एक ही सच लोग जितने बात उतने ही तरह की,
बुद्धि जब सुनकर भ्रमित हो, देख लेना आस-पास।

इस जगत में कुछ नहीं है जो सदा सुखकर लगे,
कष्ट सीमा से अधिक हो, देख लेना आसपास।

हर समस्या हल करे कोई कभी संभव नहीं,
विपद कोई उपस्थित हो, देख लेना आस-पास। 

जन्म का गन्तव्य जग में मृत्यु ही तो है सदा,
जब अघट कोई घटित हो, देख लेना आस-पास।

- राजेश मिश्र 

नव वर्ष

बीते संवत की स्मृतियाँ ले नए वर्ष के संग चलें।
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।

जीवन-पथ पर आगे बढ़ते
एक और सन छूट गया है।
नवल वर्ष नव मीत बना है,
गत से नाता टूट गया है।

क्या सचमुच संबंध पूरते तज यदि कोई संग चले?
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।१।।

विगत वर्ष या विगत व्यक्ति को
क्या हम कभी भूल पाते हैं?
जीवन जब तक है तब तक वे 
यादों में आते जाते हैं।

मन में उनकी मृदु यादों की लेकर सदा तरंग चलें।
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।२।।

आगत के स्वागत में लेकिन
विघ्न विगत मत बनने पाए।
एक द्रवित छूकर कर जाए,
दूजा छूकर मन हरषाए। 

सामंजस्य रहे दोनों में हम कुछ ऐसे ढंग चलें। 
द्वेष कलुष कज कष्ट भुलाकर लेकर नई उमंग चलें।।३।।

कज = दोष, छल

- राजेश मिश्र

जीवन चौथेपन में दुष्कर

जीवन चौथेपन में दुष्कर, धीरज धरना पड़ता है। मरने से पहले वर्षों तक घुट-घुट मरना पड़ता है।। दुखित व्यक्ति का साथ जगत् में किसको ईप्सित होता ह...