हृदय-कमल पर मँडराती हैं
मधुरिम मधुरस ले जाती हैं
कर-करके मीठी बातें।।१।।
मन मादकता भर जाती हैं
तन को घायल कर जाती हैं
हौले-हौले कर घातें।।२।।
अतिशय निर्दय निष्ठुर निर्मम
कर जाती हैं नयनों को नम
दे जातीं विरहिन रातें।।३।।
- राजेश मिश्र
कौन अपना है जगत में, जब जगत अपना नहीं? स्वप्न को सच मानने से, सत्य हो सपना नहीं।। जगत में आना अकेला जगत से जाना अकेला जन्म से ले मृत्यु तक ...
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