सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।।
चाहे जितना भी थकती हूँ,
पर अविरल बहती रहती हूँ।
पग-पग पर कंकड़-पत्थर की
चोटें चुप सहती रहती हूँ।
वर्षा-आतप-हिम सह स्वागत करती हँस-हँस सबकी।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। १।।
जिनके हित निशि-दिन दौड़ूँ मैं
अपनी बाँहो को फैलाए।
निज हित हित वे लादें मुझ पर
नित नव बाँधों की बाधाएँ।
मर्यादाएँ जब-जब टूटीं, काल बनीं अग-जग की।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। २।।
व्यथा हृदय की सीमा लाँघे,
चिर-निद्रा को मैं ललचाऊँ।
द्रोणपुत्र-सी शापित लेकिन
मृत्यु भला मैं कैसे पाऊँ?
बिना प्रलय के मुक्ति मुझे कब? राह निहारूँ कबकी।
सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।। ३।।
- राजेश मिश्र
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