सोमवार, 15 सितंबर 2025

इसी देह में रहती तुम भी

देखो, बस मुझको मत देखो, 
खुद को भी देखो मुझमें ही। 
इसी देह में मैं भी रहता,
इसी देह में रहती तुम भी।।

तुमसे पहले एकाकी था 
सब सूना-सूना लगता था।
भरी सभा हो, भरा मंच हो
पर ऊना-ऊना लगता था।

एकाकीपन गया तुम्हीं से 
तुमसे पूरा खालीपन भी।
इसी देह में मैं भी रहता,
इसी देह में रहती तुम भी।।१।।

सुंदर सुष्ठु सुडौल देह यह 
सप्त-धातु से परिपूरित थी।
हृष्ट-पुष्ट तन दृष्टि सभी की 
अंदर क्या है, कब परिचित थी? 

तुमको पा चंचल मन नाचे
मधुर-मधुर गाए धड़कन भी।
इसी देह में मैं भी रहता,
इसी देह में रहती तुम भी।।२।।

ये तन केवल साधन ही थे 
आज मिले, कल फिर बिछड़ेंगे।
जनम-जनम का साथ हमारा
कोई तन ले आन मिलेंगे।

भाव हमारे यही रहेंगे
और यही होंगे चेतन भी।
इसी देह में मैं भी रहता,
इसी देह में रहती तुम भी।।३।।

ऊना = अपूर्ण, अधूरा।

- राजेश मिश्र

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

"सौमित्र की सिंहगर्जना

धधक रही है ज्वाला उर में फटने को तैयार शिरायें। आँखों से चिनगारी फूटे, फड़क रही हैं व्यग्र भुजायें।। क्रोध भयंकर कालिय-विष सा पल में सब कुछ ...