शनिवार, 13 सितंबर 2025

चले जाना

चन्द दिन और रुक जाओ, चले जाना।
जरा मन और बहलाओ, चले जाना।।

तुम्हें देखा नहीं अब तक
तुम्हें जाना नहीं अब तक
जरा मैं देख लूँ तुमको
जरा मैं जान लूँ तुमको

निकट कुछ और आ जाओ, चले जाना।
जरा मन और बहलाओ, चले जाना।।

नयन थे राह पर अटके
श्रवण चौकस, कहीं खटके
कोकिला कूक उठती थी
हृदय में हूक उठती थी

हृदय मेरे उतर जाओ, चले जाना। 
जरा मन और बहलाओ, चले जाना।।

जले दिन-रात बरसों से
मिले हो बाद बरसों के
अगर तुम आज जाओगे
कहो, कब लौट आओगे

वजह जीने की दे जाओ, चले जाना।
जरा मन और बहलाओ, चले जाना।।

- राजेश मिश्र 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

मैं वह नदिया

मैं वह नदिया प्यासी है जो, प्यास बुझाकर सबकी। सावन! आना, हृदय लगाना, बाँहों में भर अबकी।।  चाहे जितना भी थकती हूँ, पर अविरल बहती रहती हूँ। प...