मंगलवार, 25 नवंबर 2025

धर्म-ध्वजा फहराई है

सदियाँ बीतीं, शुभ दिन आया, अवधपुरी हर्षाई है।
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

हर्षित हैं सब देव-देवियाँ
हर्षित हैं धरतीवासी 
मन प्रसन्न आशान्वित नाचें
संभल, मथुरा अरु काशी

शीघ्र हमें भी मुक्ति मिलेगी, आँख सजल हो आई है।
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

हर शरणागत, दुखी-दीन को
हमने हृदय लगाया है 
किंतु कृतघ्नों ने पीछे से 
हम पर छुरा चलाया है 

छद्मयुद्ध में धर्म निभाकर हमने जान गँवाई है। 
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

करुणा और प्रेम से हमने 
उनके आँसू पोंछे हैं
प्रत्युत्तर में अश्रु दिया है 
वे घाती हैं, ओछे हैं

कायरता माना सबने जब हमने दया दिखाई है।
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

रक्तबीज हैं शेष अभी भी
धर्मयुद्ध नित जारी है
उन्हें समूल नष्ट करने की 
अपनी भी तैयारी है

साँपों और सँपोलों का वध करने की रुत आई है।
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

हर हिंदू अब जाग रहा है 
म्लेच्छ मिलेंगे गारत में 
लहर लहर लहराएगा अब
हर घर भगवा भारत में

खोया यश पाने के क्रम में यह पहली अँगड़ाई है 
सत्य सनातन के गौरव की धर्म-ध्वजा फहराई है।।

- राजेश मिश्र 

रविवार, 23 नवंबर 2025

रहोगी तुम ही मन में

तुम्हीं थी मन में मेरे, तुम्हीं हो मन में मेरे, 
रहोगी तुम ही मन में,
रहोगी तुम ही मन में।।

मैं कल भी था तेरा ही
मैं अब भी हूँ तेरा ही
यही बस माँगा जग में
रहूँ हरदम तेरा ही

तुम्हीं बहती रहती थी, तुम्हीं बहती रहती हो,
लहू बन मेरे तन में,
लहू बन मेरे तन में।।१।।

तुम्हीं से धड़का यह दिल 
तुम्हीं से धड़क रहा दिल 
रहोगी जब तक दिल में 
तभी तक धड़केगा दिल

तुम्हीं धड़कन थी मेरी, तुम्हीं धड़कन हो मेरी,
रहोगी तुम धड़कन में,
रहोगी तुम धड़कन में।।२।।

नहीं थी तुम जीवन में 
नहीं था कुछ जीवन में 
तुम्हीं सँग सज-धज आईं
बहारें इस जीवन में

तुम्हीं जीवन थी मेरा, तुम्हीं जीवन हो मेरा 
रहोगी तुम जीवन में,
रहोगी तुम जीवन में।।

- राजेश मिश्र

गुरुवार, 20 नवंबर 2025

जागो सनातनियों

उदयाचल से सूरज निकला
घोर अँधेरा भाग रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।

वर्षों बाद समय बदला है 
तुम उन्नीस से बीस हुए।
रही सैकड़ों साल गुलामी 
तब फिर सत्ताधीश हुए। 

सतत सतर्क रहो तुमसे यह
वचन राष्ट्र अब माँग रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।१।।

हाँ वे अब कमजोर हुए हैं
लेकिन हार नहीं मानी है।
चुप हैं, पर मौका मिलते ही
हमला करने की ठानी है।

घाती हैं, वे घात करेंगे
उनका यह अंदाज रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।२।।

काश्मीर में सिद्ध किया फिर
जड़ उन्मादी अंधे हैं वे।
देश-राष्ट्र का अर्थ न कोई
बस इस्लामी बंदे हैं वे।

लाल चौक रिपु रुधिर से धो दो 
जो मस्तक का दाग रहा है।
सनातनी वीरों! तुम सोए
देखो दुश्मन जाग रहा है।।३।।

- राजेश मिश्र 

कुटिल भ्रमर तेरी यादें

कुटिल भ्रमर तेरी यादें।।

हृदय-कमल पर मँडराती हैं 
मधुरिम मधुरस ले जाती हैं
कर-करके मीठी बातें।।१।।

मन मादकता भर जाती हैं 
तन को घायल कर जाती हैं 
हौले-हौले कर घातें।।२।।

अतिशय निर्दय निष्ठुर निर्मम
कर जाती हैं नयनों को नम 
दे जातीं विरहिन रातें।।३।।

- राजेश मिश्र

बुधवार, 19 नवंबर 2025

सबका साथ नहीं हो सकता

एक पक्ष सिर पर बैठाए, अरु दूजा तलवार चलाए
सबका साथ नहीं हो सकता।
लव विश्वास नहीं हो सकता।।

सदियों का इतिहास देख लो 
दूर देख लो, पास देख लो 
काफिर तो काफिर हैं, उनका
अपनों से नित घात देख लो 

एक पक्ष सँग ईद मनाए, अरु दूजा पत्थर बरसाए
सबका साथ नहीं हो सकता।
लव विश्वास नहीं हो सकता।।१।।

वे धर्मान्ध कुटिल कामी खल
कुत्सित क्रूर भेड़ियों के दल
खाल भेद की ओढ़ घूमते 
मौका मिलते ही करते छल

भाँति-भाँति जेहाद चलाएँ, हर चौराहे पर फट जाएँ
उनका साथ नहीं हो सकता।
लव विश्वास नहीं हो सकता।।२।।

उनके जेहन में किताब है
हूर मिलेंगी, यही ख्वाब है
दुनिया में यदि अमन-चैन है 
फिर इनको अतिशय अज़ाब है

जितनी ऊँची शिक्षा पाते , उतने कट्टर होते जाते 
उनका साथ नहीं हो सकता।
लव विश्वास नहीं हो सकता।।३।।

लय = रंचमात्र, थोड़ा, अल्प।
अज़ाब = तकलीफ, दुख, कष्ट।

- राजेश मिश्र 

सोमवार, 17 नवंबर 2025

कुछ तो आस अभी बाकी है

आशाएँ अब भी जीवित हैं, कुछ तो साँस अभी बाकी है।
संस्कार हैं शेष अभी भी, कुछ तो आस अभी बाकी है।।

दूर भले उड़ जाए पंछी
साँझ ढले घर आ जाता है 
राह लक्ष्य की खो जाए पर
घर का रस्ता पा जाता है

उड़ने दो उन्मुक्त गगन में, मन विश्वास अभी बाकी है।
संस्कार हैं शेष अभी भी, कुछ तो आस अभी बाकी है।।

बाँध सका है जग में कोई 
पानी और जवानी को कब?
हृदय उमड़ते भावों से नित
निकली नई कहानी को कब?

तन-मन तृप्त हुए कब किसके? शाश्वत प्यास अभी बाकी है।
संस्कार हैं शेष अभी भी, कुछ तो आस अभी बाकी है।।

ऐसे क्यों निस्तेज पड़े हो 
मरघट के मुर्दों जैसे तुम?
जब तक तन में प्राण शेष हैं 
हार भला सकते कैसे तुम?

उठो और निज स्वाँग रचाओ, जीवन-रास अभी बाकी है।
संस्कार हैं शेष अभी भी, कुछ तो आस अभी बाकी है।।

- राजेश मिश्

शनिवार, 15 नवंबर 2025

ख्वाहिशों का हर घरौंदा बारिशों में बह गया

मैं सदा से बेसुरा था, बेसुरा ही रह गया।
ख्वाहिशों का हर घरौंदा, बारिशों में बह गया।।

सुर नहीं थे, लय नहीं थी, ताल का साया नहीं 
गीत सारे घुट मरे, भय में रहा, गाया नहीं 
मुझे कोई क्यों सुनेगा? सोचता ही रह गया।
ख्वाहिशों का हर घरौंदा, बारिशों में बह गया।।१।।

जब जहाँ जिसने पुकारा, साथ पाया है मुझे 
हर कदम बाँटी हँसी, सबने रुलाया है मुझे
मान दे भी हो तिरस्कृत, चुप रहा, सब सह गया।
ख्वाहिशों का हर घरौंदा, बारिशों में बह गया।।२।।

च्युत हुआ कर्तव्य से, कोई कभी अवसर न था 
हर चुनौती से लड़ा, भागा नहीं, कायर न था 
तप्त रवि का दर्प तोड़ा, जुगनुओं से दह गया। 
ख्वाहिशों का हर घरौंदा, बारिशों में बह गया।।३।।

- राजेश मिश्र

देख लेना आस-पास

जब तुम्हारा मन दुखित हो, देख लेना आस-पास। जब अभावों से ग्रसित हो, देख लेना आस-पास। वेदनाएँ देख सबकी निज व्यथा अति लघु लगेगी, हिय तुम्हारा जब...