शनिवार, 15 नवंबर 2025

ख्वाहिशों का हर घरौंदा बारिशों में बह गया

मैं सदा से बेसुरा था, बेसुरा ही रह गया।
ख्वाहिशों का हर घरौंदा, बारिशों में बह गया।।

सुर नहीं थे, लय नहीं थी, ताल का साया नहीं 
गीत सारे घुट मरे, भय में रहा, गाया नहीं 
मुझे कोई क्यों सुनेगा? सोचता ही रह गया।
ख्वाहिशों का हर घरौंदा, बारिशों में बह गया।।१।।

जब जहाँ जिसने पुकारा, साथ पाया है मुझे 
हर कदम बाँटी हँसी, सबने रुलाया है मुझे
मान दे भी हो तिरस्कृत, चुप रहा, सब सह गया।
ख्वाहिशों का हर घरौंदा, बारिशों में बह गया।।२।।

च्युत हुआ कर्तव्य से, कोई कभी अवसर न था 
हर चुनौती से लड़ा, भागा नहीं, कायर न था 
तप्त रवि का दर्प तोड़ा, जुगनुओं से दह गया। 
ख्वाहिशों का हर घरौंदा, बारिशों में बह गया।।३।।

- राजेश मिश्र

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