हृदय-कमल पर मँडराती हैं
मधुरिम मधुरस ले जाती हैं
कर-करके मीठी बातें।।१।।
मन मादकता भर जाती हैं
तन को घायल कर जाती हैं
हौले-हौले कर घातें।।२।।
अतिशय निर्दय निष्ठुर निर्मम
कर जाती हैं नयनों को नम
दे जातीं विरहिन रातें।।३।।
- राजेश मिश्र
गूँजती है छम-छमा-छम धुन चतुर्दिक, सरस पावस आ गई है नाचती मन मोहती। मदभरी काली घटाएँ झूमती हैं, चूमती हैं गिरि-शिखर को झुक लचीली। फिर उमड़ती-...
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