हृदय-कमल पर मँडराती हैं
मधुरिम मधुरस ले जाती हैं
कर-करके मीठी बातें।।१।।
मन मादकता भर जाती हैं
तन को घायल कर जाती हैं
हौले-हौले कर घातें।।२।।
अतिशय निर्दय निष्ठुर निर्मम
कर जाती हैं नयनों को नम
दे जातीं विरहिन रातें।।३।।
- राजेश मिश्र
दुःख-आतप तप्त जग में छाँव घन, मृदु नीर है तू। माँ! धरा का धीर है तू।। वेद-विद् कहते सदा से जीव ईश्वर अंश है यह ईश्वरी! तुझसे सृजित ही जगत का...
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