हृदय-कमल पर मँडराती हैं
मधुरिम मधुरस ले जाती हैं
कर-करके मीठी बातें।।१।।
मन मादकता भर जाती हैं
तन को घायल कर जाती हैं
हौले-हौले कर घातें।।२।।
अतिशय निर्दय निष्ठुर निर्मम
कर जाती हैं नयनों को नम
दे जातीं विरहिन रातें।।३।।
- राजेश मिश्र
हे लखन! उठो प्रिय भ्रात प्रात अब होने वाली है।। शयित उषा-दृग खुलने वाले लाली छाती होगी। पुरखों का आशीष समेटे किरणें आती होंगी। बीती घन काली ...
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