बुधवार, 4 दिसंबर 2024

ओ रे निर्मोही! छोड़ चला किस देश?

ओ रे निर्मोही! छोड़ चला किस देश?

पल भर को भी चित्त न लाया, 
मुझ विरहिनि का क्लेश।
ओ रे निर्मोही!…………।।

कंचन काया धूमिल हो गई 
चिंता रज छाई है।
अंग-अंग प्रिय संग को तरसे, 
तड़पे तरुणाई है।

सूख-सूख तन शूल हो गया, 
रूप-रंग नि:शेष।
ओ रे निर्मोही!…………।।१।।

निशि दिन नैना झरते रहते,
सावन-भादों जैसे।
दुख-नदिया अति बढ़ आई है,
निकलूँ इससे कैसे?

दिवस, मास, संवत्सर बीते,
राह तकूँ अनिमेष।
ओ रे निर्मोही!…………।।२।।

मन मुरझाया, बुद्धि अचेतन,
धड़कन डूबी जाये।
प्राण हठी यह देह न त्यागे,
दुर्दिन दैव दिखाये।

सूरज, शशि, उडुगन से भेजूँ,
नित नूतन संदेश।
ओ रे निर्मोही!…………।।३।।

- राजेश मिश्र 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

राम

इन्द्रियों की पहुँच से परे राम हैं, किंतु कण-कण जगत के भरे राम हैं। पातकी घोरतम नाम ही ले तरें, कर-कमल नित्य शर-धनु धरे राम हैं।।