रविवार, 20 सितंबर 2026

अब भी क्यों तुमसे ही आशा?

कुछ बातों पर अति आनन्दित,
कुछ बातों से घोर निराशा।
अब भी क्यों तुमसे ही आशा?

बाकी सब तो तिलचट्टे हैं
थैली के चट्टे-बट्टे हैं
मौका मिलते ही टूटेंगे 
एक-एक पाई लूटेंगे 

पल भर में निगलेगी सब कुछ,
बरसों से बढ़ रही पिपासा।
अब भी क्यों तुमसे ही आशा?।१।।

दशकों का इतिहास देख लो 
दूर देख लो, पास देख लो 
राष्ट्र-धर्म से द्विष्ट सदा हैं 
आर्यजनों से सहज खफा हैं 

कई पीढियों की कुण्ठा है,
जनम-जनम की भरी हताशा।
अब भी क्यों तुमसे ही आशा?।२।।

किन्तु धीरता टूट रही है 
आगे कोई छूट नहीं है 
अनुचित कर्म नहीं छोड़ेंगे 
सारे अपने मुँह मोड़ेंगे

तन-मन-धन से साथ रहे जो,
उनका बस बन रहा तमाशा।
अब भी क्यों तुमसे ही आशा?।३।।

- राजेश मिश्र

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