जनम-जनम के बाद अचानक खोई निधि हो पाई ज्यों।
अनियन्त्रित तन, विह्वल है मन, नयनों से जलधार बहे।
पग-पग आगे बढ़ते जैसे लोक-लोक हों लाँघ रहे।
भाव-भँवर में डूबे ऐसे नाप रहे गहराई ज्यों।
जनम-जनम के बाद अचानक खोई निधि हो पाई ज्यों।।१।।
ठोकर खाते और सँभलते जब चौखट पर पहुँचे हैं।
मिली दृष्टि दोनों की जिस क्षण जड़वत् जहँ तहँ ठिठके हैं।
मुँह से बोल न फूट रहे हैं, खाँड मूक ने खाई ज्यों।
जनम-जनम के बाद अचानक खोई निधि हो पाई ज्यों।।२।।
जड़ता टूटी, जगी चेतना, प्रेम-प्रपात अधीर हुए।
गङ्गा-यमुना ऐसे उमगीं, इक दोनों के तीर हुए।
दृश्य देख जलनिधि चुप ऐसे उसने मुँह की खाई ज्यों।
जनम-जनम के बाद अचानक खोई निधि हो पाई ज्यों।।३।।
धीरे-धीरे पग दोनों के इक-दूजे की ओर बढ़े।
मुरलीधर कुछ नीचे आए, तनिक सुदामा ऊर्ध्व चढ़े।
लिपटे अङ्क कूदते दोनों, छाई हो लरिकाई ज्यों।
जनम-जनम के बाद अचानक खोई निधि हो पाई ज्यों।।४।।
महामिलन जिसने भी देखा, सब आनन्दविभोर रहे।
सुर-नर-मुनि-गन्धर्व सभी के दृग से अविरल नीर बहे।
अहोभाग्य यह देख द्वारका अपने पर इतराई यों।
जनम-जनम के बाद अचानक खोई निधि हो पाई ज्यों।।५।।
- राजेश मिश्र
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें