चलो, माना तुम्हारी दूरदर्शी योजनायें हैं।
मगर सामान्य जन की और ही कुछ धारणायें हैं।।
महामानव! भले तुम कामनाओं से परे होगे,
हजारों ही अधूरी पर हमारी कामनायें हैं।
सलोने स्वप्न सुख के सर्वदा तुमने दिखाये हैं,
मगर क्योंकर लगे ऐसे कि भ्रामक घोषणायें हैं।
हटाये मार्ग से कण्टक किसी के, पुष्प बिखराये,
वही काँटे हमारी राह में नव-यन्त्रणायें हैं।
उजाले की प्रतीक्षा में अँधेरे से लड़ें कब तक?
भरोसा तोड़ने वाली दुसह ये वेदनायें हैं।
तुम्हारा मौन चुभता है, कभी कुछ तो दिलासा दो,
दिनोंदिन चूर होती जा रहीं मृदु भावनायें हैं।
- राजेश मिश्र
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